Sunday, December 8, 2013

On the Occasion of Multai Shaheed Kisan Smriti Divas 12 Jan. 2014 Lokavidya Jan Andolan Conference 10-12 Jan. 2014 in Multai, (Betul, M.P.)

This is the invitation cum announcement of the Lokavidya Jan Andolan (LJA) Conference scheduled between 10-12 January 2014 in Multai in the district of Betul in Madhya Pradesh. The plan is to discuss the organizational question and the significance of LJA for the politics of change. We may do this by focusing the discussion on the question of coordination between peasant and adivasi struggles all over the country and their relationship with the struggles of small retailers, women and the artisans and service providers, generally those said to belong to the unorganized sector. 

Dr. Sunilam, the leader of Kisan Sangharsh Samiti there has invited us to hold this conference in Multai on the occasion of the Martyr's Day, 12th January, on which in 1998 a farmers' gathering demanding relief and compensation for crop failure continuously for three years, was fired upon by police killing 24 farmers and injuring 150. Further, a large number of farmers and their leaders have been booked in a variety of cases. This unparalleled event has resulted in farmers and social activists collecting in Multai every year on 12th January to pay homage to martyrs and to deliberate over the future of people's movements. Dr. Sunilam, Prahlad and Sheshrao have been sentenced for life-imprisonment in October 2012 and are presently on bail.

We have been reporting LJA activities on this blog. This knowledge movement of the people has come up with new ideas and practices to develop a lokavidya focused dialogue in the world of knowledge which may have serious bearing on a new political imagination. Organizational and constructive initiatives have been taken in the names of lokavidya samvad, lokavidya samanvay samooh, lokavidya mel-milap, lokavidya ashram, lokavidya panchayat, lokavidya prapancham, lokavidya sadhikar sanghatna, lokavidya bhaichara vidyalaya, lokavidya satsang and lokavidya tana-bana. 

Since the founding conference of LJA in Varanasi in November 2011, regional conferences have been held in Darbhanga, Vijaywada, Singrauli and Indore. Two large gatherings of LJA activists have taken place, one in Sewagram in March 2012 and another in Mumbai in February 2013. This time the attempt is to mobilize LJA activists and others associated with the struggles of farmers, adivasis and generally the unorganized sector from Madhya Pradesh, Uttar Pradesh, Bihar, Maharashtra and Andhra Pradesh. There will also be participation from other places. 


10 Jan. 2014
Lokavidya Satsang in the afternoon and a meeting in the evening to plan the next two days. It will also deliberate on the Multai Delaration. 

11 Jan. 2014 :              
10.00 am to 3.00 pm 
  1. Inauguration : Farmers' Struggles and the Imagination of a New World
  2. Knowledge ( Lokavidya ) Perspectives on People's Struggles : Coordination among struggles at various places
  3. The philosophy of lokavidya and the politics of change
  4. Multai Declaration : Open discussion and consensus
3.30 pm onwards
  1. South Asia Social Forum (SASF) Preparatory Meeting. The SASF is planned between 1-5 March 2014 in Lucknow. 
12 Jan. 2014
Rally to pay homage to the peasant-martyrs of Multai. Reading out the Multai Declaration.

This blog shall keep debating the program and the ideas towards the preparation of this conference. This is to invite you to write, please do. 

Dr. Sunilam and several of his co-workers have extended a general invitation on behalf of Kisan Sangharsh Samiti (KSS) for participation in this program. The Hindi post done yesterday gives their letter of invitation. KSS shall take care of the lodging and boarding of the participants. Participants may kindly arrange for their own travel. Betul and Multai are on Itarsi-Nagpur train route. Multai is about 60 km from Betul and about 125 km from Nagpur.  
Please inform one of the following persons about your arrival and departure schedule.  
Dr. Sunilam - 09425109770    Jagdeesh Dodke  - 09179124860

Although KSS takes the responsibility of local hospitality, it is anyway done based on voluntary contributions only. So, we make an appeal to all those participants who can make a contribution to please come prepared to contribute. 

[ This is a free rendering into English of the Hindi post done on this blog yesterday.]

Vidya Ashram

Saturday, December 7, 2013

मुलताई (बैतूल,म.प्र.) में शहीद किसान स्मृति सम्मलेन व लोकविद्या जन आंदोलन समागम 10 - 12 जनवरी 2014

लोकविद्या जन आंदोलन (लो.ज.आ.) का एक राष्ट्रीय समागम 11 जनवरी 2014 को मुलताई (मध्य प्रदेश ) में होने जा रहा है। मुलताई में किसान संघर्ष समिति के नेता डा. सुनीलम ने हमें वहाँ लोकविद्या जन आंदोलन के कार्यक्रम करने का यह न्यौता दिया है। किसान संघर्ष समिति द्वारा जारी किया गया निमंत्रण और लो.ज.आ. के इस समागम के लिए विद्या आश्रम द्वारा तैयार कार्यक्रम नीचे दिया जा रहा है। कार्यक्रम के लिये अपने सुझाव लिखें तथा मुलताई आने का कार्यक्रम बनाएं, 10  जनवरी तक आ जाएं। 

लोकविद्या जन आंदोलन के अंतर्गत विकसित हो रहे  विचारों और कार्यक्रमों की रपटें इस ब्लॉग पर छपती रही हैं। इस ज्ञान आंदोलन के तहत लोकविद्या समन्वय समूह, लोकविद्या मेल-मिलाप, लोकविद्या सत्संग, लोकविद्या ताना-बाना, लोकविद्या भाईचारा विद्यालय, लोकविद्या प्रपञ्चम, लोकविद्या साधिकार संघटना और लोकविद्या आश्रम के नाम से विचार और कार्यक्रम बनते गए हैं।  अबकी बार मुलताई में परिवर्तन की राजनीति के लिए लो.ज.आ. के महत्व और संगठन के सवाल पर चर्चा शुरू करने का प्रयास रहेगा।  

नवम्बर 2011 के लो.ज.आ. के प्रथम अधिवेशन के बाद दरभंगा (मार्च-अप्रैल 2012), विजयवाड़ा (मई 2012), सिंगरौली (सितम्बर 2012) और इंदौर (जनवरी 2013) में क्षेत्रीय सम्मलेन हो चुके हैं।  मार्च 2012 में सेवाग्राम में और फरवरी 2013 में मुम्बई में संयोजन समिति व सलाहकार समिति की संयुक्त बैठकें हो चुकी हैं। इन बैठकों में इन समितियों के सदस्यों के अलावा और सक्रिय जन भी शामिल होते रहे हैं।  इस बार भी ऐसी ही योजना है। प्रयास यह किया जा रहा है कि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश से लोकविद्या कार्यों से जुड़े तथा  लोकविद्याधर समाज के संघर्षों से जुड़े कार्यकर्ता लो.ज.आ. के इस मुलताई समागम में शामिल हों।  


10 जनवरी 2014  
लोकविद्या सत्संग और शाम को अगले दो दिन की तैयारी बैठक। इसी में मुलताई घोषणापत्र पर विचार किया जायेगा। लोकविद्या सत्संग की टोलियां इंदौर और वाराणसी से रास्ते में सत्संग करते हुए मुलताई पहुंचेंगी। 
11  जनवरी 2014 
सुबह 10 बजे से 5 घंटे का कार्यक्रम।
  1. उद्घाटन : किसान संघर्ष और नई दुनिया का विचार - मुलताई का अमर किसान संघर्ष
  2. विभिन्न स्थानों के लोकविद्याधर समाज के संघर्षों के बीच समन्वय - जन संघर्षों पर ज्ञान (लोकविद्या ) का नज़रिया 
  3. लोकविद्या दर्शन और परिवर्तन की राजनीति 
  4. मुलताई घोषणापत्र  - खुली चर्चा व सर्वानुमति 
12 जनवरी 2014 
मुलताई में शहीद किसानों को श्रद्धांजलि की आमसभा - मुलताई घोषणापत्र का ऐलान 

इस ब्लॉग पर कार्यक्रम की वैचारिक और सांगठनिक चर्चा जारी रहेगी। हम भी लिखेंगे, आप भी लिखिए। 

चित्रा सहस्रबुद्धे 

किसान संघर्ष समिति, मुलताई, बैतूल (म.प्र.) का निमंत्रण 

प्रिय साथी ,                                                                                                  मुलताई 
ज़िंदाबाद !                                                                                               29 -11 -2013 

हम आपको यह आमंत्रण पत्र 15 वें शहीद किसान स्मृति सम्मलेन के श्रद्धांजली कार्यक्रम को लेकर भेज रहे हैं।  आप जानते ही हैं कि इस कार्यक्रम का विशेष महत्व है क्योंकि यहाँ के किसानों ने संघर्ष-प्रतिरोध की मिसाल कायम करते हुए बड़ी क़ुरबानी दी है।  यहाँ 12 जनवरी 1998 को कांग्रेस सरकार द्वारा किये गए पोलिस गोली चालन में 24 किसान शहीद हुए थे तथा 150  को गोली लगी थी। हर वर्ष किसान संघर्ष समिति द्वारा शहीद किसान स्मृति सम्मलेन आयोजित किया जाता है।  जिसमें देश भर के जन संगठन स्थानीय किसानों के साथ मिलकर शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं तथा मुलताई घोषणापत्र  जारी करते हैं।  12 जनवरी 2014 को जारी होने वाले मुलताई घोषणापत्र-15 में कौन से मुद्दे शामिल किये जाने चाहिए इस सम्बन्ध में हमें अपनी राय से अवगत कराने का कष्ट करें। 
11 जनवरी को मुलताई में सुबह से दोपहर तक लोकविद्या जन आंदोलन की राष्ट्रीय स्तर की बैठक विद्या आश्रम वाराणसी द्वारा आयोजित की जा रही है। दोपहर  3 बजे से दक्षिण एशिया सोशल फोरम की बैठक आयोजित की जायेगी। कृपया एक दिन पहले पहुँचने का कार्यक्रम बनाएं ताकि 11 जनवरी के कार्यक्रमों में भी आप भागीदारी कर सकें।  
कृपया स्मरण करें कि पिछले वर्ष के कार्यक्रम में डा. सुनीलम शामिल नहीं हो सके थे क्योंकि इन्हें तीन साथियों के साथ पोलिस गोली चालन के बाद उन पर 250 किसानों के साथ दर्ज किये गए 66 मुकदमों में से तीन मुकदमों में 52  वर्ष कि सजा सुनाई गयी थी और इस कारण वे जेल में थे। इस बार वे स्वयं आपके स्वागत के लिए उपस्थित रहेंगे।  
मुलताई कब पहुंचेंगे और कब लौटेंगे इसकी सूचना जगदीश दोडके  ( 09179124860 )  अथवा   डा. सुनीलम ( 09425109770 ) को देने का कष्ट करें।  मुलताई पहुँचने पर आपके भोजन और  ठहरने कि व्यवस्था हमारे द्वारा की जायेगी।  कृपया यात्रा व्यय की व्यवस्था स्वयं करने का कष्ट करें।  यह उल्लेख करना आवश्यक है कि जनवरी में यहाँ काफी सर्दी होती है।  
मुलताई नागपुर-इटारसी रेल मार्ग पर है जिस पर बैतूल भी है।  यह बैतूल से लगभग 60 कि. मी. तथा नागपुर से 125 कि. मी. दूर है।  

क्रान्तिकारी अभिवादन सहित 
आपके साथी 

टंटी चौधरी , जगदीश दोडके, लक्ष्मण बोरबन, संतोष राव वारस्कर , कृष्णा ठाकरे, सुमन बाई कसारे, कुलदीप पहाड़े (09691737897 ), लक्ष्मण विंझाड़े ( 08962276675 ), हरिओम विश्वकर्मा , कयूम खान, नान्ही बाई, सीताराम नरवरे, प्रेमचंद मालवीय, कैलाश डोगरदिये, गुलाब देशमुख। 

विद्या आश्रम 

Monday, November 25, 2013

South Asia Social Forum (SASF) Lucknow 1-5 March 2014.

A South Asia Social Forum (SASF) has been decided to be held in Lucknow between 1-5 March 2014. Lokavidya Jan Andolan has decided to participate in it. We have been to the preparatory meetings in Lucknow, Delhi and Kathmandu. Ravi and Ekta have located themselves in Lucknow and have taken charge of the SASF Lucknow Secretariat. Dilip Kumar 'dili' is involved in dialoguing and mobilization. Avinash is helping formulate the knowledge focus of the dialogue space. Sanjeev Daji has taken the responsibility of  mobilizing from the Malwa region. Vilas Bhongade and Girish have initiated preparations from Nagpur. Andhra and Bihar friends are expected to come in with their programs.

We are engaged both at the General Council level in formulating the theme areas and at the Lucknow Secretariat in details of organization.

Since the Asia Social Forum 2003 in Hyderabad we have organized workshops and published bulletins on Dialogues on Knowledge in Society in the WSF events in Mumbai, Karachi, Delhi and Nairobi. All the bulletins are there on our website

Now there is again occasion to place the ideas of lokavidya and the new political imagination thereof before a much larger audience.
This time a knowledge theme has been included in the basic thematic structure of the Social Forum. It is quite likely that there will be a two day knowledge conference sponsored by the International Council of WSF, the conference to be primarily organized by Lokavidya Jan Andolan, of course in collaboration with others. Avinash had prepared for one of the meetings a note focusing on how the knowledge issue is emerging to occupy the center stage. This is also to request Avinash to post that note on this blog.

We are in the process of planning the following conferences and workshops at SASF around the general idea of people’s knowledge claims –

1.   Gyan Panchayat: People’s hearing on questions of knowledge in society and the university knowledge – a five pole hut-shade is the location. It is to symbolize women, peasants, adivasis, artisans and small retailers as both the most oppressed and the knowledgeable communities today.
2.  Lokavidya Satsang: Lokavidya Gayaki, mainly adapted from Kabir, to be recited by groups of singers with a simultaneous discourse and dialogue from the lokavidya point of view.
3.  Lokavidya Wiki: This workshop is to discuss the ways of building an open collaborative process of creating a Lokavidya Wiki as a self organizing, autonomous part of the wiki world. Some beginning has been made at Vidya Ashram.
4.  Artists’ Knowledge Meet: Gathering of artists to discuss the meaning of knowledge in and as seen from their world and the political significance of such an undertaking.

5. Global Fraternity of Knowledge Movements: Workshop with the participation of peoples’ knowledge movements from many parts of the world. Debating the form and content of such fraternal relationships.  

Other than these, the general plan includes focus on the peoples’ knowledge interface with the national policy through conferences of farmers, adivasis, women, artisans and small retailers and workshops on energy, displacement and language. 

Slowly it would become clear how this space on knowledge and politics can be utilized in its full scope.

Vidya Ashram

Thursday, October 17, 2013

लोकविद्या सत्संग

विद्या आश्रम से लोकविद्या सत्संग का अभियान अब सक्रिय तौर पर शुरू किया गया है. कई वर्षों पहले आश्रम से लोकविद्या सत्संग शुरू किये गये थे। वाराणसी में गंगाजी के घाटों पर और विशेष अवसरों पर प्रयाग में संगम पर लोकविद्या सत्संग के नाम से गायन और वार्ता के कार्यक्रम आयोजित किये जाते रहे. पिछले साल इन्दौर के क्षेत्र में वहां के लोकविद्या समन्वय समूह ने कई ऐसे कार्यक्रम आयोजित किये जो मुख्य रूप से कबीर की गायकी पर आधारित थे। गाँव-गाँव से मंडलियाँ शामिल होती थीं और रात-रात भर भी कार्यक्रम हुए, गाँवों में हुए और कारीगर बस्तियों में हुए। 
अब विद्या आश्रम ने लोकविद्या सत्संग के नाम से एक पुस्तिका तैयार की है. यह लोकविद्या जन आंदोलन पुस्तकमाला की पांचवीं कड़ी है। इसमें कबीर के पदों का लोकविद्या संस्करण जैसा बनाया गया है. आश्रम इन पदों को गाने वालों का एक समूह बना रहा है। लोकविद्या आश्रमों में, भाईचारा विद्यालयों से, ज्ञान पंचायतों में और सम्मेलनों तथा संघर्ष व आंदोलन के स्थानों पर इन पदों की गायकी और समसामयिक चर्चा के साथ लोकविद्या सत्संग किये जायेंगे. पुस्तिका विद्या आश्रम की वेब साइट पर है और लिंक भी नीचे दिया जा रहा है.  

विद्या आश्रम 

Tuesday, October 15, 2013

Rights of the Mother Earth

[ There was a conference held in US on 11th October called Dialogue on the Rights of the Mother Earth. We had circulated the proposal to the Vidya Ashram group requesting online participation by those who could do it.  Amit Basole from LJA participated online in it. Lalit Kaul wrote the following on that list.  We are posting it on this blog. Also requesting Amit to write on this blog about his participation.     - Editor ]

Rights of the Mother Earth
 I am not sure who can define ‘rights’ of a mother.  I have held this opinion that parents are not the property of their children, but on the other hand the parents may claim the children to be their property for very simple and direct reasons. Who can define Creator’s rights!
I am not sure how much of this ‘emphasis on ‘rights’’ is an embedded part of the native’s traditional way of life; traditionally what governed the dynamics of Lokavidhyadhar Samaj?  What was the guiding principle for them: the concept of ‘right’ over the Samaj or ‘duty’ towards it?
I think the term ‘Dharm’ - as being different from generally understood meaning of religion- as used traditionally for one’s endeavours in the material world lays emphasis only on one’s duties and not rights. The unprecedented deprivation on all fronts as experienced by Lokavidhyadhar Samaj has necessitated usage of the vocabulary ‘rights’ by them, because modern world understands only ‘rights’ not ‘duties’.
Therefore, in my opinion, all those associated with LJA must articulate their thoughts on ‘Duties towards Mother Earth’ even while participating in activities that propound ‘rights’ of mother Earth.
If, for the ecological imbalance and the consequent impending (!) disaster all around the globe, modern technologies, explorative ways of modern science and exploitative ways of modern state are to be blamed then LJA need to articulate how and what kind of alternative (post modern) science and technologies, and state have the potential to not only alleviate the extant imbalances in the Nature, but also deter deprivation/ dispossession of the people across the globe.
Machine over Man OR Man over Machine OR a neat reconciliation of the two to eliminate denial of livelihood to people across the globe! It is the third option that need be synthesized, may be; that may entail totally new definition 1) of ‘science’ that may have to be essentially heterogeneous in character, 2) of the state insofar as organization of societies is concerned, and 3) of wealth.
We have ‘Ministry for Environment’ and ‘Ministry for Infrastructure Development’; the activities of the latter more often than not cause grievous injuries to environment. For public consumption, Ministry for environment raises objections for the projects proposals and stalls their progress for sometime only to be cleared eventually. All things being equal, we know that ultimately who is earning how much wealth decides the fate of the project.

Therefore, defining ‘rights of’ or ‘duty towards’ mother Earth cannot be disjoint with definition of wealth. In a society what parameters shall define their wealthiest person is very important to the very survival of the mother Earth.

Lalit Kaul

Sunday, October 13, 2013

Lokavidya Prapancham October 16th 2013

Titles of Articles Published:
1. Editorial: Protect the environment from wanton destruction
2. Join hands in the fight against GM crops and Monsanto
3. Open letter written by Madhav Gadgil to Kasturirangan on Protection of    environment and Rights of Local people on natural resources
4. Handloom Revival: The road to destruction of the Handloom sector
5. Silting of water bodies and scarcity of  water
LJA Andhra Pradesh: March against Monsanto 12 Oct 2013

Today we had gathered at Nizam college by 6.45am. There were students of Nizam College, Members of National Alliance of People's Movements, Bharatiya Kisan Sangh, Raitu Swarajya Vedika,  Lokvidya Jan Andolan and other groups.  And the Cycle rally started around 7am. There were 12-13 cyclists and 3-4 motorbikes. We first went to the Agricultural Commissioners office and did a dharna there - demanding that the govt, cancel all the contracts it has signed with Monsanto, and other companies manufacturing gm seeds. From there we went to Monsanto's office, where we pasted an EVICTION NOTICE on the door of their office. We must note here that Monsanto's office is right next to the Residence of Mr. Subbi Rami Reddy who is the Chairman overseeing the BRAI Bill and also the Minister for Dept. of Science and Technology. After posting the Eviction Notice on Their Door, we came out and did a Dharna at their main entrance. We raised slogans asking Monsanto to Quit India. Here we were joined by the State Farmers Union President of the CPI party, Parsha Padma and Mr. Ramakrishna of CPI party. After the dharna at Monsanto, the next stop was at KBR Park where we distributed pamphlets to the visitors and had many interesting discussions. From here the next stop was at Hitech City and then Madhapur. Where we stopped for breakfast. From Madhapur the cyclists moved on until ICRISAT. On the way we were distributing pamphlets about GM food and also about the March against Monsanto. People expressed the opinion that this campaign must be done extensively across the state in all districts, especially with farmers. 

At ICRISAT we were joined by the Farmers groups of Southern Action Against Genetic Engineering, Bharatiya Kisan Sangh and Fellow activists from Hyderabad. At first, the security of ICRISAT refused to allow us to even stand on the footpath in front of ICRISAT. We showed them the Police permission and stood there and raised slogans against GM food and farmers ' right to seeds, and Demanded ICRISAT to return farmers seeds and Stop GM Research. Then we took out a march upto the Gates of ICRISAT and did a dharna for a short while. Then the women farmers from SAGE, Medak District sang songs against the GM crops and seeds and how they destroy farmers lives, while destroying the soils and people's health. Then we placed all our placards in the center of the space and danced around singing songs on the dangers from GM seeds. As this was the season of Batukamma festivities of Dussera, the same was performed in this manner. After that we once against did a short march and did a sit-in in front of ICRISAT, raising slogans. After that we sat for a short while and discussed the future plan of action with all the people present there. The people working in ICRISAT were not too happy as we had exposed their connection to MONSANTO and BILL GATES (the largest share holder of Monsanto) out in the open. 

The group dispersed around 1.30pm.

March against Monsanto - Oct 2nd 2013 (6).jpg       

Tuesday, September 3, 2013

कारीगर नजरिया

'कारीगर नजरिया' के नाम से वाराणसी शहर में संपूर्णानंद विश्वविद्यालय के ठीक सामने जगतगंज मोहल्ले में 22  अगस्त 2013  को एक कार्यालय खोला गया जो  हिंदी के प्रसिद्ध  साहित्यकार और मार्क्सवादी चिन्तक और आलोचक स्वर्गीय चन्द्रबली सिंह के मकान में है. इस कार्यालय से लोकविद्या दृष्टि से कारीगरों के बीच चल रहे कार्यों को आगे बढाया  जायेगा और उनमें इजाफा किया जाएगा।
यहाँ का पहला काम रहा  एक कारीगर नजरिया अंक का प्रकाशन. यह अंक छपने के लिए प्रेस गया है. विद्या आश्रम की वेब साईट के पब्लिकेशन  पन्ने पर डाल दिया गया है.   इस लिंक पर देख सकते हैं।

प्रस्ताव यह है कि कारीगर नजरिया  के प्रकाशन के साथ साथ यहाँ से कारीगर समाज के बीच अध्ययन किया जाये और उनकी शक्तियों, समस्याओं व उनके समाधानों को बृहत् समाज, प्रशासन, सरकार, जन प्रतिनिधियों, उनके अपने संगठनों, सामाजिक पंचायतों व व्यापारिक संगठनों के सामने ज्ञापन, वार्ताओं, पंचायतों व मीडिया के मार्फ़त रखा  जाए.
इसके लिए निम्नलिखित समूह बनाया गया है.
प्रेमलता सिंह, एहसान अली, दिलीप कुमार 'दिली ', मो. अलीम, आरती और  नन्दलाल।

विद्या आश्रम

Sunday, September 1, 2013

लोकविद्या भाईचारा विद्यालय

वाराणसी में इस वर्ष जून से गाँवों में लोकविद्या भाईचारा विद्यालय शुरू किये गए. अभी 12  गाँवों में ये सांध्य विद्यालय चलाये जा रहे हैं और सितम्बर से शहर की  कुछ कारीगर बस्तियों में भी चलाने की  योजना है. सारनाथ के निकट के चिरईगांव ब्लाक में ये गाँव हैं छाही, भैसोड़ी,  पतेरवा, रघुनाथपुर, सीओ, रसूलगढ़, दीनापुर, कोटवां, सलारपुर, बभनपुरा, मुस्तफाबाद और पचरावां। इन विद्यालयों से गरीब घरों के बच्चों  की शिक्षा के साथ ग्रामीण समाज में लोकविद्या की प्रतिष्ठा से सम्बंधित वार्ता की जाती है. इन विद्यालयों में बाल  साहित्य पुस्तकालय शुरू करने तथा लोकाविद्याधर समाज की शक्ति को दिखाने वाली फिल्में प्रदर्शित करने की योजना है.

दिनांक 26 अगस्त 2013 को विद्या आश्रम पर एक कार्यकर्ता शिविर का आयोजन हुआ. दिनभर के कार्यक्रम में विद्या आश्रम के विचारकों ने लोकविद्या के आधार पर निश्चित व नियमित आय का विचार विस्तार से रखा तथा भाईचारा विद्यालय के शिक्षकों को लोकविद्या पर बोलने का अवसर दिया गया.

विद्या आश्रम 

Saturday, August 10, 2013

भारतीय किसान यूनियन की भोपाल महापंचायत , 7 अगस्त 2013

7 अगस्त 2013 को  मध्य प्रदेश के हजारों किसान अपनी जायज़ मांगों को लेकर भोपाल में इकट्ठा हुए. किसानों की रैली शाहजनी पार्क से चलकर  नीलम पार्क तक आई और यहाँ पर भारतीय किसान यूनियन की एक महापंचायत दोपहर 12 बजे से 4 बजे तक चली. मध्य प्रदेश के तमाम जिलों से आये किसानों का नेतृत्व जगह-जगह के यूनियन के अध्यक्ष एवं सचिव कर रहे थे. सूबे के अध्यक्ष जगदीश सिंह के आवाहन पर किसान सरकार से अपनी मांगों के सन्दर्भ में बात करने आये थे.

भोपाल में किसान महापंचायत 

प्रमुख मांगें क़र्ज़ माफ़ी, किसानों की आत्महत्याएं, भूमि अधिग्रहण एवं विस्थापन, तथा बिजली एवं सिंचाई की व्यवस्थाओं से सम्बंधित थीं. पाँच साल पहले वर्तमान सरकार ने 50,000 हज़ार तक का किसानों का ऋण माफ़ करने का ऐलान किया था. लेकिन किया कुछ नहीं। पूरब में सिंगरौली के तमाम निजी तापीय बिजली घरों व अनूपपुर  में मोजर बेयर के बिजली कारखाने से लेकर इंदौर के पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र व दिल्ली-मुंबई कारीडोर तक तमाम जिलों में विभिन्न कारणों से किसानों की ज़मीन जबरदस्ती ली जा रही है तथा सरकार और निजी क्षेत्र की गतिविधियों में अंतर करना मुश्किल हो गया है, जोर-जबरदस्ती सारी  हदें पार कर गया है.  त्रस्त किसानों में आत्महत्याओं की दर बहुत ज्यादा है तथा तमाम किसान नेताओं ने किसानों से आत्म हत्याएं न कर के संघर्ष में शामिल होने का आवाहन किया। 

जगदीश सिंह - म. प्र. भा.कि.यू. अध्यक्ष 

इस महापंचायत के प्रमुख अतिथि थे राष्ट्रीय महासचिव राजपाल शर्मा। शर्माजी ने 1 बजे ऐलान कर के कहा कि प्रशासन 2.30  बजे तक पंचायत में हाज़िर होकर किसानों की बात सुने और मांगों पर अपना जवाब दे. सरकार ने समय से एक SDM को भेजा, जिसने सरकार के सामने किसानों की मांगें रखने  के लिए मांगपत्र स्वीकार किया। 
महापंचायत को संबोधित करते राजपाल शर्मा, राष्ट्रीय महासचिव 

मध्य प्रदेश के किसान यूनियन के नेताओं के अलावा उत्तर प्रदेश के यूनियन अध्यक्ष दीवानचंद चौधरी, विद्या  आश्रम,वाराणसी के सुनील सहस्रबुद्धे तथा लोकविद्या जन आन्दोलन की राष्ट्रीय संयोजक चित्रा जी ने महापंचायत को संबोधित किया। इंदौर के लोकविद्या समन्वय समूह से संजीव दाजी, मगन सिंह और मनोज भी पंचायत में भाग लेने आये थे. यह बात किसान यूनियन में शुरू हो गयी है कि किसान समाज एक ज्ञानी समाज है, किसान की ताकत उसका ज्ञान है जिसे लोकविद्या कहा जा रहा है और यह कि इसी ताकत के बल पर किसानों को अपने लिए खुशहाल ज़िन्दगी के अवसर तैयार करने हैं, सरकार को मजबूर करना है कि किसानों की विद्या के मूल्य के रूप में हर किसान परिवार की आय सुनिश्चित हो और यह आय सरकारी कर्मचारी की आय के बराबर हो. 

यूनियन की अगली राष्ट्रीय पंचायत 6 अक्तूबर 2013 को गोमती तट पर किसान घाट, (झूलेलाल पार्क के पास) लखनऊ में होगी। यह चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के जन्म का दिन है. 

विद्या आश्रम 

Monday, August 5, 2013

ज्ञान की राजनीति - इंदौर विमर्श

दिनांक ३१ जुलाई की शाम को इंदौर के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने ज्ञान की राजनीति पर आपस में विमर्श किया। प्रेस क्लब इंदौर के बगल में गगन रेस्टोरेंट के बैठक कक्ष में लोकविद्या जन आन्दोलन की राष्ट्रीय संयोजक डा. चित्रा सहस्रबुद्धे ने ' चुनाव और ज्ञान की राजनीति ' के विषय पर एक नयी प्रस्थापना दी. उन्होंने कहा कि गरीबी और गैर-बराबरी समाप्त करने के लिए ज्ञान की दुनिया में बराबरी आवश्यक है. इसी दृष्टिकोण से लोकविद्या के आधार पर समाज में एक ज्ञान आन्दोलन की शुरुआत की गयी है जिसे लोकविद्या जन आन्दोलन कहते हैं। लोकविद्या द्वारा बराबरी का दावा पेश करना ही इस आन्दोलन और ज्ञान की राजनीति के मूल में है. यदि किसानों और आदिवासियों के संघर्षों में उनका साथ देने वाले समूह लोकविद्या के लिए सम्मान को आधार बनाकर आपस में समन्वय करें और अपने कार्यों एवं बहसों में ज्ञान की भाषा का समावेश करें तो ज्ञान की राजनीति  सार्वजनिक बहस में दखल लेना शुरू कर देगी तथा राजनीतिक बहस में चमत्कारिक परिवर्तन आएगा, बुनियादी सवाल बहस के केंद्र में आ जायेंगे। मध्य प्रदेश किसानों और आदिवासियों का प्रदेश है, यहाँ से होने वाला ज्ञान की राजनीति का आगाज़ पूरे देश को एक सन्देश दे सकेगा।
सभा में बोलते  संजीव दाजी 

बैठक लोकविद्या समन्वय समूह इंदौर द्वारा आयोजित थी. इस समूह के संचालक संजीव दाजी ने लोकविद्या दृष्टिकोण से  इंदौर के आसपास किये जा रहे कार्यों तथा किसानों और आदिवासियों के संघर्षों में समूह की भागीदारी के बारे में बताया। सामाजिक कार्यकर्त्ता व एडवोकेट अनिल त्रिवेदी ने लोकविद्या जन आन्दोलन को महात्मा गाँधी के आन्दोलन एवं मूल्यों से जोड़ा और कहा कि यह संघर्ष लम्बा है जिसमें साहस, सब्र और समझ की ज़रुरत है. इंदौर के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता डा. तपन भट्टाचार्य ने पहल का स्वागत किया और कहा कि  ज्ञान  की राजनीति में यह संभावना है कि संघर्षशील समूहों को एकजुट करके बुनियादी बदलाव के लिए ज्ञान का एक नया दर्शन समाज के सामने लाये। कालीबिल्लोद में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ चल रहे संघर्ष के किसान नेता बाबुभाई पटेल ने शासन की ज्यादतियों और किसानों के संघर्ष के बारे  में बताया।
 तपन भट्टाचार्य 

सामाजिक कार्यकर्ता एवं पत्रकार प्रकाश महावर कोली ने कारीगरों के ज्ञान को इंजिनियर के ज्ञान के बराबर बताया और उसी हिसाब से आर्थिक और सामाजिक बराबरी की मांग की.निमाड़ महासंघ के संजय रोकडे, प्रियन्त टाइम्स के प्रेरित प्रियन्त, अन्ना  आन्दोलन के युवराज ने भी अपने विचार व्यक्त किये.

अंत में वाराणसी के विद्या आश्रम के सुनील सहस्रबुद्धे ने कहा कि लोकविद्या के लिए बराबरी के दावे की शुरुआत इस बात से होती है कि लोकविद्या के आधार पर काम करने वाले सभी लोगों की आय सुनिश्चित होनी चाहिए और यह कि उनकी आमदनी सरकारी कर्मचारी के बराबर होनी चाहिये। यह कैसे किया जा सकता है व इस विचार के विभिन्न पक्ष क्या हैं तथा यह समाज को बदलाव और खुशहाली के रास्ते पर कैसे ले जायेगा , इनकी बारीकियों को उन्होंने सामने लाया।

प्रकाश महावर कोली 

बैठक में  बस्तियों से आये कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी, पत्रकार , किसान और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया।
सभा का समापन इंदौर के वयोवृद्ध समाज सेवी प्रीतम सिंह छाबरा ने अपने शुभ उद्गारों के साथ किया।

संजीव दाजी
लोकविद्या समन्वय समूह
1924 -डी, सुदामा नगर , इंदौर
मो. न. : +91-9926426858

Thursday, July 25, 2013

ज्ञान की राजनीति

मध्य प्रदेश में नवम्बर २०१३ में होने वाले विधान सभा चुनाव के  सन्दर्भ में 

मध्य प्रदेश के जिला सिंगरौली के मुख्यालय बैढ़न के सामुदायिक भवन में २२ जुलाई २०१३ की दोपहर को लोकविद्या जन आन्दोलन की ओर से सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक बैठक की गयी. विषय था "चुनाव और ज्ञान की राजनीति". लगभग पचास कार्यकर्ताओं की इस बैठक में इस बात पर विशेष चर्चा हुई कि अब किसी भी बुनियादी अथवा वैकल्पिक राजनीति के लिए एक नए राजनैतिक दर्शन की आवश्यकता है . लोकविद्या का विचार एक ऐसा ही दर्शन है. ज्ञान की राजनीति की कल्पना के जरिये यह दर्शन राजनीति के क्षेत्र में उजागर होता है.

बैठक का आयोजन लोकविद्या आश्रम सिंगरौली की ओर से रवि शेखर, एकता, अवधेश, लक्ष्मीचंद दुबे, मंजू सिंह, धानु और गंगा ने किया। विद्या आश्रम वाराणसी से सुनील और चित्राजी शामिल हुए. 

बैठक के पहले प्रेस वार्ता हुई जिसमें ज्ञान की राजनीति पर निम्नलिखित परचा प्रेस को दिया गया.

ज्ञान की राजनीति
ज्ञान की राजनीति जनता के बुनियादी सवालों के हल की राजनीति है. इसका दावा यह है कि लोगों के पास जो ज्ञान है, जिस विद्या के बल पर वे अपनी ज़िन्दगी चलाते हैं और अपने समाज संचालित करते हैं, उस विद्या को आधार बनाकर ही उनकी खुशहाली की नीतियां बनायी जा सकती हैं. आज की राजनीति पूरी तरह से विश्वविद्यालय की शिक्षा के दबदबे में आ गयी है. महात्मा गाँधी के आन्दोलन के समय ऐसा नहीं था. उनके सारे कार्यक्रमों में लोकविद्या के तौर-तरीकों, ज्ञान और मूल्यों को नए ढंग से प्रतिष्ठित करने की सोच और दिशा थी. आज की ज्ञान की राजनीति को भी वहीँ से नीतियों, मूल्यों और सोचने के तरीके का सिलसिला उठाना होगा। ऐसे अनेक आन्दोलन व संगठन हैं , कार्यकर्ताओं के समूह हैं, जो यह सिलसिला कमोबेश उठाते हैं . आदिवासियों और किसानों की लड़ाई लड़ने वाले, भूमि अधिग्रहण के खिलाफ और जल, जंगल और ज़मीन पर उनके नियंत्रण की लड़ाई लड़ने वाले, पटरी के दुकानदारों की जीविका और स्थानीय बाज़ारों के पक्ष में खड़े होने वाले, कारीगरों और शिल्प के पक्ष में सरकारी नीतियों में बदलाव के समर्थक, ये सभी ऐसे ही लोग हैं . थोड़ा सा विचार करेंगे तो आप पाएंगे कि ऐसे सभी समूह लोगों के पास जो ज्ञान है उसे इज्ज़त की नज़र से देखते हैं . साइंस और टेक्नोलॉजी को आगे आगे करके तमाम संसाधनों को हड़पने और उसके मार्फ़त लोगों की जीविका छीनने के जो कार्यक्रम विकास के नाम पर चल रहे हैं, उनकी खिलाफत ये सब लोग हमेशा करते हैं . मध्य प्रदेश के ऐसे तमाम समूहों और संगठनों को यहाँ के लोग भलीभांति जानते हैं .

ज्ञान की राजनीति की दो प्रकट ज़रूरतें हैं - पहली यह कि लोकविद्या को इज्ज़त की नज़र से देखने वाले सभी समूह और संगठन इसी बात को समझते हुए आपस में समन्वय की ओर कदम बढायें। और दूसरी बात यह है कि वे अपनी भाषा में ज्ञान की बातों का समावेश करें, लोकविद्या के प्रति इज्ज़त को राजनीतिक भाषा दें और बहुमत जनता की खुशहाली का आधार इसी में हो सकता है इसका दावा पेश करें .

आप देखेंगे कि यदि ज्ञान की राजनीति सार्वजानिक बहस में थोड़ा बहुत भी दखल लेने लगती है, तो राजनीतिक बहस में चमत्कारिक परिवर्तन आएगा, बुनियादी सवाल बहस के केंद्र में आ जायेंगे। मध्य प्रदेश किसानों और आदिवासियों का प्रदेश है, यहाँ से होने वाला ज्ञान की राजनीति का आग़ाज़ पूरे देश को एक सन्देश दे सकेगा। एक ऐसा सन्देश जिसमें एक खुशहाल दुनिया बनाने की एक नयी कल्पना है और उसके लिए संकल्प का एक नया ज्ञानगत  आधार.

लोकविद्या आश्रम, सिंगरौली, मध्य प्रदेश
२२ जुलाई २०१३ 

 बैठक में शिरकत करते चित्राजी, सुनील, के सी शर्मा, अवधेश व अन्य 

बैठक संचालित करते रवि शेखर 

विद्या आश्रम 

Sunday, June 16, 2013

बुनकर समाज का किसान संघर्ष को समर्थन

वाराणसी में सारनाथ के बरईपुर गाँव  में पिछले दो सालों से किसान अपनी ज़मीनों के अधिग्रहण के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। स्थानीय प्रशासन यहाँ वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाना चाहता है। अभी हाल ही में प्रशासन ने सैंकड़ों पोलिस वालों की उपस्थिति में ज़बरदस्ती पैमाइश कर निर्माण कार्य शुरू करने की जब कोशिश की तो किसानों ने ज़बरदस्त विरोध किया। किसान महिलाओं ने जेसीबी मशीन को घेर कर रोक लिया. पुलिस ने लाठी चलाई और किसान नेता को गिरफ्तार कर लिया। लगातार दो तीन दिन यह होता रहा. भारतीय किसान यूनियन के नेतृत्व में चल रहे इस संघर्ष में लोकविद्याधर समाज के अन्य घटकों का समर्थन प्राप्त करने की कोशिश की गयी। जिसमें बुनकर समाज और छोटे दुकानदारों के संगठनों से संपर्क किया गया और वाराणसी शहर के आस-पास के गाँवों में जहाँ-जहाँ किसानों की ज़मीनें अधिग्रहित की जा रही हैं और जहाँ किसान संघर्षरत हैं, गाँव-शहर संवाद यात्रा के मार्फ़त उन सभी का समर्थन भी प्राप्त किया गया। बरईपुर के  संघर्ष में अपना पक्ष सार्वजनिक करने के लिए भारतीय किसान यूनियन ने एक पत्रकार वार्ता भी की  जिसमें बुनकर संगठन, शहर के कुछ  नागरिक और छात्र कार्यकर्ता भी शामिल हुए।

बुनकर वेलफेयर संघर्ष समिति उ . प्र. ने भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष को एक पत्र लिख कर अपना समर्थन दिया। पत्र का मजमून नीचे दिया है।

"  बुनकर वेलफेयर संघर्ष समिति उ . प्र. भारतीय किसान यूनियन के तत्वावधान में विगत कई दिनों से वाराणसी जनपद में चल रहे आन्दोलन का समर्थन करती है. साथ ही साथ किसान यूनियन को बुनकर समाज की ओर  से यह विश्वास दिलाते हैं की आपके आन्दोलन का हम बुनकर समाज पूरा-पूरा समर्थन करते हैं  और ज़रुरत पड़ने पर वाराणसी का पूरा बुनकर समाज आपके कंधे से कन्धा मिलाकर चलने को तैयार हैं।
इस उम्मीद के साथ की हिंदुस्तान में दो कौमें ऐसी हैं जो सीधे-सीधे रोज़ी-रोटी से जुडी हैं, किसान और बुनकर ऐसे समाज हैं जो मेहनतकश कौम के नाम से जानी-पहचानी जाती हैं। इसी सूरत में किसानों के दर्द को बुनकर कैसे बर्दाश्त कर पायेगा? किसान भाई अपने आपको कभी भी अकेला न समझे, पूरा बुनकर समाज आपके साथ है।" 

विद्या आश्रम 

Tuesday, June 11, 2013

Gaon-Shahar Samvad Panchayat, 9th June 2013, Ganga-Varuna Sangam Varanasi

Villages surrounding Varanasi have been for quite sometime now in the grip of land acquisition. The reasons are Sewage Treatment Plant, Transport Township, Dumping of Urban Waste, Cultural Township on the bank of the Ganga for tourists, Lotus Park for tourists near Sarnath, Water Treatment Plant, Residential Colonies, Ring Road, Ganga Express-way etc. At the site of every such intervention by the administration, farmers have taken to the path of struggle to resist being uprooted and the government has responded by police action. About 8 to 10 places are, as if, permanently in struggle. The Varanasi unit of  Bharatiya Kisan Union took out a solidarity yatra to all these places on 28th May and called a Panchayat on 9th June called Gaon-Shahar Samvad Panchayat. This day long Panchayat was held on the Ganga-Varuna Sangam to discuss the following-
  • There should be  a model of equal well being for both village and the city.
  • The excesses on farmers, artisans and small shopkeepers should be stopped immediately.
  • These segments of society should be consulted on the plans of urban development.

Krishna Kumar, activist of BKU small shopkeeper speaking
Shivprasad activist and lawyer speaking
About 75 strong panchayat had the participation of farmers from struggling villages, social and political activists, some urban intellectuals,  fishermen, weavers, Bharatiya Kisan Union leaders,and Vidya Ashram. Twenty persons (including 5 women) spoke. Most of them  spoke in the double context of  the farmers struggles around Varanasi and the farmers struggles all over the country. A reasonable spread of ideas and emotions came up, and many of which made the point that the sacrifice of villages and villagers ought not to be sought for urban development, which anyway takes no account of the interests of artisans and pavement earners and is engaged in building facilities of residence, trade, education, health and entertainment for those who have the money.  
Vidya Ashram sought a change in the focus of the debate. According to it, land acquisition and development should not be at the center of the debate. Land belongs to farmers and villages and the idea of land acquisition by outside authorities for any purpose whatsoever arises from an anti-village, anti-farmer ideological make-up. Any discussion on the conditions of land acquisition however powerfully argued by farmers leadership will always end up in a scenario in which farmers are the losers. The only debate that can serve farmers interests is one on equitable distribution of financial resources and that in particular a summary policy for jobs on the basis of what people already know and do, namely lokavidya, with remuneration equal to government employees. Similarly farmers and artisans need to focus on the question of well-being and not on development. Debating development shall always end up demanding sacrifices from them in the larger interests which never include their interests.

Dilip Kumar 'dili' Secretary BKU Varanasi Division speaking

It was stressed that this Gaon-Shahar Samvad is a new one. Bharatiya Kisan Union leaders Laxman Prasad and Dilip Kumar 'dili'  declared that this dialogue will be taken further both to the interior and to the metropolis and said that it is complementary to the struggles going on all over the country by farmers to protect their land and livelihood. May be it is through these dialogues that we will find ways for a political expression of lokavidya darshan. 

Vidya Ashram

Sunday, May 5, 2013



                                             Lalit Kaul

BhaiChara is a terminology that, in my opinion, cannot be completely described by whatever vocabulary one may have. Therefore it may be prudent to define it within certain context. It gets most profoundly defined when all the creations are deemed to be the manifestations of the creator; the relationship between 'Atma' and 'Parmatma'; as if there was essentially one and the only one Energy source that got manifested in various types of energies. This kind of bonding between the beings transcends all forms of religions and discrimination. Sadly enough it does not work out in the real world of beings; therefore this definition of BhaiChara is immaterial and irrelevant.

Fundamentally, every being has a very very small world of his own; that is the family. Sustenance of the family necessitates interaction with the outside world and its requirements define the geographical limits for the same. If it is so for a family, it is no different for a community, a caste, a society, and a nation state.

Therefore it basically may (should) define a working relationship between peoples, castes, communities, regions, and nation states; the one that meets with the requirements of all at par, that is to the satisfaction of all. The dynamics of such a relationship is not immutable ( unchangeable/ unchallengeable)with time because, over a period of time, the most enterprising amongst them may come to dictate terms to the rest.
Therefore BhaiChara, I suppose, is best left to be defined/re-defined by the evolving societies, because its very content is bound to be transformed as societies transform themselves from a present state to some futuristic state. It cannot be a predefined notion; a dogma. 

Monday, April 29, 2013

The Varanasi Shivir 26-28 April 2013

A three day Lokavidya Karykarta Shivir concluded yesterday, Sunday 28th April, at Vidya Ashram Sarnath.   The Shivir was attended by about 30 persons coming from Singrauli ( M.P.), Balrampur ( Chhattisgarh), Darbhanga (Bihar), Sonbhadra and Varanasi (U.P.). There was lively discussion on various aspects of lokavidya darshan and the LJA program at different places from where participants had come.

The shivir days were broadly divided into theoretical discussions in the morning and program oriented discussion in the afternoon and then a participatory Lokavidya Gayaki in the evening.

Theoretical discussions were initiated by Sunil. The themes  taken up were lokavidya darshan in general, the meaning of regular income to every household on the basis of what they know and do (lokavidya) in its historical, social, economic and political context and the lokavidya standpoint on History, Education, Industry, Agriculture and Market. Premlata Singh initiated the discussion on lokavidya point of view on women's situation in society and their movement. On each theme there was good and down to earth dialogue  playing the desired clarificatory role for initiating and organizing activity in Lokavidya Jan Andolan. 

The team from Varanasi reported on the preparatory activity it has undertaken for a Kisan-Karigar Ekta Campaign which is expected to culminate in conferences in Magahar (Kabir Nirvan Sthali) and Lucknow. Persons engaged in this are Dilip Kumar 'dili', Laxman Prasad, Premlata Singh,  Ehsan Ali, Aalam, Babloo Kumar, and several BKU activists and Bunkar Sangathan activists from the regions. 

Awdhesh, Ravi and Ekta from Lokavidya Ashram Singrauli reported on mobilization of the local people on problems they face as a result of pollution and high handed action resulting from the Power Industry there. Discussion revolved around how to understand the lokavidya point of view in such situations so that the immediate and the short term is well attended too. Dhanu and Ganga had come from Dhari, a village at the south end of Singrauli bordering with Chhattisgarh. They described their work in the village, which mainly involved fighting corruption and getting people their due. A decision was taken to organize a LJA conference with a Lokavidya Gayaki program in that region on 25th May, the Buddha Purnima day. 

A group of Agariyas had come from Balrampur district of Chhattisgarh. Shriram and Dhanpat, the leaders of this group proposed an Agariya Mahapanchayat in tune with the decision of the LJA Conference at Singruli last September. Issues internal to the Agariya community, government policy on the science and technology of ferrous metallurgy they are masters of and the issue of regular and definite income for every household on the basis of their knowledge and equal to the emoluments of a government employee are being seen as the main themes around which this mahapanchayat can be planned. The panchayat to be held at Wadraffnagar in Balrampur district of Chhattisgarh some time this winter will expect participation also from Uttar Pradesh, Madhya Pradesh, Bihar and  Jharkhand. All these states come very close to Wadraffnagar and have Agariyas living in those areas.

Vijay Kumar and Chandraveer Narayan the two chief architects of LJA in Bihar were present in the Shivir. They have acquired a place in the District Board premises of Darbhanaga at Lahariya Sarai from where Lokavidya Jan Andolan is being organized. This place will be inaugurated soon and a Lokavidya Shivir will be organized there to build the team in Bihar further with equipment to erect a movement around the demand of government level salary for every household on the basis of lokavidya. 

One major achievement of the shivir was a beginning on the journey of Lokavidya Gayaki. Dilip developed the following lines, sang them there and proposed them for spread with Lokavidya Satsangs. 

लोकविद्या के स्वामी बोल 
अपने ज्ञान का दावा खोल 
तेरा ज्ञान है      अनमोल 
मूर्ख, गंवार न खुद को तोल 
ज्ञान का अपने दावा ठोक 

There was a feeling in the shivir that such gayaki would go a long way in developing both the thought and the movement for change. The gayaki itself would grow greatly through the movement, namely the LJA.

Vidya Ashram

Friday, April 5, 2013

LJA: Quest for Civilization?

LJA: Quest for Civilization?
(Discriminating between True & False of Life)
Lalit K Kaul
The Truth of life may be death or easing in to another unknown form of life; the end point boundary condition for dynamics of life may or may not be free (unknown Truth), but in reaching that end point whether the life has been true or false is of utmost importance.
Whatever is found in Nature is bio degradable so that whatever is born out of it finally merges in to it in consonance with decay of matter and its assimilation by the very creator. The whole system is so well designed that it does not perpetuate a problem creation-solution finding circle. It is complete in itself sustaining innumerable species of fauna and flora, in addition to providing resources for human ‘civilizations’ since times unknown. The circle of emerging from and merging in to same Whole is flawless.
On the contrary, the contemporary human civilization revels in problem creation-solution finding circle; creates monsters that cannot be easily dispensed with; challenges decay of matter; is perpetually engaged in creating oligarchies that incessantly seek to arrogate all the resources/power on to itself to posit a single dimensional system on the entire humanity- be it in the sphere of politics, economics, education, art, science, and culture etc. etc. The modern societies have become like pre programmed robots that obey and implement game plan of various oligarchies. There is no reason to question the authenticity of their scientific claims and their inquisitiveness to uncover ‘Truth’, but what is unquestionably objectionable is that the whole premise of modern civilization is based on total exploitation of human societies that are essentially heterogeneous in character, but are being ruthlessly homogenized. This exploitation is so visible to naked eyes that this fact and truth is beyond debate. While the ‘Truth’ may or may not be uncovered one day, the dynamics of life in the mean time is being robbed of its truth with its existence being dictated to be ‘False’.
The God and the Electron:
The Nature and the entire universe is the expression of some unknown emotion regulated by its own laws defined by some unknown intelligence. If it is just a ‘coincidence’ yet it is the most fascinating and enchanting combination of that emotion and intelligence that is still as unfathomable as it was at its inception. In its scheme of things, ‘Time’ is ever continuous entity; not discrete and therefore any event dependent on it cannot be manipulated; therefore occurrence of various events in the universe cannot be manipulated by itself. The Nature and the universe is a heterogeneous entity; even if the occurrences within it are of random nature, yet they seem to have some kind of correlation between them making it ever sustainable and regenerative. In spite of the quantum of ‘violence’ imbibed within it, all species within it have their own defense mechanisms. Life exists in innumerable forms with each one having the freedom to sustain their lives even as death is inevitable. Life is ‘True’. This is the civilization as ordained by whatever created this most intricate, intelligent and awe inspiring system. For whatever may be the cause/reason/intelligence for its creation; I take this liberty to name it as ‘God’. L J A aspire post modern civilization to be like this?
Man is only a miniscule part of this system supposedly with highest level of intellectual capacity (comprehension) from among the innumerable species found in the universe. The architect of contemporary ‘modern civilization’/ robotic civilization; annihilator of pre modern civilizations; annihilator of Time and matter, and a great homogenizer having succeeded in creating a system that is the anti-thesis of ‘God’s’ civilization. The atomization of matter (birth of Electron) followed by discretization of Time and Space accrued to Man limitless manipulative capability that enabled him to disfigure any natural form and create his own desired form. Colonization is its premise and weapons of mass destruction the means to sustain it. Its creations have been essentially inefficient systems, predatory in character whose emergence have created all kinds of disorders and imbalances in ‘God’s’ civilization and yet are being flaunted as ‘science’ and ‘technological’ marvels. The robots in the system are intoxicated with the unlimited availability of electronic gadgets for ‘comforts of life’, even while the life itself is on the verge of becoming inanimate. The ‘haves’ continue to have it in plenty bordering hedonism while the ‘have-nots’ are continued to be deprived in plenty.
The ‘haves’ unquestionably believe in the existence of Electron as if they had seen it with their own eyes; the ‘have-nots’ believe as much in God as if they had seen HIM/HER/IT with their own eyes. One is deeply entrenched in ‘robotic civilization’ the other aspires to be in the lap of ‘God’s’ civilization.
The Limitation and the Victim:
The limitation of the premise of technology driven civilization is that it cannot accommodate entire Indian population in its scheme of things to afford them a kind of living that is availed by a very miniscule percentage of the whole populace, the victim is Lokavidhyadhar Samaj. Therefore the yardstick like BPL and the schemes like minimum wages/ employment are institutionalized not so much out their concern for the left-outs as for buying peace/stability to ensure uninhibited growth of the economies of the extant civilization. Since ‘growth & development’ has become synonym with building concrete jungles, ever spiraling real estate prices, and rise in BSE index; therefore augmentation of infrastructures to ensure transfer of Natural resources (wealth) to sustain it has acquired top most priority. It also ensures faster transit for labour from Lokavidhyadhar Samaj to within its fold. Employment of labour is also a political requirement otherwise the entire ‘development’ works can be easily automated to win accolades for ‘better economic sense’ since the profits would be maximized.
The entry points for labour from Lokavidhyadhar Samaj are slums and therefore they are allowed to come up and exist thereafter post regularization. Slums are seen as a gateway to better life (this perception being shared on both sides of the divide) for the generation next of the Lokavidhyadhar Samaj, the concomitant growth in crime rates notwithstanding. Ironically, higher crime rates also propel higher ‘growth’ rates because to tackle crime ‘law and order’ machinery is that much more strengthened what with more import of sophisticated arms and ammunitions to be nearly (if not completely) balanced out with more engineered exports- be it raw materials, finished goods, textiles, agricultural produce, etc.- by facilitating rupee devaluation.
The Divide:
The divide is civilization based; centralized over de-centralized concept of what all encompasses human endeavour; machine over man; automation over employment of millions of human brains and hands; concentrated intelligence over distributed mass intelligence; power to subjugate over power to self rule.
Is the as now vanquished civilization trying to re-emerge by re-grouping itself through Lokavidya Jan Andolan (L J A) or is it about extracting more favours from its adversary? It may be necessary to address to this question as that alone will decide what shape L J A takes in times to come. If the endeavour is to visualize (envision) post-modern civilization then LJA is bound to question many (or all) assertions (foundations) of modern civilization.
In my opinion the most important and profusely relevant subject for debate – if we are to question modern dispensation- is whether State’s interests should have precedence over those of individual/community/societies or should it be other way round? What kind of education, life, and property one envisages when terminologies like ‘Right to Education’, ‘Right to Life’, and ‘Right to Property’ etc. are glorified? ‘Right to Equality’, we are told is enshrined in our Constitution; in the context of such glaring disparities in our societies, of what relevance is the very Constitution on which is founded the Indian State, is a moot point to deliberate upon.
More importantly, population size cannot be made a scapegoat for gross inequalities that we witness in our land. That we are a densely populated nation, is a comparative statement; even as we are populated in whatever numbers we are, it is the duty of the state to either institutionalize such mechanisms that are capable of gainfully employing people or create opportunities wherein people employ themselves gainfully. Our Constitution has not put any limit on the population size that it is not applicable to populace outside that limit. Moreover those who talk of population size conveniently forget that they too have contributed to its numbers!

Right to Profession:
L J A can perhaps articulate its demand for ‘Right to Profession’; that is, one should be free to choose one’s profession. The professions like doing agriculture, weaving, spinning, cloth making and others like carpentry, etc. have been and continue to be family based, therefore they should be encouraged to continue in the family profession by providing for continuous up-gradation of associated infrastructures so that over a period of time their professions become viable enabling them to compete in the market; encouragement should be on the similar basis as has been going on for setting up of industries.
Right to Land’ without ‘Right to viable Agriculture’ does not make much of the sense because the land hawks are ever ready to grab the land what with lack of resources having made the land unproductive. If paucity of irrigation facilities has made a piece of land unproductive then these need to be provided by the State as the input in a similar fashion as it does for the industrialists. If the land by virtue of its ingredients cannot be made viable for agriculture such need to be excluded from “Right to Land’ slogan.
If one moves through areas like Ghaziabad, Noida, Gurgoan, and Faridabad, one comes across multiple monstrous sized multi storey housing apartments/ complexes that can easily house hundreds of moderate size villages. These housing monsters cannot survive without uninterrupted water supply. Therefore underground water sources in addition to river waters are provided for their consumption. This must be easily adding to a requirement of lacs & lacs of gallons of water per day consumed in the state-of-the-art bathrooms and kitchens. While the water was made available for ‘economic growth’, same was declared to be insufficient/ unavailable for agricultural purposes. If the owner of tillable land does not have resources to do agriculture he becomes a pawn in the hands of exploiters and loses his source of employment only to become a labourer. Thus an opportunity to choose his profession is denied to him and thereby all his energies, intellect, and decision making capabilities are brutally suppressed only to live a false life regulated by some unknown face.
How, where, and under what circumstances can populace of Lokavidhyadhar Samaj invest (empower) their talents; this question needs to be addressed to. It is sheer hunger that creates migrant labourers, it will continue until alternatives emerge; in the mean time, though, Lokavidhyadhar Samaj need to work towards an alternative set up in which their talents can find full expression. Search for an alternative set up can gain momentum only if the Samaj remains convinced that within modern dispensation it has no salvation, else it remains a false hope.
Call for planned infrastructure build up for farmers and karigar Samaj, by allocating meaningful funds in every Five Year Plan can perhaps be one of the important issues for L J A; combined with the resolve to reconstruct rural markets for their produce may turn out to be very powerful expression of their united opposition to the extant exploitative machinery.
Lalit Kaul

Monday, March 25, 2013

लोककला ज्ञान यात्रा 17 से 20 मार्च 2013

लोकाविद्याधर समाज का मेल-मिलाप 

मालवा-निमाड़ क्षेत्र के आदिवासियों ने लोकविद्या जन आन्दोलन के तहत एक ऐसी ज्ञान यात्रा  निकाली जिसमें लोकाविद्याधर समाज का मेल-मिलाप उनके अपने ज्ञान के बल पर संभव हो पाया।  अपने ज्ञान को समाज में बांटते हुए  एकता का सन्देश देना अपने आप में एक अनूठा और सफल अनुभव रहा। 
संतों की वाणी पर जनवरी से ही इंदौर के ग्रामीण क्षेत्रों में आयोजन किये जा रहे हैं। ग्राम खुर्दी में जनवरी में, फिर फरवरी में कारीगरों की बस्ती महावर नगर और ग्राम आगरा में ऐसे आयोजन किये गये। इन आयोजनों से प्रेरित होकर दिनांक 17 मार्च से 20 मार्च 2013  तक एक ज्ञान यात्रा का आयोजन किया गया।  इस ज्ञान यात्रा में 25 गाँवों की मंडलियों ने भाग लिया। 

17 मार्च 2013
ग्रामविद्यालोक  कसरावद  - राजेन्द्र यादव जी के सहयोग से ग्राम कसरावद में दोपहर 12 बजे से शाम 7 बजे तक मंडलियों ने संत कबीरदास, मीराबाई के दर्शन को गाकर समाज के सामने प्रस्तुत किया। बाज़ार हाट का दिन होने से लोगों की भागीदारी अच्छी रही। यहाँ पर ग्रामविद्यालोक वायतेल  की लक्ष्मीबाई चौहान, शांति मारवाडा, अमरसिंह चौहान, नंदराम ठाकुर, अंतरसिंह चौहान, ने भी प्रस्तुति की . 
ग्राम कसरावद में सबको पक्की नौकरी लोकविद्या के बल पर मिलना चाहिए इस बात पर सभी ने एकमत होकर अपनी सहमति दी। 
18 मार्च 2013
ग्रामविद्यालोक मंडलेश्वर  - सबेरे नर्मदा मैय्या के पवित्र जल में स्नान करने के बाद शालिबाना आश्रम में भोजन करके मंडलेश्वर में आयोजन की तयारी प्रारंभ की गयी। यहाँ अधिकारीयों ने अनुमति नहीं दी तो यह तय किया गया की इसे लेकर परेशान न होकर ग्राम महेश्वर में आयोजन कर लिया जाये। महेश्वर में भवानी माता के मंदिर पर अहिल्या बाई बस स्टैंड के पास दोपहर 1 बजे से शाम 5 बजे तक संत सबद और लोकविद्या सत्संग चला। महेश्वर के निवासियों ने भी भागीदारी की। बाबूलाल, राजीव चोके, किशोर मेरठ, जगदीश मेकेनिक और महेश रणसोरे ने महेश्वर में एक बार पुनः आयोजन करने की तैयारी  दिखाई और यहाँ के ग्राम गवला, ग्राम इटावदी , ग्राम देवर की मंडलियों को सम्मिलित करने का सुझाव दिया।

18 मार्च 2013
ग्रामविद्यालोक ठीकरी  - शरद महाजन के सहयोग से ठीकरी में रात्रि 8 बजे से 12 बजे तक संत सबद के मार्फ़त लोकविद्या सत्संग हुआ। नेमा  धर्मशाला में पड़ाव व भोजन प्रबंध शरद महाजन ने किया। ठीकरी में दिनेश धनगर चाय का ठेला लगाते हैं। उन्होंने इस आयोजन को करने में पहल ली। कमल राठौर, मोतीलाल यादव, प्रशांत महाजन का भी सहयोग मिला। ठीकरी में कुछ लोगों ने दूसरे दिन यह प्रतिक्रिया जाहिर की कि इन आदिवासियों से ही समाज को नई  दिशा मिल सकती है। कार्यक्रम बड़े स्तर  पर पुनः आयोजित करने की मंशा प्रकट की गई।

19 मार्च 2013
ग्रामविद्यालोक कुक्षी - कुक्षी के सामाजिक कार्यकर्ता एवं लोकहित संघर्ष समिति कुक्षी के महिमाराम पाटीदार के सहयोग से सूर्या  टाकिज के पास संत सबद के साथ लोकविद्या सत्संग दिन में 12 बजे से 5 बजे तक संपन्न हुआ। हाट बाज़ार का दिन होने से और मुख्य बाज़ार में कार्यक्रम होने से इसमें बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी रही। मंच के पास भारी संख्या में लोग इकट्ठा हो गये. लोकविद्या दर्शन को लोग बड़े ध्यान से सुन रहे थे. तभी किसी अधिकारी ने सरकारी परमिशन की बात उठाई। कुछ समय कार्यक्रम बंद  रखा गया लेकिन उपस्थित लोगों के आग्रह पर इसे फिर से शुरू कर दिया।
अय्यूब भाई ने खूब सहयोग दिया।  महेश कामदार ने बईदा  गाँव में रात्रि में कार्यक्रम करने का आग्रह किया। महिमाराम पाटीदार ने कुक्षी में एक और बड़े कार्यक्रम को करने की बात रखी। लोकविद्या के बल पर सबको पक्की नौकरी मिलना चाहिए इस मुद्दे पर सहमति बनी और अन्य मुद्दों पर भी बात हुई।

19 मार्च 2013
ग्रामविद्यालोक चिकली  - चिकली में शाम 6 से रात्रि 9 बजे तक बैठक आयोजित की गयी। लोकविद्या समन्वय  समूह चिकली के मगन सिंह बघेल के घर पर भोजन किया गया। बैठक में चिकली के कदम सिंह जामोद व अन्य ने अच्छा सहयोग किया।

कई एक मंडलियों के सदस्यों को गेहूं की कटाई का समय होने से जल्दी गाँव लौटना था। बैठक में यह तय किया गया कि चूँकि ज्यादातर मंडलियाँ लौटना चाहती हैं इसलिए ज्ञान यात्रा को चिकली तक ही सीमित कर दिया जाये।
अगले कार्यक्रमों को आयोजित करने के उद्देश्य से ग्रामविद्यालोक गुजरी में 10 अप्रैल 2013 को एक बैठक आयोजित करने की घोषणा की गयी।

20 मार्च 2013
ग्रामविद्यालोक भकलाई - रात्रि के सफ़र के बाद कुछ मंडलियों ने ग्राम भकलाई में सत्संग किया। यहाँ भोजन किया और यहाँ ज्ञान यात्रा का समापन हुआ।

लोकविद्या समन्वय समूह के संजीव दाजी और विद्या आश्रम सारनाथ से भारतीय  किसान यूनियन वाराणसी मंडल के सचिव दिलीप दिली ने इस पूरी ज्ञान यात्रा के संयोजन में सक्रिय भूमिका निभाई।

लोकविद्या जन आन्दोलन अपने को कबीर, रैदास, मीरा, सूरदास तुकाराम, नानक, नरहरी, जनाबाई, घासीदास, तुकडोजी और  गाडगे महाराज जैसे संतों की परम्परा में लोकविद्याधरों के ज्ञान आन्दोलन के रूप में देखता है। आज के झूठ और पाखंड से मुकाबले और सबके लिए न्याय के लिए यह आन्दोलन लोकविद्या के बल पर सबके लिए पक्की आय और सरकारी कर्मचारी के बराबर वेतन की मांग करता है. लोकविद्या दृष्टिकोण वह रास्ता बताता है जिससे यह संभव बनाया जा सकता है।

लोकविद्या समन्वय समूह
1924-डी , सुदामा नगर, इंदौर
मो. : 9926426858

Saturday, March 16, 2013

On Truth ...and Experiments with It.

      It is only natural that one worries about something which is most self-evident to all, because it is most likely that a number of things of ordinary life will be affected by it. I am referring to the worst casualty of the flux of transformations in the sphere of knowledge - that of TRUTH. It seems that people take great pains to assert that they have no hope of getting at the truth of anything or to understand what it means if it is stated that something is true. This condition is as much applicable to the stock brokers as to academics, the topmost nuclear physicist of the day (working on the Large Hadron Collider in Geneva hoping to unravel the secrets of the 'real' fundamental constituents of matter ) or the bestmathematician ( who accept a computation based proof of Fermat's last theorem). The same is true of the fate of the biologists who propound the theory of a single ancestor for evolution or single biological mother for all human beings.

     What is evident is that while rationality may be used to create any specific device or prove any assertion, this rationality does not really add up to something anywhere close to a SYSTEM - a system believable, which enable ordinary people to be practical in peacefully relying on the learned oracles. No! Now, people consider the experts to possess the knowhow to do certain things, but believe in none of the 'explanations' advanced there of for what is 'really' happening. For example, if the flood water is entering the gates of the walled town from the northern gate, they would want the best engineers to build a wall to prevent the deluge, but do not believe that the flood was caused by any understandable effect of global warming or some such cosmic causation!

     Of course, the complexity of rationality ( devices, connexions, algorithms ) demands that the new education be primarily geared to generate sufficient number of lay practitioners who can carry out the subroutines without demanding an explanation. You need an army of people trained in biology and techniques of nano-techhnology to run the new machines and enterprises. And the educational institutions seem to say : these days students can not afford to go after philosophy and explanations, which, any way are not there! In fact one can listen to the tune : Well, tomorrow it will be a different explanation. Surely, this explanation serves some purpose of the day, but in trying to understand all knowledge, explanations from the earlier epoch,  how TRUE does it sound today?

    Does this epistemic bootstrapping point to some deep law on human  reason, regarding something what one may call social reason, distributed reason - some such non-standard idea of TRUTH? That is, do we have something like some inherent averaging process ( somewhat like the Ensemble average in the sense of Boltzmann ) for arriving at truth which replaces in a definite sense the Time average ( traditional knowledge, ordinary life support, historical etc. of the earlier human life)? Moreover, there may be possibly even some idea of stability, evolutionary, which corresponds to the idea of Equilibrium ( for which the two averages are same according to Boltzmann). And that this opens a responsible window for the new knowledge technologies. And can it be that the thesis about science generally losing command and control of knowledge is to seen in this light of the subtle shift of how to experiment with truth?

     However, a deeper reflection may suggest that science has always been so. Sir Isaac Newton was absolutely unable to understand chemistry on the basis of his understanding of his laws of mechanical and gravitational ( having a mechanical explanation ) motion and believed in alchemy - the medieval chemistry of turning base metals into gold. The latter , not unlike sorcery and magic, demanded a level of belief in the person learning to performing it. Newton's Christian faith and the practices of devout Christians of that period in England came to his rescue. In fact the life histories of great scientists demonstrates sufficiently persuasively (for ordinary people at least ) the fact that science is rarely in command and control as far as creativity is concerned. The Kantian command and control of science is the construction of the equivalent of the Divine Right of Kings  in England or agency of the Pope in Christianity for democracy, the thought that command and control is to sustain political order. Perhaps one does not have to possess the directness of Henri Poincaré to see that.

    Now comes the question: Assuming that Truth is undergoing such transformation in Science ( something akin to what was definitely an unfinished statement above), what is the situation in Lokavidya?

Surendran K.K.
( Note: To be made more precise after receiving readers' comments)