Saturday, June 15, 2019

दर्शन अखाड़ा में कबीर ज्ञान पंचायत

वाराणसी का पंचगंगा घाट कबीर के ज्ञान प्राप्ति का स्थान माना जाता है. कबीर ज्ञान पंचायत के लिए यह सबसे उपयुक्त स्थान होता. इस बार हम इसे नहीं कर पाए, अगली बार यहाँ कबीर दर्शन से साक्षात्कार का आयोजन करने का प्रयास ज़रूर करेंगे. वाराणसी में पंचगंगा घाट से उत्तर-पूर्व दिशा में लगभग एक किलोमीटर दूर, राजघाट (भैंसासुर घाट) पर दर्शन अखाड़ा है. इस वर्ष कबीर जयंती (17 जून ) के चार दिन पूर्व 13 जून को दर्शन अखाड़ा में कबीर ज्ञान पंचायत रखी गई. इस कबीर ज्ञान पंचायत में वाराणसी के कुछ सामाजिक विचारक और कार्यकर्त्ता जुटे. आज की दुनिया में कबीर दर्शन से क्या उजाला मिलता है इस विषय पर सभी ने अपने-अपने विचारों को साझा किया. कबीर दर्शन ज्ञान और विचार की दुनिया में एक बहुत बड़ा फलक देता है, ऐसे में चर्चा के प्रस्थानबिन्दु के रूप में उनका एक पद पंचायत के सामने रखा गया.     
मेरा तेरा मनुवा कैसे होई एक रे II
मैं कहता आंखन की देखी, तू कहता कागज़ की लेखी I
मैं कहता सुरझावनहारी, तू राख्यो उरझाई रे I
मेरा तेरा मनुवा कैसे होई एक रे II
मैं कहता जागत रहियो, तू रहता है सोई रे I
मैं कहता निर्मोही रहियो, तू जाता है मोई रे I
मेरा तेरा मनुवा कैसे होई एक रे II
बायें  से -- महेंद्र मौर्य, अरुण कुमार, रामजनम, फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, 
एहसान अली. मतीन अंसारी, गोरखनाथ और मो. अलीम  
कबीर ने अपने समय के स्थापित संगठित ज्ञान और सत्ता की सांठ-गांठ को चुनौती दी.  ज्ञान जिसे समाज का एक छोटा सा समूह ही हासिल कर पाता है और जिस ज्ञान का सत्ता से सीधा सम्बन्ध होता है उस समूह को अपने ज्ञान का अपार दंभ हो जाता है. वह खुद को समाज के अन्य लोगों से अलग करता है, अपने को विशेष समझता है, शेष समाज को मूर्ख समझता है. कबीर के समय यही स्थिति थी. उनके समय स्थापित ज्ञान बहुत कुछ धार्मिक घेरे में रहा, ऐसे में वे धर्म के ठेकेदारों को संबोधित करते दिखाई देते हैं. आज अगर कबीर होते तो किसे संबोधित करते? आज का प्रतिष्ठित ज्ञान विश्वविद्यालय का ज्ञान है. विश्वविद्यालय राजसत्ता के साथ सांठ-गांठ कर ज्ञान के ठेकेदार बने हुए हैं. ये राजसत्ता की नीतियों को समाज में मान्यता और आधार प्रदान करने के औजार हैं. इस ज्ञान का सत्य और न्याय से कोई लेना-देना नहीं है, लोगों की आवश्यकतायें और कष्टों से कोई लेना-देना नहीं है. अगर होता तो हमारी रोज़गार, उद्योग, शिक्षा, न्याय, चिकित्सा, आदि की नीतियां, गाँव और शहरों का संगठन और सम्बन्ध कुछ ही लोगों के लिए लाभ और सुविधा देने के लिए न बन गए होते. हम सभी जानते हैं कि गांधीजी ने भी अपने समय के प्रतिष्ठित ज्ञान और सत्ता के सम्बन्ध को अन्यायी और लोक विरोधी कह कर चुनौती दी.
आज के “कागज़ की लेखी” ज्ञान के वाहक और राजसत्ता से सुविधा प्राप्त समूह के ज्ञान और ज्ञान-संस्थानों को चुनौती “आंखन देखी” ज्ञान-परंपरा के वाहक समाजों से जब मिलेगी तो समाज के सभी तबकों और हिस्सों के लिए न्याय का रास्ता खुलेगा. पंचायत में विषय को रखते हुए सुनीलजी ने कहा कि इस चुनौती को पद की पहली पंक्ति “मेरा तेरा मनुवा कैसे होई एक रे” अपनी सम्पूर्णता में सामने लाती है. समाज को सभी तरह के ज्ञान की आवश्यकता है. ऐसे में किसी एक ही ज्ञान को प्रतिष्ठित किया जाये या ज्ञान की कसौटी बना दिया जाए तो यह अन्याय का रास्ता खोल देता है. ऐसे में प्रतिष्ठित ज्ञान और समाज में स्थित ज्ञान प्रवाहों के बीच बराबरी और मैत्री का सम्बन्ध आवश्यक है.

बाएं से -- प्रेमलताजी, चित्राजी, सरगम येर्रा और वनलता बुलुसु

कबीर ज्ञान पंचायत में उपरोक्त पद का सन्दर्भ लेते हुए सभी लोगों ने अपने विचार रखे. महेंद्र प्रसाद मौर्य ने कहा कि कबीर ज्ञान की इजारेदारी का विरोध करते हैं. सबके पास ज्ञानेन्द्रियाँ हैं और हर कोई ज्ञान प्राप्त करता है. सबका ज्ञान अलग अलग होता है. यह अलग-अलग ज्ञान समाज के बीच आना चाहिए. हैदराबाद से इस पंचायत में शामिल होने आई वनलता ने सवाल उठाया कि ज्ञान पर सहमति के आधार क्या हों, इस पर भी विचार होना चाहिए. प्रेमलताजी ने इस बात पर जोर दिया कि ज्ञान को व्यक्तिगत पहचान के साथ न देख कर समाज के ज्ञान  के रूप में देखना होगा. लक्ष्मण प्रसाद ने कबीर के सहज ज्ञान की ओर सबका ध्यान खींचा और कहा कि सहज ज्ञान को समाज में प्रतिष्ठा मिलेगी तो पाखंड और अन्याय से मुक्ति का रास्ता खुलेगा. रामजनम ने कहा कि किसान और गाँव- समाज के पास जो ज्ञान है उसे न्याय मिलना चाहिए. गोरखनाथ ने कबीर के ज्ञान को सत्य से तपा और प्रेम से सिक्त हुआ कहा. एहसान भाई का जोर हमेशा की तरह नैतिकता पर था. कैसे भी दबाव के बावजूद सही और गलत की पहचान से ही रास्ता बने और अपने को बड़ा और दूसरे को छोटा न देखा जाए. फ़ज़लुर्रहमान अंसारी ने इस बात पर जोर दिया कि कबीर की ज्ञान परंपरा में हमें खुद को देखना होगा, न कि कबीर संस्थानों की परम्परा में. ऐसे में कारीगर और किसान समाजों को अपने ज्ञान को विश्वविद्यालय के ज्ञान के बराबर होने का दावा प्रस्तुत करना होगा. रास्ता चाहे लम्बा हो लेकिन यही सत्य का रास्ता है, यही कबीर का रास्ता है. अरुणजी ने कहा कि इन सभी बातों पर सहमति है लेकिन प्रमुख बात “मेरा तेरा मनुवा कैसे होई एक रे” में देखी जाये. लोकविद्या समाज और उच्च शिक्षित लोगों के बीच, उनकी विद्याओं के बीच मैत्री और सद्भाव का रिश्ता कैसे बने यह प्रमुख चिंता का विषय है. इसके लिए क्या क्रिया करनी चाहिए? बुनकर दस्तकार मंच के मतीन भाई ने कहा कि “मेरा तेरा मनुवा कैसे होई एक रे” यही आज जनसंगठनों और जन आंदोलनों का प्रमुख कार्य है. चित्राजी ने कहा कि इस पद से स्वराज की कल्पना को आधार मिलता दिखाई देता है. ऐसे समाज की कल्पना जिसमें विशेषज्ञों के बल पर नहीं बल्कि सामान्य जन के ज्ञान के बल पर सबकी अपनी-अपनी पहल के साथ भागीदारी हो. अंत में गोरखनाथ जी ने दर्शन अखाड़ा की ओर से सबके प्रति अपने आभार व्यक्त किये.

विद्या आश्रम      

Friday, May 31, 2019

गंगाजी ज्ञान दर्शन


दर्शन अखाड़ा पर ‘गंगा मैया गीत’ नाम से बुधवार, दिनांक 29 मई, 2019, शाम 5 बजे से  एक आयोजन हुआ. स्थानीय समाज की महिलाओं ने मिल बैठ कर गंगाजी के गीत गाये. आप कभी ऐसे गीतों पर एक समग्र दृष्टि डालें तो वे स्वयं ज्ञान गंगा प्रतीत होंगे और सामान्य महिलाओं के ज्ञान की गहराई से आपका परिचय होगा. बहुधा यह माना जाता है कि सामान्य महिलाएं जो अनपढ़ हैं या मामूली पढ़ी हैं, वें अज्ञानी हैं, कुछ नहीं जानती. क्योंकि आज ज्ञान का अर्थ ‘विकास’ के ज्ञान से ही लिया जाता है और अब तक यह साफ़ है ही कि विकास का ज्ञान ‘विनाश’ का ज्ञान होता है. ज्ञानी तो वही हैं जो समाज को एक ऐसे पथ पर आगे ले चलें जिस पर समाज के सभी लोगों की न्यायसंगत और विवेकपूर्ण सक्रियता व भूमिका बने.




हमारे समाज में संवेदना, भाईचारा, त्याग, विवेक, पर-पीड़ा की अनुभूति आदि को ज्ञान के अभिन्न अंग के रूप में देखा जाता रहा है. आज का ‘विकास’ का ज्ञान जिसे हम साइंस कहते हैं, इन सब नैतिक मूल्यों से अछूता है. यानि इन मूल्यों को वह सिद्धांततः ज्ञान का अन्तर्निहित गुण नहीं मानता. इसकी सोच व समझ न हमारे वैज्ञानिकों में है, न राजनेताओं में, न मीडिया में और न विश्वविद्यालयों में पढ़ने-पढ़ाने वाले लोगों में. नतीजा यह है कि इस ‘विकास’ की आंधी में लालच, आक्रामकता, नफ़रत, विलासिता को बड़ा स्थान मिलता जा रहा है. प्राकृतिक संसाधनों की बेतहाशा लूट और किसान-कारीगर समाजों को उजाड़ कर थोड़े से लोगों के लिए वैभव और विलास के महल खड़े करने में बड़ा अधर्म हो रहा है.

गंगा जी मात्र एक नदी नहीं, बल्कि ज्ञान गंगा हैं. धरती माँ की तरह ही वे लोकहित में अपनी सक्रियता को निर्धारित करती हैं और त्याग, ममत्व, सहजीवन, न्याय जैसे गुणों को ज्ञान के अभिन्न अंग के रूप में देखना सिखाती हैं. यह आयोजन गंगाजी की आवाज़ को सुनने, समझने, आत्मसात करने और फ़ैलाने का आग्रह रखता है. इन्हीं बातों पर वार्ता के दौरान श्रीमती शांतिदेवी और श्रीमती चैत्रा देवी के समूह ने गंगाजी के गीत प्रस्तुत किये. ढोलक पर मनोज ने संगत की. चंदा यादव, पारमिता, प्रभावती, प्रेमलताजी, चित्राजी ने गीत गाये जिसमें अन्य महिलाओं ने स्वर मिलाए. प्रेमलताजी ने गंगाजी पर लिखी अपनी कविता और कुछ अन्य कवियों की कवितायेँ भी सुनाई.
प्रेमलताजी ने कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए कहा कि गंगाजी के अतित्व पर संकट के बादल हैं. हम स्त्रियों को इसके बारे में सजग होना है क्योंकि गंगाजी के चलते हमारा भी जीवन, अस्तित्व और सम्मान है. हम सभी स्त्रियाँ माँ होने के नाते जन्म और लालन-पालन के कार्यों में आवश्यक ज्ञान को हासिल करती रही हैं और इस दौरान पर-पीड़ा की समझ, भाव, प्रेम, ममत्व, विवेक, त्याग, संयम, सहजीवन आदि बहुत से गुणों की परख करना सीखती हैं, उन्हें आत्मसात करती हैं. ये गुण हासिल करने की क्रिया ही ज्ञान-तपस्या है. अपने बच्चों में और समाज में इस ज्ञान और इन गुणों को विकसित करना यह हमारा धर्म है. आज इन गुणों को समाज में पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता है. इस कार्य को आगे बढ़ाने का काम स्त्रियों को अपने हाथ में लेना होगा.

कलाकार मनोज का सम्मान करते हुए 


 अंत में श्रीमती शांतिदेवी, श्रीमती चैत्रा देवी व मनोज का लोकविद्या साहित्य और एक गमछे की भेट देकर सम्मान किया गया.

विद्या आश्रम

Thursday, May 30, 2019

भारत की राजनीति में दर्शन की भूमिका - बैठक का जायजा


स्वदेशी दर्शन परम्पराएं और मूल्य आधारित राजनीति
28 मई 2019 को शाम 5 बजे

        28 मई 2019 को शाम 5 बजे दर्शन अखाड़ा, राजघाट, वाराणसी पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन हुआ. विषय था - भारत की राजनीति में दर्शन की भूमिका : स्वदेशी दर्शन परम्पराएं और मूल्य आधारित राजनीति. 
लोकसभा चुनाव नतीजों के सन्दर्भ में यह बैठक आनन-फानन में ही तय हुई थी और सूचना केवल एक दिन पहले ही दी जा सकी थी इसलिए कई लोग नहीं आ पाये. उपस्थित थे - अमरनाथ भाई, योगेन्द्र नारायण शर्मा, मो. आरिफ, मिथिलेश दुबे, रामजनम, फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, प्रेमलता सिंह, चित्रा सहस्रबुद्धे, लक्ष्मण प्रसाद, गोरखनाथ, अरुण कुमार और सुनील सहस्रबुद्धे. 
स्वदेशी दर्शन परम्पराओं से हमारा अभिप्राय गाँधी, कबीर, रविदास, तथा इन जैसे संतों के दर्शन से रहा. इस विचार गोष्ठी में भी राजनीति में दर्शन की भूमिका की बात करते हुए इन्हीं लोगों के दर्शन की ओर ध्यान खींचा गया. विश्वविद्यालयों में या तो इन्हें पढाया नहीं जाता है, या फिर हिंदी, इतिहास, राजनीति शास्त्र जैसे विभागों में पढाया जाता है, दर्शन विभाग में नहीं. इसके चलते और यूरोपीय विचारों के प्रभाव के चलते पढ़े-लिखे लोग इन्हें दार्शनिकों के रूप में सहजता से नहीं देख पाते. जो वैचारिक स्थापनाएं राजनीति में प्रासंगिक हो सकती हैं उन्हें अधिकांश 18 वीं औरे 19 वीं सदी के यूरोप से लिया जाता है और अपने दार्शनिकों के विचार समाज और व्यक्ति स्तर पर ग्राह्य तो माने जाते हैं लेकिन राजनीति में उनकी भूमिका नहीं देखी जाती. हम राजनीतिक सन्दर्भों में सत्य, प्रेम, अहिंसा, न्याय, भाईचारा जैसे विषयों पर कम ही बात करते हैं. अब सत्याग्रह की बात भी सामाजिक संघर्षों से बाहर हो चली है. इन्हीं स्थितियों पर गौर करने के लिए और आवश्यक सुधार की दृष्टि से एक बहस शुरू करने के इरादे से यह चर्चा रखी गई थी और वैसा ही हुआ. जो उभर कर आया वह यह था कि हमें राजनीतिक बहस और क्रियाओं के लिए नए प्रस्थान बिंदु चाहिए. ऐसे प्रस्थान बिंदु जो दर्शन को लोकमन और सामान्य जीवन के इतने नज़दीक देखें कि दार्शनिक व्याख्याओं और राजनैतिक चर्चाओं के बीच अंतर मिटने लगें. लोगों ने कहा कि यह बड़ा प्रश्न है और किसी एक बैठक में ऐसे प्रस्थान बिंदु खोज लिए जायेंगे, यह नहीं हो पायेगा. इसके लिए ऐसी बैठकों का सिलसिला चलना चाहिए और नए-नए लोगों को विमर्श में जोड़ा जाना चाहिए. 
अगले दिन फिर इसी विषय पर विद्या आश्रम में अमरनाथ भाई, मो. आरिफ, नूर फातमा, लक्ष्मण प्रसाद, चित्रा जी और सुनील की आपस में बातचीत हुई.








विद्या आश्रम 

Monday, May 27, 2019

भारत की राजनीति में दर्शन की भूमिका



दर्शन अखाड़ा
ए 11/13 नया महादेव, राजघाट, वाराणसी

निमंत्रण
विचार गोष्ठी
भारत की राजनीति में दर्शन की भूमिका
 स्वदेशी दर्शन परम्पराएं और मूल्य आधारित राजनीति
28 मई 2019 को शाम 5 बजे

28 मई 2019 को शाम 5 बजे दर्शन अखाड़ा, राजघाट, वाराणसी पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन है. विषय है - भारत की राजनीति में दर्शन की भूमिका : स्वदेशी दर्शन परम्पराएं और मूल्य आधारित राजनीति.

बात अब लोकसभा चुनाव की चर्चा के आगे बढ़ जानी चाहिए. भारत के सामाजिक जीवन में दर्शन का एक प्रमुख स्थान हमेशा से रहा है. साम्राज्यवाद ने राजनीति और समाज के बीच जो अलगाव पैदा किये उसे हम आज तक ढो रहे हैं. समाज की दार्शनिक चर्चाओं को राजनीति विस्थापित करती हैं और खुद दर्शन से मुक्त होकर समाज पर शासन के औजार बनाती हैं. भारत की राजनीति ने जिन लोगों को मन की गहराइयों तक उद्वेलित किया है वे तरह-तरह के कोण से समाज में संवेदना और विचार की प्रतिष्ठा के बारे में और खुद विचार पर भी सोचते रहते हैं. मनुष्य स्पष्ट विचार तभी कर पाता है जब अपने को विवश नहीं समझता. यही सब सोचते हुए प्रस्तावित वार्ता की बात बनी. अमरनाथ भाई और विजय नारायण जी से चर्चा करके यह तय किया गया कि दर्शन अखाड़ा राजघाट पर ऐसा कुछ विचार विनिमय किया जाये. आप सभी सादर आमंत्रित हैं. 

सुनील सहस्रबुद्धे                                 गोरखनाथ                               

Tuesday, April 23, 2019

कारीगर किसान पंचायत, वाराणसी


      वाराणसी में शनिवार, 20 अप्रैल 2019 को दोपहर 1 से 4 बजे के बीच पराड़कर भवन, मैदागिन में एक कारीगर-किसान पंचायत का आयोजन हुआ. करीब सौ लोगों की भागीदारी में इस पंचायत ने प्रमुखरूप से ज्ञान की बराबरी और आय की बराबरी का दावा किया.


कारीगर, किसान, हर तरह के मिस्त्री, तरह-तरह की सेवा देने वाले, मरम्मत और रख-रखाव का काम करने वाले, छोटी पूँजी से धंधा करने वाले, पटरी और ठेले वाले और इन सबके घरों की स्त्रियाँ, ये सभी अपने सब काम अपने ज्ञान (लोकविद्या) के बल पर करते हैं. यह कारीगर-किसान पंचायत यह दावा पेश करती है कि इन सबका ज्ञान विश्वविद्यालय के ज्ञान से कम नहीं आँका जा सकता और यह कि इन्हें भी वैसी ही आय का हक़दार माना जाना चाहिए जैसी आय एक सरकारी कर्मचारी की होती है. वक्ताओं ने कारीगरों और किसानों के ज्ञान के विविध पक्षों को उजागर किया और कहा कि इनका ज्ञान विश्वविद्यालय के ज्ञान से अलग होता है. इसके मूल्य, संगठन के तरीके, तर्क के विधान, समाज और प्रकृति से रिश्ते, ये सभी अलग होते हैं. इसी ज्ञान के बल पर समाज की तमाम आवश्यकताएं पूरी की जाती हैं. यह ज्ञान व्यवहार और सिद्धांत दोनों ही स्तरों पर विश्वविद्यालय के ज्ञान से कम नहीं होता. ज्ञान के क्षेत्र में ऊँच-नीच में सामाजिक और आर्थिक ऊँच-नीच पैदा करती है.
 
2019 के आम चुनावों में भाग ले रही सभी पार्टियों और उम्मीदवारों से इस पंचायत की दरख्वास्त है कि खैरात नहीं, इमदाद नहीं, न्यूनतम आय नहीं, गरीबी और मज़दूरी की बात नहीं, बल्कि बात पक्की और नियमित आय की है क्योंकि बात ज्ञान और बराबरी की है.

दुनिया के खुशहाल देशों में शुमार होने के लिए और सबके प्रति न्याय के लिए यह ज़रूरी है कि समाज में प्रचलित हर तरह के ज्ञान को अपना योगदान देने के पूरे मौके मिलें. बराबरी का सम्मान और बराबरी की आय से ही ये मौके तैयार होते हैं. लोकविद्या किसी भी समाज की सबसे बड़ी शक्ति होती है. उसे पहचानो, बराबरी का सम्मान दो, यही हमारी प्रगति का रास्ता है. जज़्बे और इज़ाफे से काम करने के लिए आर्थिक और सामाजिक बराबरी अनिवार्य है. बराबर की आय की मांग इसी शर्त को पूरा करने की तरफ एक कदम है.

काशी के वरिष्ठ समाजवादी चिन्तक विजय नारायण, बुनकरों के नेता अब्दुल हमिद अंसारी, करसडा के किसान संघर्ष की नेता लालती देवी, ग्राम सेवा संघ, बंगलुरु के अभिलाष और लोकहित सृजन समिति सिंगरौली के अवधेश कुमार और सुनील सहस्रबुद्धे, ये सब इस पंचायत के अध्यक्ष मण्डल के सदस्य थे. लक्ष्मण प्रसाद और फ़ज़लुर्रहमान अंसारी ने पंचायत का विचार और प्रस्ताव सबके सामने रखा और पंचायत का सञ्चालन किया. बोलने वालों में प्रमुख रहे -- सुनील सहस्रबुद्धे, विजय नारायण, मोबिन अहमद अंसारी, इदरिस अंसारी, अब्दुल मतीन अंसारी, मुहम्मद अहमद, महेंद्र प्रताप मौर्य, जितेन्द्र तिवारी, रामजनम, लालती देवी, जाग्रति, बाबूलाल मौर्य, रणधीर सिंह, महेंद्र यादव इत्यादि. बंगलुरु से ग्राम सेवा संघ के अभिलाष और सिंगरौली के आदिवासी किसान एकता संगठन से लक्ष्मीचंद दुबे ने अपनी बात रखी.

लोकविद्या जन आन्दोलन (लक्ष्मण प्रसाद 9026219913), कारीगर नज़रिया, (एहसान अली),    भारतीय किसान यूनियन(वाराणसी मण्डल अध्यक्ष जितेन्द्र तिवारी), अंसारी एकता संगठन (फ़ज़लुर्रहमान अंसारी 7905245553), बुनकर दस्तकार अधिकार मंच (इदरिस अंसारी), बुनकर दस्तकार मोर्चा (मोबिन अहमद), गांधी विद्या संस्थान कर्मचारी परिषद (गोरखनाथ यादव ) और स्वराज अभियान (रामजनम) के समर्थन में विद्या आश्रम, सारनाथ ने इस पंचायत को आयोजित किया.

विद्या आश्रम 





Wednesday, April 10, 2019

कारीगर नजरिया

मार्च 2019 से एक अंतराल के बाद 'कारीगर नजरिया' फिर से छपना शुरू हुआ है. फिलहाल आगामी लोकसभा चुनाव के ठोस सन्दर्भों के चलते बहस की ज़रूरतों को ध्यान में रखा गया है. जिन विषयों को सामने रखा गया हैं वे हैं -- ज्ञान, आय और रोज़गार ; बौद्धिक सम्पदा, प्रगति के मानक और जलवायु ; सामाजिक न्याय संघर्ष के आगे के कदम, स्वराज का विचार और वास्तविक सम्भावनायें , सामाजिक और राजनैतिक नेतृत्व से वार्ता व लोकविद्या जन आंदोलन की रिपोर्टिंग, जिसमें ज्ञान पंचायतों की प्रक्रिया और सबकी पक्की आय के दावे प्रमुख हैं.

मार्च के अंक में कारीगर और किसान देश का अजेंडा बनाएं इस पर ज़ोर दिया गया है. सब्सिडी और खैरात से एकदम अलग, गरीबी और मज़बूरी से दूर हटकर ज्ञान पर आधारित आय को जायज़ बताते हुए वस्तुपरक तर्क प्रस्तुत किये गए हैं, तथा इस सन्दर्भ में स्वराज के ज्ञान आधार पर चर्चा है. अविरल निर्मल गंगाजी के लिए साधुओं के त्याग भरे संघर्ष को समर्थन दिया गया है। 

'कारीगर नजरिया' का छठा अंक अप्रैल ,  2019  का  है.  इसमें स्थानीय कारीगरों और राजनीतिक नेताओं से ‘सबकी पक्की और नियमित आय’ के सवाल पर की गई वार्ता को स्थान दिया गया है. इसके अलावा इस प्रश्न को एक बड़े घेरे में भी रखा गया है जिसके अन्तर्गत पूँजी और संपत्ति के प्रश्न पर बहस के लिए एक पहल की गई है और आय की सुरक्षा को ‘शहरीकरण कैसा हो’, महानगरों की तुलना में कस्बाई प्रवृत्ति का हो, इससे जोड़ा गया है.

अप्रैल अंक का  लिंक है: http://www.vidyaashram.org/papers/Karigar%20Najariya-ank-6-April-2019.pdf


मार्च अंक का लिंक है: http://www.vidyaashram.org/papers/Karigar%20Nazaria.pdf-ank-5-Mar-2019.pdf

Tuesday, March 26, 2019

काशी दर्शन के विविध अर्थ

23 मार्च की दोपहर को दर्शन अखाड़े पर 'काशी दर्शन के विविध अर्थ' पर चर्चा हुई. काशी की संस्कृति और समाज की बृहत् जानकारी रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार श्री अमिताभ भट्टाचार्य ने अपनी बात लगभग 25 की संख्या में उपस्थित सामाजिक सरोकार रखने वाले प्रबुद्ध जनों के सामने रखी. उन्होंने ' मैं और हम' का मुहावरा रूप इस्तेमाल किया और काशी को ज्ञान, धर्म, राजनीति इत्यादि में विविध पथों पर संचरण कर रहे लोगों के आपसी सामंजस्य, सौहार्द और संवाद का अद्भुत स्थान बताया . उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आजकल बहुवचन के स्थान पर एकवचन (सेल्फी) के आरोप का दौर चल रहा है, यह अनिष्ट का सूचक है. 




यदि यह दौर चलता रहा तो काशी का बहुवचनीय विविधता का मूल स्वरुप नष्ट हो जायेगा. इसी विविधता में काशी दर्शन के विविध अर्थों को भी देखा जा सकता है. परिचर्चा में वरिष्ठ सहयोगी विजय नारायण सिंह, अशोक मिश्र, राजेंद्र प्रसाद सिंह और अमर बहादुर सिंह ने अपने विचार रखे. काशी के राजनितिक चरित्र से लेकर पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति की अवधारणा तक चर्चा हुई. दर्शन अखाड़ा के संयोजक सुनील सहस्रबुद्धे ने काशी दर्शन के विविध अर्थों के अंतर्गत 'ज्ञान पर्यटन' का विचार सामने रखा, यह कहते हुए कि कबीर, रविदास, रामानंद, पार्श्वनाथ, महात्मा बुद्ध, बाबा विश्वनाथ, माँ गंगा, कृष्णमूर्ति, एनी बेसेन्ट, महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी, इदारतुल - बुहोसिल इस्लामिया जामिया सल्फिया, कीनाराम अवधूत परंपरा , माँ आनंदमयी, ये सब तथा और कई, विविध ज्ञान परम्पराओं से हमारा परिचय काशी की भूमि पर कराते हैं. उन्होंने कहा कि आज 23 मार्च इस चर्चा के लिए बहुत बड़ा दिन है, तथा दर्शन अखाड़े की ओर से भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को उनकी महान शहादत के लिए याद किया और डा. लोहिया को उनके जन्म दिवस के लिए. कहा कि हमें इन सबको एक दार्शनिक के रूप में भी देखने की ज़रूरत है. दर्शन न अमूर्त होना ज़रूरी है और न उसे विश्वविद्यालय की मुहर की दरकार है. दर्शन अविभाज्य और अबाधित चिंतन हैं. बातों को उनकी गहराई और व्यापकता में एक साथ देखने की वृत्ति है. 



अंत में हम सबके वरिष्ठ साथी विश्वास चन्द्र जी ने अपने अध्यक्षीय सम्भाषण में काशी दर्शन के अर्थों को समझने के लिए कुछ पुस्तकों के नाम बताये और कहा कि कभी भी दोपहर को पराड़कर भवन में उनसे मिलकर ये पुस्तकें पढ़ने के लिए प्राप्त की जा सकती हैं.


Tuesday, March 12, 2019

दर्शन अखाड़े का उद्घाटन

क्या विविध ज्ञान परम्पराओं की नगरी काशी में माँ गंगा के उर्वर तट पर दर्शन अखाड़े की शुरुआत एक प्रासंगिक पहल है? क्या हम दर्शन संवाद और राजनीतिक परिचर्चा के बीच तालमेल की ओर आगे बढ़ेंगे ?
वाराणसी में 8 मार्च की शाम को राजघाट पर दर्शन अखाड़ा में करीब 30–35 लोग वार्ता के लिए बैठे. विजय नारायण जी की अध्यक्षता में सुनील ने विषय प्रस्तावित किया, कहा कि सार्वजनिक स्तर पर दर्शन वार्ता होनी चाहिए. अच्छी अथवा नैतिक राजनीति हो इसके लिए समाज में दर्शन वार्ता का प्रचलन एक बड़ी भूमिका निभाता है. लोगों का रोजमर्रे का जीवन और सामान्य वार्ताएं इन सब में दर्शन की गहरी और व्यापक उपस्थिति होती है. आवश्यकता इस बात की है कि सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं पर विशेष ध्यान देने वाले और उन क्षेत्रों में नेतृत्व की भूमिका निभाने वाले स्त्री–पुरुष इस वास्तविकता को तरजीह दें और सामान्य लोगों के साथ नियमित तौर पर दर्शन वार्ता करें. शायद इस काम की शुरुआत सामाजिक कार्यकर्ताओं से होगी. ये लोग सतत विचारशील होते हैं और पहल लेकर काम करते हैं. विद्या आश्रम ने इस दर्शन अखाड़ा की शुरुआत इसीलिए की है. अखाड़ा इसलिए कि प्रतियोगी भाव मोहब्बत से अलग न हो और बाज़ार की दौड़ से मुक्त ये वार्ताएं की जायें. वार्ताओं में भाईचारे व दूसरों के विचार के सम्मान का भाव हो तथा रचनात्मक विचारों पर जोर हो. समाज में ज्ञान पर वार्ता का कार्य विद्या आश्रम शुरू से ही कर रहा है. लोकविद्या और लोकविद्या दर्शन के विचार को इन वार्ताओं के दौर में आकार दिया गया है. अब दर्शन वार्ता के जरिये उम्मीद की जाती है कि समाज के दीर्घकालीन भले के राजनीतिक विचारों के लिए भूमि तैयार की जा सकेगी. उपस्थित लोगों को अपने विचार व्यक्त करने के लिए आमंत्रित किया गया.
लक्ष्मण प्रसाद, गोरखनाथ यादव, रमण पन्त, मुनीज़ा खान, केसर राय, आलम अंसारी, प्रवाल कुमार सिंह, अमित बसोले, वीणा देवस्थली, प्रेमलता सिंह और चित्रा जी ने अपने विचार सबके सामने रखे. सबने अलग–अलग बात कही. दर्शन के इन सबके विचार अलग-अलग रहे तथापि जो बातें कही गईं सब विषय पर ही थीं. इस पर थोड़ी आपसी चर्चा हुई कि विचार अथवा विचारधारा ये शब्द प्रचलित हैं, क्या ये दर्शन से कुछ अलग हैं. कुछ लोगों ने अपने विचार रखे और मोटी सहमति यह रही कि इन वार्ताओं के शुरू में इन सबके बीच अंतर न किया जाए. दर्शन के अंतरगत वार्ताओं में ये क्षमता हो सकती है कि वे हमें इतिहास में प्रचलित शब्दों, अवधारणाओं और विचारों की सीमाओं को लांघने में मदद करें और किसी भी घटना, नीति, विषयवस्तु, आचार-व्यवहार, समाज की अपेक्षाओं व आवश्यकताओं अथवा सैद्धांतिक स्थापनाओं की गहराई में जाने के रास्ते बनाती रहें.
विजय नारायण जी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में आज की राजनीति में व्याप्त गड़बड़ियों व उसमें व्यस्त प्रतिगामी ताकतों का चरित्र उजागर किया और उम्मीद जताई कि दर्शन अखाड़ा की यह पहल स्वच्छ राजनीति करना चाहने वालों के लिए ताकत का एक स्रोत बन सकती है.
अंत में गोरख नाथ यादव ने उपस्थित लोगों का आभार व्यक्त किया और सभी को अल्पाहार के लिए आमंत्रित किया.

darshanakhadablog.wordpress.com नाम से विद्या आश्रम एक ब्लॉग चलाता है. उसे भी देखें.