Sunday, November 1, 2020

रिपोर्ट : बिरादरियों का आत्मसम्मान और राजनीतिक दर्शन

ज्ञान पंचायत 

शनिवार, 31 अक्तूबर 2020, विद्या आश्रम, सारनाथ  

कल अश्विन पूर्णिमा के दिन विद्या आश्रम पर ‘बिरादरियों का आत्मसम्मान और राजनीतिक दर्शन’ इस विषय पर एक ज्ञान पंचायत हुई. लगभग 50 की उपस्थिति रही. कई लोगों ने कहा कि विषय अलग किस्म का है और इस पर उन्होंने पहले से बहुत सोचा हो ऐसा नहीं है. पंचायत ठीक-ठाक ही हुई. बोलने वालों में तुलनात्मक दृष्टि से युवा काफी थे और जो सैद्धांतिक बातें हुईं भी वे बिरादरियों की गति और वर्तमान राजनैतिक परिदृष्य के सन्दर्भ में ही हुई. 

 राहुल कश्यप बिरादरियों के आत्म सम्मान के प्रयासों और राजनीति से संबंधों पर बोलते हुए
मंच पर बाये से - महेंद्र प्रताप मौर्य, सुनील सहस्रबुद्धे, रामजनम और चौधरी राजेंद्र

विद्या आश्रम की समन्वयक चित्रा सहस्रबुद्धे ने विषय प्रवेश कराया जिसमें उन्होंने कहा कि आत्म सम्मान अथवा गौरव को जब तक बिरादरियों के ज्ञान में अवस्थित नहीं किया जायेगा तब तक वह अस्थाई होगा और राजनीतिक दर्शन के स्तर पर विचार को गति दे सकें ऐसा शायद न हो पाए. उसके बाद जैसा कि पहले से घोषित था सुनील कश्यप, अभिषेक तिवारी और लक्ष्मण प्रसाद ने शुरू में अपनी-अपनी बात कही और उसके बाद और लोगों ने अपने विचार रखे.

अभिषेक कुमार  तिवारी व्यक्तिगत और सामाजिक आत्म सम्मान पर विचार साझा करते हुए

जबकि यह बात सबको मान्य थी कि आत्मसम्मान, समाज में सम्मान और गौरवमय इतिहास यह सब आपस में जुड़ा हुआ है और गरीब जनता के लिए समाज में सम्मानजनक स्थान हो इसके लिए जरुरी भी है. और इससे जुड़ी हुई राजनीति का विकास भी होना चाहिए. कुछ लोगों ने इस और ध्यान खींचा कि बिरादरियों के ही कुछ लोग इसका फायदा उठा कर राजनीति में अपने लिए जगह बनाते हैं और बाकी लोगों को पीछे छोड़ देते हैं, जो अवांछनीय है और गलत राजनीति को बढ़ावा देता है. तमाम बिरादरियों में अपने गौरव को आधार बनाकर सेनाएं बनी हैं जो कभी आत्मरक्षा तो कभी दूसरे पर हमला करने के लिए इस्तेमाल की जाती है. इन सेनाओं का नेतृत्व भी असामाजिक होता है. यह भी गौरव पर आधारित राजनीति को गलत दिशा में ले जाता है. यह बात सामने आई कि जाति का जो इतिहास लिखा और पढाया जाता है वह उसे एक सर्वथा स्थिर और बंधी हुई सामाजिक संरचना के रूप में पेश करता है तथा यह कि जातियां हमेशा से ही गतिशील रही हैं और अपने मूल्यों और अपने ज्ञान के जरिये समाज को अपना योगदान कराती रही हैं. जबकि यह बात सच है कि जातियां आज कट्टर ऊँच-नीच का शिकार हैं. यह अवश्य अध्ययन और चिंतन का विषय है कि ऐसी कट्टर ऊँच-नीच कब से और किन रूपों में रही है. यह भी कहा गया कि बिरादरियों के बीच ऊँच-नीच और उनके आत्म सम्मान और गौरव दोनों को उचित स्थान देते हुए उनके ज्ञान और मूल्यों को आधार बनाते हुए इस राजनीतिक दर्शन पर चिंतन ज़रूरी है जो एक नई राजनीति के द्वार खोले. अगर हम सम्मान और गौरव, इसका इतिहास और वर्तमान को सीधे राजनीति से जोड़ना चाहेंगे तो वह मोटे तौर पर वर्तमान राजनीति की सेवा में ही चला जाएगा, जैसा होते हुए देखा भी जा रहा है. आत्म सम्मान और गौरव और राजनीति को आपस में जोड़ने की कड़ी राजनीतिक दर्शन में है. अगर इसे अनदेखा किया गया तो समाज हित का राजनीतिक दखल नहीं तैयार हो पायेगा.

लक्ष्मण प्रसाद बिरादरियों के बीच उंच-नीच को ख़त्म  करने 
और आत्म सम्मान हासिल करने के शोषित समाज के आन्दोलन के बारे में विचार रखते हुए 

राजनीतिक दर्शन की चर्चा सामान्य नहीं है लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं को प्रयास करके इस बारे में सोचना ज़रूरी है. उन्हें लोकस्मृति से, अपने इतिहास से और लोकविद्या के परिप्रेक्ष्य में उस विचार को मूर्त रूप देना है जो हमें एक अपने राजनैतिक दर्शन की ओर ले जायेगा.

राहुल राजभर बिरादरियों की वर्तमान गतिशीलता के बारे में बोलते हुए 

हरिश्चंद्र बिंद, नंदलाल. मोहम्मद अहमद, सुरेश वनवासी, राहुल राज, राम धीरज गुप्ताजी, चौधरी राजेन्द्र, महेंद्र प्रताप मौर्य, राम जनम और सुनील सहस्रबुद्धे ने ज्ञान पंचायत में अपने विचार रखे. ज्ञान पंचायत में इस बार अश्विन पूर्णिमा 31 अक्तूबर को पड़ी. अक्तूबर की 31 तारीख़ सरदार वल्लभ भाई पटेल, आचार्य नरेंद्र देव और आदि कवि वाल्मीकि की जयंती है. इसी दिन देश की प्रधानमन्त्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की हत्या हुई थी, यह उनकी शहादत का दिन भी है. अलग-अलग वक्ताओं ने अपने वक्तव्यों में इनका ज़िक्र किया. ज्ञान पंचायत की शुरुआत युद्धेश के जनगीतों और लोकविद्या के बोल से हुई. 

 अंत में सुनील सहस्रबुद्धे ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है की इस बात को जब हम आगे बढ़ाएंगे तो इस ज्ञान पंचायत में उपस्थित युवाओं में कुछ ऐसे अवश्य हैं, जो बिरादरियों के मान सम्मान से जुड़े राजनैतिक दर्शन पर कुछ आगे की बात करेंगे. इसके बाद सभी ने खीर का प्रसाद ग्रहण किया.


विद्या आश्रम        

Friday, October 30, 2020

ज्ञान पंचायत : बिरादरियों का आत्म सम्मान और राजनीतिक दर्शन

अश्विन पूर्णिमा, शनिवार, 31अक्तूबर, 2020

विद्या आश्रम, सारनाथ, वाराणसी  

विषय प्रवेश

बिरादरीशब्द को खोल कर देखना होगा : बिरादरी का शाब्दिक अर्थ भाईचारे से है, एक ऐसा समुदाय जिसमें सब बराबर हैं. बिरादरी केवल पारंपरिक ही नहीं होती, नई बनती रहती हैं और कुछ अपना अस्तित्व खोती भी रहती हैं. बिरादरी को मुख्यतः पारंपरिक पेशेगत आधार पर देखा जाता हैं. अगर पेशेगत आधार पर देखें ो आधुनिक समाज में भी बिरादरियां दिखाई देती हैं. उदाहरणार्थ डाक्टर, वकील, इंजीनियर, प्रशासक आदि. लेकिन ‘बिरादरी’ शब्द में केवल पेशे का संकेत नहीं है. बिरादरियों के अपने सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, व्यवसाय आदि के मूल्य होते हैं. इसमें व्यापक जीवनमूल्यों और नैतिक संबंधों के दृष्टिकोण भी होते हैं, जो अलग-अलग हो सकते हैं और ‘बिरादरी’ को एक ‘समाज’ का अर्थ प्रदान करते हैं. इस ज्ञान-पंचायत में ‘बिरादरी’ के इस व्यापक अर्थ को स्थान दिया जाना है.

आज़ाद भारत में शुरू से अब तक विभिन्न बिरादरियों के बीच ऊँच-नीच का सवाल प्रमुख बना हुआ है. ऐसे तो बीसवीं सदी के प्रारंभ से ही सार्वजनिक जीवन में बिरादरियों का आत्मसम्मान’ एक महत्त्व का मुद्दा बना. पिछले कुछ दशकों से बिरादरियों के आत्म-सम्मान और गौरव को संगठित ढंग से सामने लाने की कोशिशें हो रही हैं, जिसमें जातीय इतिहास को सामने लाने और जातीय सेनाओं के संगठन की पहल नज़र आ रही है. हम इन मुद्दों पर एक नज़र डाल के अपनी बात रखेंगे.

1.     बिरादरियों में ऊँच–नीच का सवाल और राजनीति : आज़ाद भारत में इस सोच के साथ कि बिरादरियों के बीच ऊँच-नीच सदियों से चली आ रही है, एक किस्म की राजनीति ने आकार लिया, जिसके अंतर्गत ब्राह्मणवाद का विरोध, आरक्षण की नीतियां, जाति-तोड़ो आन्दोलन, जाति-व्यवस्था का निर्मूलन, वर्ग विभाजन से जाति विभाजन को प्रमुख मानना आदि जैसे अभियान, आन्दोलन और सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों ने आकार लिया.  लेकिन आज भी बिरादरियों में ऊँच-नीच है, यह सच है और इसका राजनीति से गहरा सम्बन्ध है, यह भी सच है. संविधान में सभी नागरिक बराबर माने जाने के बावजूद राजनैतिक दल वोट संग्रह के लिए इस ऊँच-नीच का फायदा उठाते हैं. इस राजनीति से जातीय संघर्षों को भी हवा मिलती रहती है. यहाँ दो सवाल हैं. पहला, क्या इस ऊँच-नीच का स्वरुप और पैमाना सदियों से स्थिर है या बदलता रहा है? दूसरा, ‘विकास’ के राजनैतिक दर्शन ने पढ़े-लिखे और कम पढ़े/अनपढ़ लोगों के बीच जो आर्थिक-सामाजिक ऊँच-नीच पैदा की है क्या वह बिरादरियों के बीच की ऊँच-नीच जैसी ही है? बिरादरियों के बीच यह ऊंच-नीच तो ख़त्म होनी ही होगी चाहे वो सदियों से हो या आधुनिक राज्य की ‘विकास’ नीतियों से जन्मी हो. यह एक समग्र राजनैतिक दर्शन की मांग करता है लेकिन दोनों ही प्रकार की बिरादरियों के बीच ऊँच-नीच को ख़त्म करने के लिए एक नैतिक राजनीति का दर्शन चाहिए, वो कहाँ से आएगा?

2.        बिरादरियों का आत्मसम्मान और राजनीति : आज़ाद भारत में बिरादरियों ने अपने-अपने इतिहास को गौरवपूर्ण प्रस्तुत कर आत्मसम्मान को हासिल करने का मार्ग भी चुना है. इस मार्ग पर चलते हुए और आज की राजनीति का दबाव झेलते हुए पिछले दशकों से जातीय सेनाओं के संगठन की पहल भी दिखाई देती है. ब्रह्मर्षि सेना, निषाद सेना, रणवीर सेना, करणी सेना, भूमि सेना, आज़ाद सेना, भीम आर्मी, आदि. इन सेनाओं का आत्म-सम्मान का वैचारिक आधार अधिकतर ‘इतिहास में इनके पास राजसत्ता होने’ का है और आज सेना जैसे ‘बल-संगठन’ का आधार इसे पुनः हासिल करने अथवा अपने गौरव की रक्षा की इच्छा में है. हो सकता है इनके आलावा कुछ अन्य आधार भी हों. इस तरह की पहल बिरादरियों के आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को आकार देने की शुरुआत भी कर रही हैं. लेकिन किसी भी बिरादरी का ‘भौतिक बल’ आधुनिक राज्यसत्ता की ताकत के सामने बहुत छोटा है. ऐसे में ये ताकतें आधुनिक राजनीति/राज्यसत्ता की सेवा में ही अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए बाध्य होती हैं. ये न अपने लिए और न बृहत समाज के लिए न्याय हासिल करने की किसी नैतिक राजनीति के लिए मार्ग खोल सकती हैं.

3.        लोकविद्या आन्दोलन का दृष्टिकोण : लोकविद्या दृष्टिकोण उपरोक्त दोनों बातों, यानि बिरादरियों के बीच ऊँच-नीच को ख़त्म करने और बिरादरियों के आत्मसम्मान की सार्वजनिक स्थापना, को एक साथ लाने में नए मार्ग खुलने की संभावनाओं को देखता है. इसके लिए नीचे लिखे विचार प्रस्थान बिंदु हो सकते है.

·    बिरादरी एक समाज ही होती है और ऐसे कई समाजों से मिलकर हमारा बृहत समाज बना है. बिरादरी का आत्मसम्मान उनके समाज के ज्ञान में देखने पर, बिरादरी ये संस्कृतियों के ऐसे ज्ञान-पुंज दिखाई देंगी जो अपनी स्वायत्त पहचान के साथ स्वयं प्रकाशित हैं.

·    बिरादरी के ज्ञान में उत्पादन, तकनीकी, भण्डारण, वितरण आदि के साथ  कला, दर्शन, शासन, प्रकृति के साथ रिश्ते और अन्य बिरादरियों के साथ संबंधों का ऐसा ज्ञान मिलेगा जो आज ‘आधुनिक ज्ञान’ की क्षमताओं से बाहर हैं. इस ज्ञान के भण्डार को बिरादरियों के आत्मसम्मान का आधार बनाना होगा. उनका ज्ञान ‘आधुनिक ज्ञान’ से अधिक नैतिक व न्याय-संगत हैं इसका दावा पेश करना होगा.

·    पुराने ब्राह्मणवाद और आधुनिक ज्ञान से स्थापित नए ब्राह्मणवाद को एक साथ ख़त्म करने का रास्ता होगा- ज्ञान के आधार पर बराबरी और आत्मसम्मान का दावा करना. इसमें जातियों के बीच ऊँच-नीच को ख़त्म करने की सशक्त शुरुआत हो सकती है.

·    इतिहास हमें दिखाता है कि हमारे देश में विभिन्न कालों में देश के अलग-अलग हिस्सों पर अलग-अलग बिरादरियों के राजाओं ने शासन किया. और इन्हीं राजाओं के दौर में बृहत समाज ने ज्ञान के सभी क्षेत्रों जैसे दर्शन, कला, शिल्प, उत्पादन, गणित, तकनीकी, आदि में ऊँचाइयाँ हासिल कीं. ये कैसे हो पाया? आत्मसम्मान हासिल करने के आंदोलनों में ये किस प्रकार शामिल होगा?

·    केंद्रीकृत आधुनिक शासन में बिरादरियों का स्थान अटपटा ही बनता है. ये ऐसी शासन व्यवस्थाओं का अंग रही हैं और हो सकती हैं जिनमें स्वायत्तता, सम्प्रभुता और सत्ता जनता के अधिक निकट हो.


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चित्रा सहस्रबुद्धे 

विद्या आश्रम 

Thursday, October 29, 2020

Some articles on the Self Respect movement of the early 20th Century

 The Gyan Panchayat on 31st October 2020

 

The Principles of Self-Respect

(from Wikipedia)

The Self-Respect Movement is a South Asian movement with the aim of achieving a society where backward castes have equal human rights, and encouraging backward castes to have self-respect in the context of a caste-based society that considered them to be a lower end of the hierarchy. It was founded in 1925 by S. Ramanathan who invited E. V. Ramasamy (also called as Periyar by his devoted followers) to head the movement in Tamil Nadu.



Periyar was convinced that if man developed self respect, he would automatically develop individuality and would refuse to be led by the nose by schemers. One of his most known quotes on Self-Respect was, "we are fit to think of 'self-respect' only when the notion of 'superior' and 'inferior' caste is banished from our land".

Periyar did not expect personal or material gain out of this movement. He used to recall in a very casual manner that as a human being, he also was obligated to this duty, as it was the right and freedom to choose this work. Thus, he opted to engage himself in starting and promoting the movement.

Periyar declared that the Self-Respect Movement alone could be the genuine freedom movement, and political freedom would not be fruitful without individual self-respect. He remarked that the so-called 'Indian freedom fighters' were showing disrespect of self-respect, and this was really an irrational philosophy.

Periyar observed that political freedom as conceived by nationalists such as Gandhi and Jawaharlal Nehru and others did not cover individual self-respect. To him neither revival of the original spirit of Hindu religion and ancient traditions which formed part of Gandhi's conception of freedom, nor complete liberation from the British rule which was considered by Nehru to be the meaning of freedom or both of them together could ensure individual self-respect or the eradication of social ills from Indian society. In his opinion, the task of fulfilling the need for self-respect would have to be faced whatever be the extent of political freedom gained. Pointing out that even the British monarch in a sovereign independent nation had no freedom to marry a person of his choice and had to abdicate his kingdom, Periyar raised a question whether Gandhi's vision of freedom or Nehru's concept of independence contained even an iota of individual self-respect.

Periyar believed that self-respect was as valuable as life itself and its protection is a birthright and not swaraj ('political freedom'). He described the movement as Arivu Vidutalai Iyakkam, that is, a movement to liberate the intellect.

The terms tan-maanam or suya mariyadai meaning 'self-respect' are traceable in ancient Tamil literature considered a virtue of high valor in Tamil society. Periyar once claimed that to describe the ideology of his movement, no dictionary or language in the entire world could provide a word better than or equal to suya mariyadai.

Started as a movement (Iyakkam in Tamil) to promote rational behavior, the Self-Respect Movement acquired much wider connotation within a short period of time. Periyar, speaking with M.K. Reddy at the First Self-Respect Conference held in 1929, explained the significance of self-respect and its principles. The main principles of the Self-Respect Movement in society were to be: no kind of inequality among people; no difference such as rich and poor in economic life; men and women to be treated as equals in every respect without differences; attachments to caste, religion, varna, and country to be eradicated from society with a prevalent friendship and unity around the world; with every human being seeking to act according to reason, understanding, desire, and perspective, and shall not be subject to slavery of any kind or manner.

Equality with stress on economic and social equality formed the central theme of the Self-Respect Movement and was due to Periyar's determination to fight the inequalities ingrained in the caste system as well as certain religious practices. Working on the theme of liberating the society from the baneful social practices perpetrated in the name of dharma and karma, Periyar developed the idea of establishing this movement as the instrument for achieving his objective.

Self Respect

Periyar's philosophy of self-respect was based on his image of an ideal world and a universally accepted one. His philosophy preaches that human actions should be based on rational thinking. Further, the outcome of the natural instinct of human beings is to examine every object and every action and even nature with a spirit of inquiry, and to refuse to submit to anything irrational as equivalent to slavery. Thus, the philosophy of self-respect taught that human actions should be guided by reason, right and wrong should follow from rational thinking and conclusions drawn from reason should be respected under all circumstances. Freedom means respect to thoughts and actions considered 'right' by human beings on the basis of 'reason'. There is not much difference between 'freedom' and 'self-respect'.[55]

Periyar's foremost appeal to people was to develop self-respect. He preached that the Brahmins had monopolised and cheated other communities for decades and deprived them of self-respect. He stated that most Brahmins claimed to belong to a "superior" community with the reserved privilege of being in charge of temples and performing archanas. He felt that they were trying to reassert their control over religion by using their superior caste status to claim the exclusive privilege to touch idols or enter the sanctum sanctorum.[52]

Women’s rights

As a rationalist and ardent social reformer, Periyar advocated forcefully throughout his life that women should be given their legitimate position in society as the equals of men and that they should be given good education and have the right to property. He thought age and social customs was not a bar in marrying women. He was keen that women should realise their rights and be worthy citizens of their country.[56]

Periyar fought against the orthodox traditions of marriage as suppression of women in Tamil Nadu and throughout the Indian sub-continent. Though arranged marriages were meant to enable a couple to live together throughout life, it was manipulated to enslave women. Much worse was the practice of child marriages practised throughout India at the time. It was believed that it would be a sin to marry after puberty. Another practice, which is prevalent today, is the dowry system where the bride's family is supposed to give the husband a huge payment for the bride. The purpose of this was to assist the newly wedded couple financially, but in many instances dowries were misused by bridegrooms. The outcome of this abuse turned to the exploitation of the bride's parents wealth, and in certain circumstances, lead to dowry deaths. There have been hundreds of thousands of cases where wives have been murdered, mutilated, and burned alive because the father of the bride was unable to make the dowry payment to the husband. Periyar fiercely stood up against this abuse meted out against women.

Women in India also did not have rights to their families' or husbands' property. Periyar fought fiercely for this and also advocated for women to have the right to separate or divorce their husbands under reasonable circumstances.While birth control remained taboo in society of Periyar's time, he advocated for it not only for the health of women and population control, but for the liberation of women.

He criticised the hypocrisy of chastity for women and argued that it should either apply also to men, or not at all for both genders. While fighting against this, Periyar advocated getting rid of the Devadasi system. In his view it was an example of a list of degradations of women, attaching them to temples for the entertainment of others, and as temple prostitutes. Further, for the liberation of women, Periyar pushed for their right to have an education and to join the armed services and the police force.

Thoughts on the Thirukkural

Periyar hailed the Thirukkural as a valuable scripture which contained many scientific and philosophical truths. He also praised the secular nature of the work. Periyar praised Thiruvalluvar for his description of God as a formless entity with only positive attributes. He also suggested that one who reads the Thirukkural will become a Self-respecter, absorbing knowledge in politics, society, and economics. According to him, though certain items in this ancient book of ethics may not relate to today, it permitted such changes for modern society.

On caste, he believed that the Kural illustrates how Vedic laws of Manu were against the Sudras and other communities of the Dravidian race. On the other hand, Periyar opined that the ethics from the Kural was comparable to the Christian Bible. The Dravidar Kazhagam adopted the Thirukkural and advocated that Thiruvalluvar's Kural alone was enough to educate the people of the country.

Periyar also asserted that due to the secular nature of Thirukkural, it has the capacity to be the common book of faith for all humanity and can be kept on par or above the holy books of all religions.


The Self-Respect Movement — The Emergence of South Indian Politics

By Vedika Agarwalla



The Self-Respect Movement was founded in 1921 by S.Ramanathan and invited E.V Ramasamy to head the campaign. E.V Ramasamy, popularly known as Periyar is regarded as the ‘Father of Modern Tamil Nadu.’ Periyar was a social activist, politician and a thinker who was way ahead of his time. He was the pillar of the Dravidian framework and philosophy that went on to shape the politics of Tamil Nadu.The Self-Respect Movement is also known as the Dravidian Movement. The three main ideologies that were propagated through this movement were the breaking down of the Brahminic hegemony, equal rights for the backward classes and women in the society and revitalization of the Dravidian languages which included Telugu, Tamil, Kannada, and Malayalam.

It opposed the domination of Brahmins as the superior class and hence, encouraged the facilitation of self-respect for those belonging to the lower end of the caste-based society in India. The movement believed in the principle of individuality which could be developed only when one gains self-respect.The movement had a lofty goal of achieving equality in various spheres of life. It wanted the liberation of the society from baneful social practices performed in the name of caste and religion which led to a vicious cycle of discrimination such as the practice of caste-based occupation and untouchability. The method of casteism led people to act in an irrational manner which hampered the ability of people to act according to reason, understanding, and perspective.

One of the most critical and significant sociological change that occurred through the Self-Respect Movement was the enforcement of self-respect marriages in which a marriage could be officiated without a Brahmin priest, as the ceremonies were usually conducted in Sanskrit which most people lacked an understanding of and therefore rituals were based on blind adherence. The movement regarded marriages to be not bound by caste and hence encouraged inter-caste and inter-religious marriages where one should be able to marry a person of their choice. The self-respect marriages stood for widows remarrying as well, because the prevalence of child marriages widowed many girls at a young age. Consequently, the movement was able to garner a wide audience of woman.Tamil Nadu was one of the first states to legalize Hindu marriages without the presence of a Brahmin priest which led to an increase of inter-caste marriages.

Apart from the anti-caste ideologies, the Self- Respect Movement had a deep-rooted sense of feminist values. It advocated for a society where a woman had the freedom over their physical, sexual and reproductive choice. Periyar’s model focused on enabling woman to gain access to contraception as well as permanent birth control; this came at a time when there was an extensive national talk on anti-conception medication. The feminist ideology of the movement propelled woman to have an equal right to choose partners, to divorce and the choice to remarry. The Self-Respect Movement wanted to bring a radical transformation in the heterosexual relationships by abolishing gender hierarchy and gender roles. It emphasized the importance of sharing domestic work and child-rearing activities among men and woman.

One of the primary aims of the movement was to eradicate the devadasi system which was prevalent in the eastern and southern parts of the country. In this system a woman between the ages of 7-36 were to dedicate their lives to the temple deity where they performed various arts. Initially the status of a devadasi was considered to be respectable, but later on, at the time of the colonial era, the devadasi system was condemned on the grounds of practicing prostitution as they bore many children to the priest and wealthy patronages. Moreover, the devadasi system isolated these woman from the society. Hence the movement consisted of women from all walks of life who were actively engaged in protests fighting for human rights. The basic motto of the Self-Respect Movement was to bring social changes in the society. It touched lives from all the strata of the community – not only attacked the caste system prevalent at that time, but also advocated for gender equality.

Even though Periyar never wanted this movement to become political, gradually it became so. As the movement slowly turned political, the leaders associated with it became power hungry, and corruption crept in. The origin of the two major political parties of Tamil Nadu- DMK and AIADMK can be traced to the Dravidian movement. Both these parties of Tamil Nadu have ruled the state for more than half a century. These parties have defiantly brought significant social changes, but subsequently, their main aim became to capture the popular mandate and vote bank politics. Unfortunately, most of the mass movements in our country which have noble intentions of bringing radical changes in our society tend to deviate from its intended goal.


 

Tuesday, October 27, 2020

बिरादरियों का आत्म-सम्मान और राजनीतिक दर्शन

 

निमंत्रण

ज्ञान-पंचायत

विषय : बिरादरियों का आत्म-सम्मान और राजनीतिक दर्शन

दिन : अश्विन पूर्णिमा, शनिवार, 31 अक्टूबर, 2020

समय : दोपहर 2.00 बजे से

स्थान : विद्या आश्रम, सारनाथ, वाराणसी  


हर वर्ष की भांति इस बार भी अश्विन पूर्णिमा के दिन विद्या आश्रम एक ज्ञान-पंचायत का आयोजन कर रहा है. इस ज्ञान-पंचायत का विषय है- ‘बिरादरियों का आत्मसम्मान और राजनीतिक दर्शन’. सदियों से चली आ रही जातिगत ऊँच-नीच और उसके उन्मूलन के राजनीतिक दर्शन हैं. बिरादरियों के आत्मसम्मान और गौरवमय इतिहास से एक दूसरे किस्म के राजनीतिक दर्शन की और संकेत होता है. यह राजनीतिक दर्शन कैसा हो सकता है और ऊँच-नीच को चुनौती देने में इसकी क्या भूमिका हो सकती है? क्या इन दोनों दृष्टियों के बीच समन्वय और एक नये राजनीतिक दर्शन की ओर कदम बढ़ाना भारत के ऊँच-नीच से मुक्त और न्यायसंगत भविष्य के लिए ज़रूरी है?

ज्ञान-पंचायत में पहले निम्नलिखित तीन सामाजिक कार्यकर्त्ता

विषय पर अपने विचार खेंगे और फिर पंचायत में खुली बातचीत होगी.

प्रमुख वक्ता

सुनील कश्यप (समता परिवार’ संस्थापक सदस्य और कारवाँ पत्रिका के रिपोर्टर)

अभिषेक तिवारी (‘Owl Sabha  संस्थापक सदस्य तथा संपादक ‘दी सभा’)

लक्ष्मण प्रसाद (‘विद्या आश्रम’ संस्थापक सदस्य तथा वाराणसी जिला अध्यक्ष, भारतीय किसान यूनियन)

आप इस ज्ञान–पंचायत में सादर आमंत्रित हैं.

चित्रा सहस्रबुद्धे

समन्वयक

विद्या आश्रम

संपर्क फोन : 9838944822, 9026219913

Sunday, September 20, 2020

Ordinay Life and Emancipatory Politics

     Struggles against the violations of ordinary life may be said to constitute the political, in an emancipatory sense.

     State, Science and Capital are the sources of violation of ordinary life in the contemporary world. So struggles against Science, against Capital and against the State constitute emancipatory activities, activities for the recovery of the human in the ordinary sense of the word. In common parlance they will be radical political activities. But there arises a strange situation thereby. That activity is thus called political activity which aims at uprooting the political society.  Political society is the one which has emerged with the appearance of Science, Capital and the State. By now almost all language, at least the language of the public domain, is largely the language of this political society. So properly speaking emancipatory struggles are not political struggles and yet they are called 'political struggle’ in common parlance .  This terminological or linguistic problem is solvable may be in the context of a  radical knowledge movement. So if one wants to do or talk of politics in the emancipatory sense then one must locate his/her activity and discourse in a knowledge movement. Some of these things become very clear when we see these things happening during Gandhi’s time. We may see Gandhi as the builder of a new knowledge movement and a new political movement, both of which may be justifiably called emancipatory movements.

     If we see this country as divided between India and Bharat then all politics after Independence represents India.  If you see Science, State and Capital intertwined with one another you would be seeing India.  Politics worth  its salt would be produced perhaps by coming together of a knowledge movement of the people, a lokaidya movement, and an assertion that ordinary life needs to be restored to its pre-eminent  status.

      In the modern world separation of ‘knowledge ‘ and ‘being’ again dates back to the period of emergence of Science, Capital and the State. Seeing them as chief sources of violation of ordinary life, also gives us that conceptual space where knowledge and being are not separated. Lokavidya and ordinary life are then inseparable. Cognition of one without the other is not possible. Ordinary life is the only dwelling that lokavidya knows and lokavidya is what knowledge in ordinary life is called. Then we will see that an emancipatory political movement is not separable from a peoples’ knowledge movement.

       Bharat and India may also be seen as each being in the other. One can easily point out various aspects of life and aspirations in Bharat which are similar to the life and aspirations in India and conversely, one may see various aspects of life in Bharat spread out in India. The idea of ordinary life bridges division, ought not to create new ones. Ordinary life is not just the life of ordinary men and women, it is ubiquitous. The sant-parampara is the tradition of creation and re-creation of ordinary life in thought and in practice in ever new circumstances (of violation, marginalization, suppression etc.).

Sunil Sahasrabudhey