Monday, November 21, 2022

लोकनीति संवाद

वाराणसी ज्ञान पंचायत की पहल : लोकनीति-संवाद 

लोक और लोकनीति के समकालीन अर्थ  की खोज में वाराणसी ज्ञान पंचायत की ओर से लोकनीति-संवाद की एक श्रृंखला  चली.  पहला लोकनीति-संवाद 11 अक्तूबर 2022 से चलाया जा रहा है. वाराणसी नगर निगम के चुनाव नवम्बर-दिसंबर में होने जा रहे हैं, इस मौके पर यह संवाद चलाना प्रासंगिक मालूम हुआ. प्रत्येक गुरुवार और रविवार को क्रमश: राजघाट और अस्सीघाट पर लोकविद्या सत्संग के साथ यह संवाद चलाया जाता है. संवाद की अब तक दस कड़ियाँ हो चुकी हैं. हर कड़ी में दो-तीन वक्ता आमंत्रित किये जाते रहे हैं.

लोकनीति : लोकनीति के मायने प्रकृति के साथ तालमेल में जीवन गढ़ने के प्रकारों में हैं. इसी में जीवन और समाज के नैतिक उत्थान और विकास का रास्ता है. लोकनीति में सम्पूर्ण लोक के खुशहाली की नीतियाँ निहित है जबकि राजनीति मात्र कुछ ही लोगों के स्वार्थ की सेवा करती रही है. ऐसे में लोकनीति को मज़बूत करना आवश्यक है. लोकनीति के बल पर ही राजनीति को मर्यादित करने के रास्ते खुलते हैं. सामान्य लोगों के पास ज्ञान होता है और इनके ही जीवन में समकालीन नैतिक मूल्य भी पलते हैं. इन्हीं के बल पर लोकनीति को गढ़ा जा सकता है.

लोकनीति-संवाद का उद्देश्य : समाज में ज्ञान की उन विविध धाराओं को, जो लोकहित में हैं, जीवंत हैं, नैतिक शक्तियों को बल प्रदान करती हैं, उन्हें पहचानना और समाज के बीच लाना इस संवाद का उद्देश्य है. इस दिशा में अभी तक आठ कड़ियों में जिन विषयों पर संवाद हुए हैं, उनमें प्रमुख हैं--- लोकनीति बनाम राजनीति, स्थानीय निकायों की नगर और नागरिकों के प्रति ज़िम्मेदारी, लोकविद्या और लोकनीति के बीच अन्योन्याश्रित रिश्ता, नगर विकास और व्यवस्थाओं में विविध ज्ञान-धाराओं के समावेश का आग्रह, नगर की नैतिक विरासत और दर्शन, गाँव-शहर के बीच सम्बन्ध, नगर का धार्मिक-सामाजिक-आर्थिक ताना-बाना, जैसे विषयों की वैचारिकी के प्रकाश में नगर का पर्यावरण, गंगाजी और घाटों की स्वछता और रखरखाव, मल्लाहों और नाविकों के विस्थापन का सवाल, नगर में ऑटो चालकों की परेशानियाँ, सीवर और कूड़े का निस्तारण आदि जैसे दैनिक जीवन की महत्वपूर्ण समस्याओं के प्रति सभासद की जिम्मेदारियों पर संवाद को गति मिली.

वक्ता : कारीगर नजरिया की  प्रेमलता सिंह, भारतीय किसान यूनियन के नगर अध्यक्ष कृष्ण कुमार क्रांति, राजघाट के नाविक दुर्गा प्रसाद सहनी, ऑटो चालक यूनियन के अध्यक्ष ज़ुबेर खान, पर्यावरण रखरखाव स्वयंसेवी संगठन के रवि शेखर और एकता शेखर, दिल्ली विश्वविद्यालय के शोध छात्र पुनीत, वार्ड 63 के सभासद उम्मीदवार फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, काशी हिन्दुविश्वविद्यालय के छात्र प्रत्यूष, ‘गाँव के लोग’ पत्रिका के संपादक रामजी सिंह, गाँधी विद्या संस्थान संकाय सदस्य और रजिस्ट्रार डॉ. मुनीज़ा खान, दर्शन अखाड़ा के संयोजक गोरखनाथ, सलारपुर से बौद्ध विचारक महेंद्र प्रताप मौर्य, छित्तनपुरा के बुनकर एहसान अली, अस्सी घाट के निषाद देशराज , माँ गंगाजी निषाद सेवा समिति के हरिश्चंद्र बिन्द, वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्त्ता अरुण कुमार, चंदवक के विद्या आश्रम के सदस्य विनोद कुमार, भारतीय किसान यूनियन के वाराणसी जिला अध्यक्ष लक्ष्मण प्रसाद, नाटीइमली के बुनकर मोहम्मद अहमद, रामनगर कालेज की अध्यापिका डॉ. चटर्जी, डॉ. पारमिता, वरिष्ठ पत्रकार सुरेश प्रताप सिंह प्रमुख रहे हैं. प्रत्येक संवाद में स्थानीय लोग शामिल होते रहे हैं.  

वाराणसी ज्ञान पंचायत की ओर से चित्रा सहस्रबुद्धे और रामजनम ने सञ्चालन किया और लक्ष्मण प्रसाद, फ़ज़लुर्रहमान और हरिश्चंद्र बिन्द ने संवाद को स्थानीय समाजों के नज़रिये के साथ तराशा और निखारा. लोकनीति संवाद का क्रम आगे भी जारी रहेगा.

इस संवाद के साथ ही सुर साधना पत्रिका के दो अंक भी प्रकाशित हुए. 

चित्रा सहस्रबुद्धे 

विद्या आश्रम  


Saturday, August 6, 2022

रपट: स्वराज ज्ञान पंचायत 2 अगस्त 2022

विद्या आश्रम और वाराणसी ज्ञान पंचायत के संयुक्त प्रयास से 2 अगस्त 2022 को एक स्वराज ज्ञान पंचायत का आयोजन हुआ.  विद्या आश्रम स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित इस ज्ञान पंचायत में किसान यूनियन के नेताओं व कारीगरों के आलावा सामाजिक कार्यकर्त्ता, छात्र और नौजवानों की भागीदारी हुई.

ज्ञान पंचायत शुरू होने के पहले लोकविद्या सत्संगके गायकों ने लोकविद्या के पद गाकर लोकविद्या और किसान तथा कारीगर समाजों  को ज्ञानी समाजों के रूप में प्रतिष्ठित किया. 
स्वराज ज्ञान पंचायत की शुरुआत विद्या आश्रम द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘न्याय, त्याग और भाईचारा: किसान आन्दोलन और भावी समाज दृष्टि’ के विमोचन के साथ हुई. वाराणसी और आस-पास जिलों के किसान यूनियन के नेता और वाराणसी के कार्यकर्त्ता अच्छी संख्या में उपस्थित थे. पुस्तक का विमोचन भारतीय किसान यूनियन के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष श्री राजपाल शर्मा ने किया. 

उन्होंने अपने वक्तव्य में केन्द्र सरकार को घोर किसान विरोधी बताते हुए कहा कि वे किसान आन्दोलन के चलते किसानों के साथ हुए हर समझौते और आश्वासन के खिलाफ जा रहे हैं. एम.एस.पी. की लड़ाई को केन्द्रीय महत्त्व का बनाते हुए संगठन और  संघर्ष पर विशेष जोर दिया. साथ में उपस्थित राष्ट्रीय सचिव श्री सुरेश यादव का भी सहृदय और तर्कपूर्ण भाषण सुनने को मिला.

श्री सुनील सहस्रबुद्धे ने कहा कि पुस्तक किसान आन्दोलन का सन्देश बताती है. पुस्तक में जिन लोगों के लेख हैं वे सब पूरी ज़िन्दगी किसान आन्दोलन में रहे हैं और इस आस्था के लोग 
हैं कि किसानों के नेतृत्व में ही एक सभ्य समाज का निर्माण हो सकेगा.उन्होंने पुस्तक के नाम में न्याय, त्याग औरभाईचारा का विशेष महत्त्व रेखांकित किया है और बताया कि इन्हीं विचारों के अंतर्गत किसानों ने भारत की संत परंपरा को जिंदा रखा है. मूल सन्देश यही है कि इन विचारों में एक सभ्य समाज का आधार है, जिसका निर्माण किसान भारत की ज्ञान और तर्क परंपरा के जरिये करेगा, जो उसमें रची-बसी है.

भोजन के पहले के सत्र में चर्चा का विषय रहा ‘हर किसान परिवार की आय सरकारी कर्मचारी जैसी होनी चाहिए’. इसका सैद्धांतिक आधार यह बताया गया कि किसान ज्ञानी है और उसका ज्ञान विश्वविद्यालय की विद्या से कमतर नहीं है. इसलिए उसके ज्ञान से होने वाले कामों में भी वही आय होनी चाहिए जो विश्वविद्यालय की डिग्री से मिलने वाली नौकरियों में होती हैइस सत्र के मुख्य वक्ता रहे -लक्ष्मण प्रसाद, भाकियू अध्यक्ष वाराणसी जिला, राजेश आज़ाद, संयोजक संयुक्त किसान मोर्चा आजमगढ़ (उ.प्र.) और फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, संयोजक बुनकर साझा मंच. लक्ष्मण प्रसाद ने किसान के ज्ञान के विभिन्न आयामों को सामने लाया और बताया कि किसतरह इसके तिरस्कार और शोषण से वर्तमान सामाजिक और आर्थिक व्यवस्थाएं संचालित होती हैं. 

          

राजेश आज़ाद ने विषय को महत्वपूर्ण मुद्दा कहकर इसका पुरजोर समर्थन किया साथ ही किसान समाज के अंतर्गत ही गरीब किसानों और खेतिहर मज़दूरों की परिस्थितयों और शोषण की ओर ध्यान आकर्षित किया, जबकि फ़ज़लुर्रहमान अंसारी ने किसान के ज्ञान की तरह ही कारीगर के ज्ञान की व्याख्या की और हर कारीगर परिवार के लिए भी सरकारी कर्मचारी जैसी आय होने के लिया सुसंगत तर्क प्रस्तुत किये.

दोपहर के सत्र में विषय था – ‘किसान-नौजवान एकता में स्वराज के सूत्र हैं’. सत्र का सञ्चालन पारमिता ने किया और स्वराज अभियान के रामजनम ने विषय प्रवेश किया. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसानों की आय और नौजवानों के लिए रोज़गार दोनों ही सवालों का हल चल रही व्यवस्था में नहीं हो सकेगा और यह कि एक नए राजनैतिक और आर्थिक ढांचे का विचार बनाना पड़ेगा जिसमें इन दोनों सवालों का हल हो. यह राजनैतिक-आर्थिक ढांचा स्वराज के नाम से जाना जा सकता है. 
 
वर्तमान के किसान आन्दोलन और नौजवानों के रोज़गार आन्दोलन की आपसी दोस्ती को केवल फौरी न मान कर इस नज़र से देखा जाए तो स्वराज के सूत्र खोजने में मदद हो सकती है. इस सत्र के प्रमुख वक्ता रहे- धनञ्जय त्रिपाठी, बीएचयू, संयोजक, ज्वाइंट एक्शन कमिटी, हरिश्चंद्र बिन्द,राष्ट्रीय महासचिव, माँ गंगा निषाद सेवासमिति, और इप्शिता, भगत सिंह छात्र मोर्चा, बीएचयू. गोष्ठी का समापन वरिष्ठ समाजवादी चिन्तक और विद्या आश्रम के मित्र श्री विजयनारायण ने किया. न्होंने कहा कि वार्ता बहुत अच्छी हुई  है, कुछ स्पष्ट निर्णय कीजिये और आगे बढ़ें.
 

                

ज्ञान पंचायत का अंत इस उद्घोष के साथ हुआ कि

 "राजपाल तुम आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ हैं."


आशा है कि विश्वविद्यालय के छात्र, सामाजिक कार्यकर्त्ताओं और किसान यूनियन के कार्यकर्ताओं की यह संयुक्त उपस्थिति और चर्चा, देश और समाज के भविष्य पर विमर्श के नए द्वार खोल सकती है. विद्या आश्रम स्वराज ज्ञान पंचायत की अगली कड़ियाँ बनाने के प्रयास में रहेगा.


---विद्या आश्रम 

Sunday, July 31, 2022

निमंत्रण : स्वराज ज्ञान पंचायत

 

निमंत्रण                                                                                                         स्थापना : 1 अगस्त 2004

विद्या आश्रम के स्थापना दिवस के अवसर पर

स्वराज ज्ञान पंचायत का आयोजन 

दिन :     मंगलवार, 2 अगस्त 2022

समय :   सुबह 11.00 बजे

स्थान :   विद्या आश्रम, सा 10/82,

             अशोक मार्ग, सारनाथ, वाराणसी

विचार

वाराणसी ज्ञान पंचायत और विद्या आश्रम की पहल पर 2 अगस्त 2022 को विद्या आश्रम पर एक स्वराज ज्ञान पंचायत का आयोजन है.

लगभग हर युग में भारत भूमि के कोने-कोने में ऐसे संत, विचारक और दार्शनिक हुए हैं, जिन्होंने अपने समय के राज और समाज के बीच सत्य, न्याय और परस्पर ज़िम्मेदारी और कर्तव्यों को प्राथमिकता देने वाले संबंधों को बनाने में प्रभावी भूमिका अदा की है. यहाँ की देसी  शासन व्यवस्थाओं में संवाद और सभी की भागीदारी हो पाने के लिए पंचायतों की भूमिका को सबसे अधिक महत्पूर्ण बनाया. इन पंचायतों में समाज संगठन का एक सुगठित और तर्कनिष्ठ विचार रहा है. हर युग में इसे नवीन और संवर्धित किया गया. स्वराज का विचार इसी प्रक्रिया का नतीजा है.

आज जब दुनिया भर में राजसत्तायें लोकविरोधी, प्रकृति विरोधी हो गयी हैं और कुछ ही लोगों के लालच को संतुष्ट करने में जुट गई हैं ऐसे में समाज संगठन के सत्य आधारित और न्यायपूर्ण विचारों की खोज तेज़ हो गई है. हमारी अपनी भूमि पर निश्चित ही ऐसे विचारों का विशाल भण्डार है. हाल ही में हुए ऐतिहासिक किसान आन्दोलन ने इसके लिए रास्ता भी खोल दिया है. एक व्यापक समझ यह हो सकती है कि रोज़गार के लिए खड़ा नौजवानों का आन्दोलन और किसान आन्दोलन आपस में दोस्ती के मार्फ़त नई राह खोजें. किसान आन्दोलन ने नौजवान आन्दोलन को समर्थन देकर अपनी ओर से हामी भर दी है.

यह स्वराज ज्ञान पंचायत उन प्रस्थान बिन्दुओं की खोज करेगी, जो न्याय, त्याग और भाईचारे को समाज पुनर्निर्माण के लिए आवश्यक बुनियादी मूल्यों की प्रतिष्ठा दें.   

कार्यक्रम 

   प्रथम सत्र : पुस्तक का विमोचन,  सुबह 11.00 बजे

·         भारतीय किसान यूनियन, उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष श्री राजपाल शर्मा के हाथों विद्या आश्रम से प्रकाशित पुस्तक न्याय, त्याग और भाईचारा : किसान आन्दोलन और भावी समाज दृष्टि’  का विमोचन होगा.

पुस्तक का परिचय : -सुनील सहस्रबुद्धे, अध्यक्ष, विद्या आश्रम  

·         किसान आन्दोलन के सन्दर्भ में ‘हर किसान परिवार की आय सरकारी कर्मचारी की आय के बराबर हो’ पर चर्चा  

·         प्रमुख वक्ता :

-लक्ष्मण प्रसाद, अध्यक्ष, भाकियू वाराणसी जिला

-राजेश आज़ाद, संयोजक, संयुक्त किसान मोर्चा आजमगढ़ (उ.प्र.)

-फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, संयोजक, बुनकर साझा मंच

3.                           दूसरा सत्र : दोपहर 2.30 बजे

·         चर्चा का विषय : किसान-नौजवान एकता में स्वराज के सूत्र है.

·         विषय प्रवेश : रामजनम

·         प्रमुख वक्ता :

            -हरिश्चंद्र बिन्द,राष्ट्रीय महासचिव, माँ गंगा निषाद सेवा समिति

       - इप्शिता, भगत सिंह छात्र मोर्चा, बीएचयू

  -धनञ्जय, संयोजक, ज्वाइंट एक्शन कमिटी, बीएचयू

·         खुली चर्चा और समापन

 

निवेदक

वाराणसी ज्ञान पंचायत की ओर से

लोकविद्या जन आन्दोलन, भारतीय किसान यूनियन, स्वराज अभियान,

बुनकर साझा मंच, माँ गंगाजी निषादराज सेवा समिति

संपर्क

चित्रा सहस्रबुद्धे (9838944822), लक्ष्मण प्रसाद (9026219913), रामजनम (8765619982),

फ़ज़लुर्रहमान अंसारी (7905245553),  हरिश्चंद्र बिन्द (9555744251)

विद्या आश्रम 

 

 

Tuesday, July 26, 2022

How Democratic is Democratic India: Lalit Kumar Kaul

 

How Democratic is Democratic India?

                                                                      Lalit K Kaul

India is a democratic country because we have Parliamentary Democracy. We are a democratic Nation because Parliament embodies “the Will of the People" that manifests through their elected representatives who are supposed to carry their aspirations- social, economical, religious and political- to the “Temple of Democracy" for finding their resolution through debates, laced with logical reasoning, among the people's representatives from all political parties. As logic would have it, at the end of electioneering, voting and declaration of election results, those elected to the Parliament are Indian people's representatives and not of their individual political outfits, but that's not how it works out in the Parliament.

The Whip and Freedom of Expression/Speech:

It's one thing to get a Bill passed in both the houses of Parliament and another to have a democratic content in its proceedings leading to enactment of the Bill. Passage of a Bill introduced by the ruling party is a number game, and becomes void of any democratic content, once a whip is issued to all its MPs to vote in favour of the Bill.

One can get away with anything that one may speak within the walls of a Parliament because that level of immunity from law of the land is provided to every parliamentarian; in most of the cases such speeches/comments would attract some clause of IPC, outside the Parliament and Assembly. That's unlimited freedom of expression. Yet, this freedom to state a point of view in context of the introduced Bill is taken away from each and every MP by issuing a party Whip that MPs should vote on party lines.

Freedom of Speech/Expression is meaningless in absence of this Freedom to have an Opinion; because only when one has an opinion on an matter- social, economical, religious and political- this freedom to express can/may be utilized to express that opinion uninhibitedly. Therefore, the very act of issuing a Whip is to strangle a very natural human instinct/attribute – opinion making.

It's nigh impossible to believe/accept a thesis that all the MPs of a political outfit have one & only one opinion on the introduced Bill that's going to become a law, if passed; but if indeed the difference of opinion is truly non- existent among the MPs of a political outfit, then it doesn't portend well for Indian democracy because Parliament is not supposed to house herds of sheep obeying the command of herdsman.

And, if, indeed, they are like herd of sheep then the Parliament need not house them because herdsman can directly take decisions unilaterally and make laws without legislating on them. That makes the Parliament infructuous which indeed it remains in view of the party Whip.

Lot of noise is made about freedom of expression and people (outside Parliament/Assemblies) make full use of it as do the highly polarized Media. Such exercises can be termed as one’s ‘past time' for, it doesn't matter what people think about enactment of a certain Law in the Parliament while their representatives’ opinion was stifled by virtue of a Whip.

Do MPs truly represent people?

No, not really. The electorate doesn't vote for a MP or MLA candidate of a political outfit. They vote for the party's leader.

During Smt. Indira Gandhi years, the Congress party won majority in Parliament and State Assemblies not because the contestants were popular among the electorate (exceptions are always there), but that Indira ji was leading them. People voted for Mrs. Gandhi and in 1977 they voted against her for Congress to experience humiliating defeat in the general elections.

Similarly, the NDA was born because Sri A B Vajpayee had a political stature and standing that made leaders of other political outfits to join BJP. People voted for Sri A B Vajpayee and not for BJP and, like during Indira ji days, it never mattered who were contestants in various constituencies from where BJP fought elections. Replace Sri Vajpayee with Sri L K Advani, NDA wouldn't have been born. Sri Advani led NDA election campaign twice, 2004 and 2009, but people didn't vote for him and NDA lost the general elections.

Then in 2014, came “Maut Ka Saudagar" on to the central stage to lead NDA and people voted for Sri Narendra D Modi as PM candidate and BJP for first time won majority in the Parliament, on its own. Rest is the history. Political commentators/analysts, economists of different shades and others may agree or disagree with his government's policies; may even question the Indian military on their missions; people voted him back to power with much bigger numbers in favour of BJP. So, it is Modi ji at the helm and whoever contests, a majority of them are bound to win; the unknown faces.

Had Indira ji shifted to CPM, CPM would have swept the polls; today, if Modi ji joins Congress, it will sweep the polls; BJP will disappear into an oblivion like Congress got on to the crutches post assassination of Indira ji; Rajiv Gandhi having won on the dead body of his mother and his government and governance turned out to be a huge scandal in that for the first time in the history of independent India, a PM had been directly charged with corrupt ways.

Popular saying is: let a 4-legged donkey contest under Modi ji's leadership, the chances of donkey winning may not be slim!

Is Parliament a non-representative body?

Obviously Yes. The “people's representatives” from the ruling party side are disallowed to vote for or against the Bill based on their opinion; not allowed to question certain points related to it; and the Opposition is always pre-determined to oppose everything and anything that the ruling party may introduce for legislation. In such a scenario how do people get represented in the whole process of passing/ blocking the proposed Bill.

The passage of 3 Agri Bills in the Parliament followed by their unilateral withdrawal by an address to the people of India; without going back to the Parliament and follow due process for their withdrawal, not only undermined the stature of the Parliament, but also rendered a fatal blow to the democratic content within the Parliament. It also exemplified undemocratic way of functioning.

No Democracy Within Parliament! How would it be Outside?

In a system where democracy begins and ends with casting of vote in elections, is by no definition of the term a Democratic Set-up.

People are informed through annual budget about, how the economy would grow; increase or decrease in defense budget, if any; investments in health and education sector; transportation and aviation sector, et al. A vast majority from among the MPs, belonging to all political outfits, don't have any clue about the economics or defense preparedness or, for that matter, anything that concerns ordinary citizens- their vote bank.

How much of a feedback/information is collected from “people's representatives” regarding requirements of their constituencies is not known, as it's never made public. What's known though is that the Finance ministry has a meeting or two with FICCI & ASSOCHAM, before finalizing the budget; in such meetings their requirements are noted down because they are supposed to create jobs, but more than that are to do large scale election funding. All political outfits are funded depending upon their chances to be in the future government.

It's an oligarchy at the helm that decides the fate/future of 135 crore people. What kind of an economic model is being pursued since decades now, is poignantly betrayed by the fact that 80 crore people are to be provided basic needs of life free of cost (as per Modi ji's statement). That corona vaccination had to be provided free, is a political gimmick or it's about accepting the harsh reality that people don't have purchasing power. Feeding 80 crores free may be a remarkable act of charity and human compassion, but it's a hard slap on the self respect and dignity of such hapless people whom the entrenched economic model disallows to make sufficient earnings enabling them to take independent decisions at their level and that too democratically in consultation with their family members.

A street dog/ a pet before irrigating a place goes around sniffing before finalizing the same. Same process this dog repeats for adding fertilizer to the soil. So does a bird, which flies from tree to tree and from house to house to fix a suitable place for its nest, before building the same. All this implies that the Mother Nature has ingrained every living being with the instinct of 1) selecting/determining a few options, 2) deciding to choose one from among them and 3) implementing the chosen option.

To select a few samples and then choose one from them to put into use for day-to-day life, is the democratic right of all living beings as ordained. The Indian democratic set up has succeeded in robbing a very large section of the society of that democratic exercise. The government shall decide upon gas connection and number of them in a family; size of the toilets and their numbers in a household; and indeed, the floor area for a house, because all these are to be given free as a display of human compassion and the ones who have been robbed of their enterprise have no say in such acquisitions that are going to be an inseparable part of their day-to-day life. This is not only undemocratic, but more than that it's about making a human life as undignified as it can, perhaps, get.

Distributing free, robs this individual of the happiness/satisfaction that one draws from buying it on one's own strength and at one's own discretion.

To deprive humans of such freedoms and democratic functioning which even animals and birds enjoy, is the greatest scar on Indian democratic set-up. How that scar can be healed is a Question that needs to be answered, perhaps, by designing a democratic set-up which affords every individual opportunities to contribute to the development and growth of Indian society by employing their knowledge base without being discriminated against by labeling them as backward, superstitious and unscientific.

 

 

Tuesday, May 3, 2022

वाराणसी ज्ञान पंचायत रविवार, 1 मई 2022, सुबह 8 बजे से

                  विषय : परंपरा की खोज

वाराणसी के अस्सी घाट पर 1 मई 2022 को सुबह 8 बजे से वाराणसी ज्ञान पंचायत का आयोजन हुआ. विषय था ‘परंपरा की खोज’. सन्दर्भ रहा नामवर सिंह की पुस्तक ‘दूसरी परंपरा की खोज’ जिसमें उन्होंने हजारी प्रसाद द्विवेदी के लेखन के मार्फ़त साहित्य में संत परंपरा की भूमिका की मौलिकता उजागर की है. चूँकि 1 मई  मजदूर दिवस के नाम से मनाया जाता है और इसी दिन नामवर सिंह का जन्म दिन भी माना जाता है, यह दिन इस बहस के लिए विशेष उपयुक्त माना गया. संयोगवश हजारी प्रसाद की पुण्यतिथि भी इसी माह की 19 तारीख को पड़ती है. कहने की आवश्यकता नहीं है दोनों का गहरा जुड़ाव वाराणसी से रहा, जहाँ उनकी उपस्थिति को आज भी महसूस किया जाता है.


उगते सूरज के आत्मोत्सर्ग के आवाहन में गंगाजी के किनारे अस्सी घाट पर पीपल के  नीचे बैठकर लोकविद्या सत्संग के पदों की गायकी से ज्ञान पंचायत की शुरुआत हुई. संत वाणी में लोकविद्या दर्शन बिखरा पड़ा है. कबीर के पदों पर आधारित इस  लोकविद्या गायकी में कारीगर समाजों को बड़ा स्थान है. बुनकर, किसान, रंगरेज़, धोबी, लोहार, कलवार, बहेलिया, बनिया, स्त्री आदि समाजों के मूल्यों, जीवन व कार्यों के मार्फ़त ज्ञान और दर्शन की मौलिक स्थापनाओं को सामू भगत, सर्विंद पटेल और युद्धेश ने गा कर सामने लाया. 

लोकविद्या जन आन्दोलन की राष्ट्रीय संयोजक चित्रा जी ने इस बात पर बल दिया कि भारत के लिए मजदूर दिवस का महत्त्व कारीगर दिवस के रूप में ही हो सकता है,  उस कारीगर की ज़िन्दगी पर प्रगाढ़ नज़र डालने के लिए, जो अपना सारा काम अपनी विद्या के बल पर करता है. और जिसे केवल उसके श्रम की आधी-चौथाई मजदूरी मिलती है, उसके ज्ञान का मूल्य तो आँका भी नहीं जाता, भुगतान तो दूर की बात है. अमेरिका के मज़दूरों के  1 मई के महान संघर्ष को लोकविद्या की प्रतिष्ठा के लिए आवश्यक संघर्ष के सन्दर्भ में तब्दील कर दिया जाना चाहिए. लोकविद्या यानि मेहनतकाश वर्गों की ज्ञान परंपरा. इसी में परंपरा की किसी भी खोज के मूल तत्व ढूंढ़े जाने चाहिए. इस भूमि की परम्परा में ज्ञान-विज्ञान और कला के बीच कोई दीवार नहीं खड़ी की गई. उलटे बहुत बार तो दोनों को अलग-अलग पहचानना मुश्किल हो जाता है. रोजमर्रे के कार्यों यानि सामान्य जीवन की गतिविधियों में ललित कला और ज्ञान-विज्ञान दोनों ही व्यापक तौर पर मिश्रित/एकीकृत दिखाई देते हैं. यह परम्परा विभेदीकरण की नहीं बल्कि संश्लेषण की है. यह भी कहा जा सकता है कि यह सत्य के निर्माण और पुनर्निर्माण की परंपरा है.

स्वराज अभियान के रामजनम संचालन कर रहे थे. उन्होंने शुरू में ही विषय की स्थापना करते हुए परंपरा की खोज के बहुआयामी विस्तार को रेखांकित किया और परम्परा की ओर देखने की उस दृष्टि का आग्रह किया जो स्वराज और स्वदेशी की मौलिकता पहचानने और इनके फौरी महत्त्व को उजागर करने में मदद करे.

आमंत्रित वक्ता के रूप में बोलते हुए प्रगतिशील लेखक संघ के संजय श्रीवास्तव ने नामवर सिंह के बारे में कुछ रोचक तथ्य बताते हुए परंपरा की विविधता की ओर ध्यान आकर्षित किया. विशेषकर यह कहा कि ज्ञान-परंपरा की चर्चा में अक्सर चार्वाक और लोकायत को नज़रंदाज़ कर दिया जाता है. इससे परम्परा की समझ बनाने में खामी रह जाती है. जिस मध्य युगीन भक्ति/ज्ञान/साहित्य परम्परा को हजारी प्रसाद के लेखन ने पुनर्जागृत किया और नामवर सिंह ने बड़ी सफाई से सबको समझाया वह ज्ञान-परंपरा बहुत पुरानी है, बुद्ध और चार्वाक के समय तक तो जाती ही है.

बीएचयू के प्रोफ़ेसर रामाज्ञा शशिधर का उल्लेख विशेषरूप से किया जाना चाहिए. उन्होंने अपने वक्तव्य से पंचायत को विशेषतौर पर समृद्ध किया. यह बताया कि किस तरह हजारी प्रसाद ने भारतीय परंपरा के गर्भ से संतों की वाचिक परंपरा को सामने लाकर रख दिया. उन्होंने इस बात को समझाया कि यूरोप में ज्ञान को सत्ता के रूप में देखा गया जबकि भारत में संवाद, पंचायत और लोक के साथ क्रियात्मक सम्बन्ध में ज्ञान निर्मित और पुनर्निर्मित होता रहा. इस बात का महत्त्व यह कहकर भी बताया कि नामवर सिंह शुरू के कुछ साल तो लिखते रहे लेकिन बाद में सालों घूमते रहे, लोक के बीच जाते रहे और अपनी बात कहते रहे, जिसमें उच्च दर्शन और रोजमर्रे की मनुष्य की ज़रूरतों का बढ़िया समन्वय देखने को मिलता है. परम्परा लोकस्थ होती है और वाचिक होती है यह बात नामवर के जीवन में चरितार्थ होती देखी जा सकती है. ज्ञान परम्परा के पुनरुज्जीवन और संवर्धन का स्थान और तरीका, काशी और पंचायत, एक आशा बांधता है.

एक और महत्वपूर्ण वक्तव्य सुनील सहस्रबुद्धे का हुआ. उन्होंने अपनी बात किसान आन्दोलन से शुरू की और कहा कि किसान इस देश की तर्क परम्परा के वाहक हैं. कोई भी ज्ञान, समझ, कला, संचार सभी कुछ अपनी तर्क की विधा के साथ एकीकृत होता है. उसे उसकी तर्क की विधा से अलग कर दीजिये अथवा तर्क की किसी दूसरी विधा को उस पर फिट करने की कोशिश कीजिये तो वह नष्ट हो जायेगा. आप जो करना चाहते हैं वह नहीं कर पाएंगे. उन्होंने कहा कि परम्परा लोकस्थ ही होती है, जिसतरह लोकविद्या लोकस्थ ही होती है. लोक के बाहर इनका रूप और सार बिलकुल अलग हो जाता है. सूत्र के रूप में समझें तो परम्परा में जानकारियों का भण्डार होता है, मूल्यों की एक व्यवस्था होती है और तर्क की एक विधा होती है, जो सब लोकसम्मत होता है. आप चाहें कि लोकविद्या का भण्डारण कंप्यूटर में कर लें तो यह नहीं हो पायेगा. क्योंकि कंप्यूटर में संयोजन, गति और बदलाव का तर्क अलग है. लोक में यह तर्क अलग है. कंप्यूटर में मूल्यों की व्यवस्था अलग है, अथवा कंप्यूटर मूल्यों के प्रति निरपेक्ष होता है. जबकि लोक में सभी कुछ मूल्यों से निर्देशित होता है. जानकारियों का एक स्थिर भंडारण कंप्यूटर में हो सकता है तथापि परम्परा तो सर्वथा गतिशील होती है और इसीलिए अपने वाचिक रूप में ज्यादा पहचानी जाती है. वाचिक परम्परा अथवा लोकविद्या आम आदमी की तर्कबुद्धि से मेल खाती है. उसी के साथ जीती और संवर्धित होती रहती है.

अंत में प्रेमलताजी ने इस अवसर के लिए लिखी लोक जीवन को समर्पित अपनी  कविता प्रस्तुत की.

ज्ञान, कर्म, कौशल, श्रम अलग कहाँ,  दूध और पानी जैसे घुला-मिला

‘किसान कारीगर रचें नव विहान, आओ, विचारों को एक नयी धार दें.

 पंचायत में कई संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की भागीदारी रही. भारतीय किसान यूनियन के लक्ष्मण प्रसाद और कृष्ण कुमार, बुनकर साझा मंच से फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, माँ गंगा निषादराज सेवा समिति से हरिश्चंद्र बिन्द, जय गुरुदेव संप्रदाय से अशोक शर्मा. वाराणसी के सामाजिक कार्यकर्त्ता समूह से रविशेखर, प्रेमलताजी और बीएचयू के कुछ छात्र और छात्राएं.

वाराणसी ज्ञान पंचायत एक प्रक्रिया है, जहाँ ज्ञान पर मंथन, चिंतन और जन सुनवाई होती है. इस पंचायत में किसान, कारीगर, प्रोफ़ेसर, स्त्रियाँ, डाक्टर, इंजीनीयर, रिक्शाचालक, अध्यापक, कलाकार सभी के ज्ञान को बराबर सम्मान है. विविध, धर्म, जाति, विचारधारा, और व्यवसाय से जुड़े लोगों को बराबर की मान्यता हैं.

--विद्या आश्रम, सारनाथ

 

इस वाराणसी ज्ञान पंचायत के निमंत्रण का परचा नीचे दिया है.

वाराणसी ज्ञान पंचायत का निमंत्रण

 1 मई को लोकविद्या प्रतिष्ठा दिवस के रूप में मनाया जाए इस प्रस्ताव के साथ अस्सी घाट पर वाराणसी ज्ञान पंचायत का आयोजन किया जा रहा है. यह दिवस मजदूर दिवस के नाम से मनाया जाता है. लोकविद्या प्रतिष्ठा का मतलब है भारत भूमि की बुनियादी ज्ञान परम्परा की प्रतिष्ठा.

हिंदी साहित्य के दार्शनिक लेखक हजारी प्रसाद ने लोक परम्पराओं को सभ्यता और संस्कृति की बुनियादी परम्परा माना है. इन्हीं के शिष्य नामवरसिंह ने ‘दूसरी परम्परा की खोज’ नाम से एक पुस्तक लिख कर अपने गुरू को श्रद्धांजलि अर्पित की है. संयोग है कि 1 मई नामवर जी का जन्म दिवस है और 19 मई को हजारी प्रसाद जी की पुण्यतिथि है. वाराणसी से इन दोनों ही विद्वानों का गहरा सम्बन्ध रहा. लोकविद्या की प्रतिष्ठा के रास्तों की खोज व निर्माण के संकल्प के लिए यह दिवस उचित ही है.

आज दुनिया के सभी देश एक बहुत बड़ी उथल-पुथल के दौर से गुज़र रहे हैं. 1 मई का दिवस 1880 में अमेरिका में कारखानों में मज़दूरों के काम के घंटे घटाकर 8 घंटे किये जाने की मांग के संघर्ष की याद में मनाया जाता है. यह औद्योगिक युग के ज़माने की बात है. आज सूचना युग में उत्पादन बड़े-बड़े कारखानों में नहीं होता. पूँजी का प्रकार, उत्पादन के तरीके और शोषण का रूप सभी कुछ बदल गया है. मनुष्य के श्रम, ज्ञान, विरासत और संसाधन, सभी के मूल्य को हड़पने की व्यवस्थाएं आकार ले चुकी हैं. मुनाफा उठाने के स्थान कारखानों की जगह बाज़ार बनाये गए हैं. अब औद्योगिक युग में किसानी और कारीगरी को तबाह कर कारखानों में काम करने के लिए जो सस्ते मज़दूर पैदा किये गए थे उन्हें वापस समाज में फेंक दिया गया और उन्हें वित्तीय पूँजी के जाल में फांस कर घर पर ही परिवार के साथ या छोटी-छोटी इकाइयों में काम के लिए मजबूर किया गया. इस प्रक्रिया में औद्योगिक युग का मज़दूर आज कारीगर में बदल गया. लेकिन यह कारीगर आज की दुनिया का कारीगर है न कि औद्योगिक युग के पहले का.

आज का यह कारीगर छोटी पूँजी के प्रबंधन का ज्ञानी है. यह छोटा किसान है, बुनकर, लोहार, प्लंबर है, ट्रक-मोटर का ड्राइवर है या इनके मरम्मत और रखरखाव के कार्य करता है, यह ठेले-पटरी-गुमटी या छोटी दूकान करने वाला है, कंप्यूटर पर टाइप करता है या मरम्मत और रखरखाव करता है, यह मल्लाह, धोबी, या सफाई कर्मी हैं, कुम्हार, वनवासी और बढई है, ऑटो-रिक्शा चालक है, आदि. ये सब मिलकर इस देश की आबादी का लगभग 80 फीसदी है. यह विशाल कारीगर-समाज सर्वहारा नहीं है. इन्हें मज़दूर नहीं कहा जा सकता. इन्हें असंगठित क्षेत्र का कर्मी या अकुशल कर्मी कहना भी गलत होगा.

हम कहते हैं कि ये विविध समाजों के 80 फीसदी लोग ही आज लोकविद्या परम्परा के वाहक हैं. हजारी प्रसाद जी ने इन्हें ही बुनियादी परम्परा के वाहक कहा है. ये ही नामवर जी की ‘दूसरी परंपरा’ के नाम से चिन्हित किये गए हैं. 1 मई का दिवस इन्हीं के ज्ञान की प्रतिष्ठा का दिवस होना चाहिए. इनके ज्ञान की प्रतिष्ठा इन्हें ही नहीं बल्कि पूरे समाज को खुशहाली, भाईचारा और न्याय के पथ पर ला सकेगी.

इन सभी समाजों के ज्ञान में इस न्याय-पथ के निर्माण के भ्रूण भी हैं. दुनिया के एक्वाडोर, बोलीविया जैसे देशों में इन्हीं समाजों के ज्ञान-भ्रूणों को अब कोंपलें फूट पड़ी हैं. आज का दिवस हम इसी दिशा में चिंतन की शुरुआत करने के लिए जुटे हैं.

--वाराणसी ज्ञान पंचायत की ओर से

लोकविद्या जन आन्दोलन, भारतीय किसान यूनियन(अराजनीतिक), स्वराज अभियान,

बुनकर साझा मंच, माँ गंगाजी निषादराज सेवा समिति