Tuesday, May 3, 2022

वाराणसी ज्ञान पंचायत रविवार, 1 मई 2022, सुबह 8 बजे से

                  विषय : परंपरा की खोज

वाराणसी के अस्सी घाट पर 1 मई 2022 को सुबह 8 बजे से वाराणसी ज्ञान पंचायत का आयोजन हुआ. विषय था ‘परंपरा की खोज’. सन्दर्भ रहा नामवर सिंह की पुस्तक ‘दूसरी परंपरा की खोज’ जिसमें उन्होंने हजारी प्रसाद द्विवेदी के लेखन के मार्फ़त साहित्य में संत परंपरा की भूमिका की मौलिकता उजागर की है. चूँकि 1 मई  मजदूर दिवस के नाम से मनाया जाता है और इसी दिन नामवर सिंह का जन्म दिन भी माना जाता है, यह दिन इस बहस के लिए विशेष उपयुक्त माना गया. संयोगवश हजारी प्रसाद की पुण्यतिथि भी इसी माह की 19 तारीख को पड़ती है. कहने की आवश्यकता नहीं है दोनों का गहरा जुड़ाव वाराणसी से रहा, जहाँ उनकी उपस्थिति को आज भी महसूस किया जाता है.


उगते सूरज के आत्मोत्सर्ग के आवाहन में गंगाजी के किनारे अस्सी घाट पर पीपल के  नीचे बैठकर लोकविद्या सत्संग के पदों की गायकी से ज्ञान पंचायत की शुरुआत हुई. संत वाणी में लोकविद्या दर्शन बिखरा पड़ा है. कबीर के पदों पर आधारित इस  लोकविद्या गायकी में कारीगर समाजों को बड़ा स्थान है. बुनकर, किसान, रंगरेज़, धोबी, लोहार, कलवार, बहेलिया, बनिया, स्त्री आदि समाजों के मूल्यों, जीवन व कार्यों के मार्फ़त ज्ञान और दर्शन की मौलिक स्थापनाओं को सामू भगत, सर्विंद पटेल और युद्धेश ने गा कर सामने लाया. 

लोकविद्या जन आन्दोलन की राष्ट्रीय संयोजक चित्रा जी ने इस बात पर बल दिया कि भारत के लिए मजदूर दिवस का महत्त्व कारीगर दिवस के रूप में ही हो सकता है,  उस कारीगर की ज़िन्दगी पर प्रगाढ़ नज़र डालने के लिए, जो अपना सारा काम अपनी विद्या के बल पर करता है. और जिसे केवल उसके श्रम की आधी-चौथाई मजदूरी मिलती है, उसके ज्ञान का मूल्य तो आँका भी नहीं जाता, भुगतान तो दूर की बात है. अमेरिका के मज़दूरों के  1 मई के महान संघर्ष को लोकविद्या की प्रतिष्ठा के लिए आवश्यक संघर्ष के सन्दर्भ में तब्दील कर दिया जाना चाहिए. लोकविद्या यानि मेहनतकाश वर्गों की ज्ञान परंपरा. इसी में परंपरा की किसी भी खोज के मूल तत्व ढूंढ़े जाने चाहिए. इस भूमि की परम्परा में ज्ञान-विज्ञान और कला के बीच कोई दीवार नहीं खड़ी की गई. उलटे बहुत बार तो दोनों को अलग-अलग पहचानना मुश्किल हो जाता है. रोजमर्रे के कार्यों यानि सामान्य जीवन की गतिविधियों में ललित कला और ज्ञान-विज्ञान दोनों ही व्यापक तौर पर मिश्रित/एकीकृत दिखाई देते हैं. यह परम्परा विभेदीकरण की नहीं बल्कि संश्लेषण की है. यह भी कहा जा सकता है कि यह सत्य के निर्माण और पुनर्निर्माण की परंपरा है.

स्वराज अभियान के रामजनम संचालन कर रहे थे. उन्होंने शुरू में ही विषय की स्थापना करते हुए परंपरा की खोज के बहुआयामी विस्तार को रेखांकित किया और परम्परा की ओर देखने की उस दृष्टि का आग्रह किया जो स्वराज और स्वदेशी की मौलिकता पहचानने और इनके फौरी महत्त्व को उजागर करने में मदद करे.

आमंत्रित वक्ता के रूप में बोलते हुए प्रगतिशील लेखक संघ के संजय श्रीवास्तव ने नामवर सिंह के बारे में कुछ रोचक तथ्य बताते हुए परंपरा की विविधता की ओर ध्यान आकर्षित किया. विशेषकर यह कहा कि ज्ञान-परंपरा की चर्चा में अक्सर चार्वाक और लोकायत को नज़रंदाज़ कर दिया जाता है. इससे परम्परा की समझ बनाने में खामी रह जाती है. जिस मध्य युगीन भक्ति/ज्ञान/साहित्य परम्परा को हजारी प्रसाद के लेखन ने पुनर्जागृत किया और नामवर सिंह ने बड़ी सफाई से सबको समझाया वह ज्ञान-परंपरा बहुत पुरानी है, बुद्ध और चार्वाक के समय तक तो जाती ही है.

बीएचयू के प्रोफ़ेसर रामाज्ञा शशिधर का उल्लेख विशेषरूप से किया जाना चाहिए. उन्होंने अपने वक्तव्य से पंचायत को विशेषतौर पर समृद्ध किया. यह बताया कि किस तरह हजारी प्रसाद ने भारतीय परंपरा के गर्भ से संतों की वाचिक परंपरा को सामने लाकर रख दिया. उन्होंने इस बात को समझाया कि यूरोप में ज्ञान को सत्ता के रूप में देखा गया जबकि भारत में संवाद, पंचायत और लोक के साथ क्रियात्मक सम्बन्ध में ज्ञान निर्मित और पुनर्निर्मित होता रहा. इस बात का महत्त्व यह कहकर भी बताया कि नामवर सिंह शुरू के कुछ साल तो लिखते रहे लेकिन बाद में सालों घूमते रहे, लोक के बीच जाते रहे और अपनी बात कहते रहे, जिसमें उच्च दर्शन और रोजमर्रे की मनुष्य की ज़रूरतों का बढ़िया समन्वय देखने को मिलता है. परम्परा लोकस्थ होती है और वाचिक होती है यह बात नामवर के जीवन में चरितार्थ होती देखी जा सकती है. ज्ञान परम्परा के पुनरुज्जीवन और संवर्धन का स्थान और तरीका, काशी और पंचायत, एक आशा बांधता है.

एक और महत्वपूर्ण वक्तव्य सुनील सहस्रबुद्धे का हुआ. उन्होंने अपनी बात किसान आन्दोलन से शुरू की और कहा कि किसान इस देश की तर्क परम्परा के वाहक हैं. कोई भी ज्ञान, समझ, कला, संचार सभी कुछ अपनी तर्क की विधा के साथ एकीकृत होता है. उसे उसकी तर्क की विधा से अलग कर दीजिये अथवा तर्क की किसी दूसरी विधा को उस पर फिट करने की कोशिश कीजिये तो वह नष्ट हो जायेगा. आप जो करना चाहते हैं वह नहीं कर पाएंगे. उन्होंने कहा कि परम्परा लोकस्थ ही होती है, जिसतरह लोकविद्या लोकस्थ ही होती है. लोक के बाहर इनका रूप और सार बिलकुल अलग हो जाता है. सूत्र के रूप में समझें तो परम्परा में जानकारियों का भण्डार होता है, मूल्यों की एक व्यवस्था होती है और तर्क की एक विधा होती है, जो सब लोकसम्मत होता है. आप चाहें कि लोकविद्या का भण्डारण कंप्यूटर में कर लें तो यह नहीं हो पायेगा. क्योंकि कंप्यूटर में संयोजन, गति और बदलाव का तर्क अलग है. लोक में यह तर्क अलग है. कंप्यूटर में मूल्यों की व्यवस्था अलग है, अथवा कंप्यूटर मूल्यों के प्रति निरपेक्ष होता है. जबकि लोक में सभी कुछ मूल्यों से निर्देशित होता है. जानकारियों का एक स्थिर भंडारण कंप्यूटर में हो सकता है तथापि परम्परा तो सर्वथा गतिशील होती है और इसीलिए अपने वाचिक रूप में ज्यादा पहचानी जाती है. वाचिक परम्परा अथवा लोकविद्या आम आदमी की तर्कबुद्धि से मेल खाती है. उसी के साथ जीती और संवर्धित होती रहती है.

अंत में प्रेमलताजी ने इस अवसर के लिए लिखी लोक जीवन को समर्पित अपनी  कविता प्रस्तुत की.

ज्ञान, कर्म, कौशल, श्रम अलग कहाँ,  दूध और पानी जैसे घुला-मिला

‘किसान कारीगर रचें नव विहान, आओ, विचारों को एक नयी धार दें.

 पंचायत में कई संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की भागीदारी रही. भारतीय किसान यूनियन के लक्ष्मण प्रसाद और कृष्ण कुमार, बुनकर साझा मंच से फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, माँ गंगा निषादराज सेवा समिति से हरिश्चंद्र बिन्द, जय गुरुदेव संप्रदाय से अशोक शर्मा. वाराणसी के सामाजिक कार्यकर्त्ता समूह से रविशेखर, प्रेमलताजी और बीएचयू के कुछ छात्र और छात्राएं.

वाराणसी ज्ञान पंचायत एक प्रक्रिया है, जहाँ ज्ञान पर मंथन, चिंतन और जन सुनवाई होती है. इस पंचायत में किसान, कारीगर, प्रोफ़ेसर, स्त्रियाँ, डाक्टर, इंजीनीयर, रिक्शाचालक, अध्यापक, कलाकार सभी के ज्ञान को बराबर सम्मान है. विविध, धर्म, जाति, विचारधारा, और व्यवसाय से जुड़े लोगों को बराबर की मान्यता हैं.

--विद्या आश्रम, सारनाथ

 

इस वाराणसी ज्ञान पंचायत के निमंत्रण का परचा नीचे दिया है.

वाराणसी ज्ञान पंचायत का निमंत्रण

 1 मई को लोकविद्या प्रतिष्ठा दिवस के रूप में मनाया जाए इस प्रस्ताव के साथ अस्सी घाट पर वाराणसी ज्ञान पंचायत का आयोजन किया जा रहा है. यह दिवस मजदूर दिवस के नाम से मनाया जाता है. लोकविद्या प्रतिष्ठा का मतलब है भारत भूमि की बुनियादी ज्ञान परम्परा की प्रतिष्ठा.

हिंदी साहित्य के दार्शनिक लेखक हजारी प्रसाद ने लोक परम्पराओं को सभ्यता और संस्कृति की बुनियादी परम्परा माना है. इन्हीं के शिष्य नामवरसिंह ने ‘दूसरी परम्परा की खोज’ नाम से एक पुस्तक लिख कर अपने गुरू को श्रद्धांजलि अर्पित की है. संयोग है कि 1 मई नामवर जी का जन्म दिवस है और 19 मई को हजारी प्रसाद जी की पुण्यतिथि है. वाराणसी से इन दोनों ही विद्वानों का गहरा सम्बन्ध रहा. लोकविद्या की प्रतिष्ठा के रास्तों की खोज व निर्माण के संकल्प के लिए यह दिवस उचित ही है.

आज दुनिया के सभी देश एक बहुत बड़ी उथल-पुथल के दौर से गुज़र रहे हैं. 1 मई का दिवस 1880 में अमेरिका में कारखानों में मज़दूरों के काम के घंटे घटाकर 8 घंटे किये जाने की मांग के संघर्ष की याद में मनाया जाता है. यह औद्योगिक युग के ज़माने की बात है. आज सूचना युग में उत्पादन बड़े-बड़े कारखानों में नहीं होता. पूँजी का प्रकार, उत्पादन के तरीके और शोषण का रूप सभी कुछ बदल गया है. मनुष्य के श्रम, ज्ञान, विरासत और संसाधन, सभी के मूल्य को हड़पने की व्यवस्थाएं आकार ले चुकी हैं. मुनाफा उठाने के स्थान कारखानों की जगह बाज़ार बनाये गए हैं. अब औद्योगिक युग में किसानी और कारीगरी को तबाह कर कारखानों में काम करने के लिए जो सस्ते मज़दूर पैदा किये गए थे उन्हें वापस समाज में फेंक दिया गया और उन्हें वित्तीय पूँजी के जाल में फांस कर घर पर ही परिवार के साथ या छोटी-छोटी इकाइयों में काम के लिए मजबूर किया गया. इस प्रक्रिया में औद्योगिक युग का मज़दूर आज कारीगर में बदल गया. लेकिन यह कारीगर आज की दुनिया का कारीगर है न कि औद्योगिक युग के पहले का.

आज का यह कारीगर छोटी पूँजी के प्रबंधन का ज्ञानी है. यह छोटा किसान है, बुनकर, लोहार, प्लंबर है, ट्रक-मोटर का ड्राइवर है या इनके मरम्मत और रखरखाव के कार्य करता है, यह ठेले-पटरी-गुमटी या छोटी दूकान करने वाला है, कंप्यूटर पर टाइप करता है या मरम्मत और रखरखाव करता है, यह मल्लाह, धोबी, या सफाई कर्मी हैं, कुम्हार, वनवासी और बढई है, ऑटो-रिक्शा चालक है, आदि. ये सब मिलकर इस देश की आबादी का लगभग 80 फीसदी है. यह विशाल कारीगर-समाज सर्वहारा नहीं है. इन्हें मज़दूर नहीं कहा जा सकता. इन्हें असंगठित क्षेत्र का कर्मी या अकुशल कर्मी कहना भी गलत होगा.

हम कहते हैं कि ये विविध समाजों के 80 फीसदी लोग ही आज लोकविद्या परम्परा के वाहक हैं. हजारी प्रसाद जी ने इन्हें ही बुनियादी परम्परा के वाहक कहा है. ये ही नामवर जी की ‘दूसरी परंपरा’ के नाम से चिन्हित किये गए हैं. 1 मई का दिवस इन्हीं के ज्ञान की प्रतिष्ठा का दिवस होना चाहिए. इनके ज्ञान की प्रतिष्ठा इन्हें ही नहीं बल्कि पूरे समाज को खुशहाली, भाईचारा और न्याय के पथ पर ला सकेगी.

इन सभी समाजों के ज्ञान में इस न्याय-पथ के निर्माण के भ्रूण भी हैं. दुनिया के एक्वाडोर, बोलीविया जैसे देशों में इन्हीं समाजों के ज्ञान-भ्रूणों को अब कोंपलें फूट पड़ी हैं. आज का दिवस हम इसी दिशा में चिंतन की शुरुआत करने के लिए जुटे हैं.

--वाराणसी ज्ञान पंचायत की ओर से

लोकविद्या जन आन्दोलन, भारतीय किसान यूनियन(अराजनीतिक), स्वराज अभियान,

बुनकर साझा मंच, माँ गंगाजी निषादराज सेवा समिति

 

 

  

Friday, November 19, 2021

प्रस्तावित किसान-कारीगर ज्ञान-पंचायत

तैयारी बैठक 16 नवम्बर 2021

विद्या आश्रम में यह तैयारी बैठक मंगलवार, 16 नवम्बर 2021 की दोपहर को हुई. कई संगठनों के प्रतिनिधियों ने और कई सक्रिय कार्यकर्ताओं ने भाग लिया. भागीदारों की सूची नीचे दी गई है. बहस के लिए एक परचा बैठक के सामने रखा गया. यह परचा इस छोटी-सी रपट के नीचे दिया हुआ है.

अधिकतर वक्ताओं ने किसान आन्दोलन के सन्दर्भ में आन्दोलन का सन्देश फ़ैलाने और आन्दोलन के लिए लोगों को तैयार करने के बारे में बात की. किसान आन्दोलन के व्यापक फलक के सन्दर्भ में यह बात भी आई कि कोई भी राजनीतिक दल न किसानों का दर्द समझते हैं और न किसानों की बदहाली के मूल कारणों की ओर ध्यान ही देते हैं. शायद ये बातें आज की आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था में निहित हैं और राजनीतिक दल केवल इनके पोषण की भूमिका निभाते रहते हैं. इस बात पर जोर आया कि जब तक बुनियादी तौर पर अलग आर्थिक और राजनीतिक ढांचे की ज़रूरत सार्वजनिक बहस में नहीं आएगी, तब तक वर्तमान ठहराव और फंसाहट से बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिलेगा. कई संगठनों के प्रतिनिधियों ने, जिनमें कारीगर संगठन भी शामिल हैं, यह कहा कि किसान आन्दोलन ने परिवर्तन का एक बहुत बड़ा मौका तैयार किया है और यदि परिवर्तनकारी शक्तियां इस मौके का कारगर इस्तेमाल नहीं कर पातीं तो यह देश और समाज के लिए एक बहुत बड़ी त्रासदी होगी. यह बात हुई कि इन सब विचारों को समेटते हुए किसान-कारीगर ज्ञान-पंचायत को अपने को आकार देना होगा और समय की मांग के अनुरूप अपनी भूमिका निभानी होगी. यह महसूस किया गया कि कुछ निश्चित बिंदु इस ज्ञान पंचायत के विषय के रूप में पहचाने जायें, जिससे पंचायत में भागीदार सभी के विचारों को एक फोकस और दिशाबोध के साथ संयोजित किया जा सके. इन बातों को ध्यान में रखते हुए दो बिंदु प्रस्तावित किये.

1.      हर किसान और कारीगर, मिस्त्री, सेवा कर्मी, लोक कलाकार आदि सभी, यानि लोकविद्या के बल पर काम करने वाले सभी, परिवारों की आय सरकारी कर्मचारियों जैसी होनी चाहिए. इसके लिए सरकार की नीति क्या होनी चाहिए?

2.      किसान आन्दोलन यह इंगित कर रहा है कि न्याय, त्याग और भाईचारा वे मूल्य हैं जिनके मार्गदर्शन में समाज परिवर्तन और नई व्यवस्थाओं के बारे में सोचा जाना चाहिए.

पहला बिंदु हमें आर्थिक ढांचे पर बात करने का एक मज़बूत आधार देगा और दूसरा बिंदु उस राजनैतिक ढांचे के विमर्श को खोलेगा जो 21वीं सदी में स्वराज का क्या रूप बनना चाहिए उस पर प्रकाश डालेगा.

विश्वविद्यालय के ज्ञान पर आधारित आर्थिक राजनीतिक ढांचे ने हमें जो कुछ भी दिया है वह सबके सामने है. निश्चित ही अब समय आ गया है कि लोगों के पास जो अपना ज्ञान है, उनकी जो अपनी दर्शन परंपरायें हैं उन्हें समाज को व्यवस्थित करने का मौका मिलना चाहिए.

इन सब बातों को लेकर प्रस्तावित किसान-कारीगर ज्ञान पंचायत हो इस पर आम सहमति बनी. यह राय भी सामने आई कि इस पंचायत का परिप्रेक्ष्य पूर्वांचल यानि पूर्वी उत्तर प्रदेश का हो. इन बातों पर सब लोग सोचें और एक बार फिर मिलें और अगली बैठक 24 नवम्बर की दोपहर 2.00 बजे विद्या आश्रम में करने का तय हुआ. उसी बैठक में प्रस्तावित ज्ञान पंचायत की तारीख और स्थान दोनों तय किया जायेगा.

 विद्या आश्रम, सारनाथ 

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भागीदारों की सूची

1.      लक्ष्मण प्रसाद, जिला अध्यक्ष, भारतीय किसान यूनियन, वाराणसी  

2.      रामजनम, स्वराज अभियान

3.      फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, बुनकर साझा मंच

4.      जीतेन्द्र प्रताप तिवारी, भारतीय किसान यूनियन, वाराणसी मंडल अध्यक्ष

5.      हरिश्चंद्र बिन्द, माँ गंगा निषादराज सेवा समिति, वाराणसी

6.      सुरेन्द्र सिंह, लोकसेवा समिति, वाराणसी  

7.      चित्रा सहस्रबुद्धे, राष्ट्रीय समन्वयक, लोकविद्या जन आन्दोलन

8.      सतीश सिंह, जन आन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय

9.      सतीश सिंह चौहान, भारतीय किसान यूनियन, चंदौली जिला अध्यक्ष  

10.  गोरखनाथ, दर्शन अखाड़ा

11.  युद्धेश कुमार, वाराणसी

12.  रामावतार सिंह, भारतीय किसान यूनियन, चंदौली

13.  दयाराम शुक्ल, भारतीय किसान यूनियन, मनिहरा, चंदौली

14.  कमलेश कुमार

15.  विद्यानाथ राजभर

16.  दीनानाथ  मौर्य

17.  गोविन्द प्रसाद

18.  सुनील सहस्रबुद्धे, विद्या आश्रम, सारनाथ

 

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विचार के लिए मसौदा

ज्ञान पंचायत

19  दिसंबर 2021, पराड़कर भवन वाराणसी

बुनियादी परिवर्तन के सभी विचार ज्ञान की चर्चा के साथ जुड़े होते हैं. यों भी कहा जा सकता है कि ज्ञान की मौलिक चर्चाओं में परिवर्तन का विचार आकार लेता है. किसान आन्दोलन ने इस बात को तभी रेखांकित कर दिया जब उन्होंने उनके मसले पर पक्की राय बनाने के लिए बनाई जा रही विशेषज्ञ समिति को मानने से इनकार कर दिया. और यह भी कि किसान संसद चलाकर यह स्पष्ट कर दिया कि हम केवल खेती का ही ज्ञान नहीं रखते बल्कि देश के प्रबंधन और सञ्चालन के ज्ञान में भी दखल रखते हैं. कबीर और रविदास से परिचित लोग इस बात को भलीभांति जानते हैं कि ज्ञान और परिवर्तन की बातें एक दूसरे से अलग नहीं की जा सकतीं. आप किसानों से बात कर लें, बुनकरों से बात कर लें या मल्लाहों से बात कर लें या फिर मोटर साइकिल बनाने वालों से बात कर लें, यह तुरंत स्पष्ट हो जायेगा की समाज में फैला हुआ ज्ञान बड़ा विस्तृत और गहरा है. और यदि महिलाओं से बात करेंगे तो ज्ञान और समाज की एक नई दुनिया ही आपके सामने खुलेगी. समाज में उपस्थित ज्ञान को ढकने वाला पर्दा हटाना होगा. उधार के ज्ञान से यह देश अब बड़े लम्बे अरसे से चल रहा है. किसी भी राजनीतिक दल में उसके अलावा कहीं और देखने की हिम्मत नहीं दिखाई देती. सवाल है कि क्या समाज में उपस्थित ज्ञान और दर्शन एक नया रास्ता दे सकता है.

जब तक एक अलग आर्थिक और राजनीतिक ढांचे पर सार्वजनिक बहस की शुरुआत नहीं होगी, तब तक न्यायसंगत परिवर्तन के रास्ते नहीं खुलेंगे. किसान आन्दोलन उन मूल्यों की प्रतिष्ठा की बात कर रहा है, जो एक नए आर्थिक और राजनैतिक ढांचे के बारे में सोचने के लिए विवश करते हैं. बात शुरू करने के लिए हम इन मूल्यों की न्याय, त्याग और भाईचारा के रूप में पहचान कर सकते हैं. ये हमें दुनिया के बारे में सोचने के लिए उन ज्ञान परम्पराओं की और ले जायेंगे, जिनमें ज्ञान और नैतिकता की बात एक दूसरे से अलग नहीं होती. यह स्वदेशी ज्ञान परंपरा है. ज़रा एक बार इन मौलिक चर्चाओं को सार्वजनिक बनाने का प्रयास तो किया जाए, पूरी उम्मीद है कि परिवर्तन के फूलों से सजी हुई एक नई बगिया दिखाई देगी.

पूर्वांचल के सक्रिय साथी इस ज्ञान पंचायत में शामिल होने के लिए आमंत्रित हैं. उनके योगदान की अपेक्षा है. उम्मीद है कि जो बड़े सवाल सक्रिय कर्मियों के सामने खड़े हैं उनके जवाब ढूंढने में मदद होगी. 

निवेदक

लोकविद्या जन आन्दोलन, भारतीय किसान यूनियन(अराजनीतिक), स्वराज अभियान,

बुनकर साझा मंच, माँ गंगाजी निषादराज सेवा समिति

संपर्क

चित्रा सहस्रबुद्धे (9838944822), लक्ष्मण प्रसाद (9026219913), रामजनम (8765619982), फ़ज़लुर्रहमान अंसारी (7905245553),  हरिश्चंद्र बिन्द (9555744251)

 

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Thursday, October 28, 2021

गरीब हूँ, इंसान हूँ, जानवर नहीं : ललित कुमार कौल

गरीब हूँ, इंसान हूँ, जानवर नहीं

                                                                                                                                ललित कुमार कौल 

मैं गरीब हूँ, मेरा परिवार गरीब है , यह मैं  जानता हूँ ! दुःख की बात यह है कि मेरी ग़ुरबत पर पिछले 70 सालों से सियासत की जा रही है ! इन सियासतदानों से मैं यह कहना चाहता हूँ कि मैं दिमाग से, हुनर से और विद्या से गरीब नहीं हूँ, अपितु धन से गरीब हूँ! धन से गरीब होते हुए भी मैं भिखारी या बेईमान नहीं हूँ , ऐसा मेरा चरित्र है

आधुनिक सभ्यता के ठेकेदारों ने मुझे दिमाग से गरीब घोषित कर दिया , मुझे अपने अधीन करके मेरे शोषण का सिलसिला शुरू किया ; यह तय हुआ कि आधुनिक सभ्यता की प्रगति में मैं मानसिक रूप से  निष्क्रिय रहते हुए सिर्फ शारीरिक बल के भरोसे योगदान  दे सकता हूँ ! लेकिन मैं तो इंसान हूँ और इसलिए मानसिक शक्तियों  का मुझमें होना कुदरती है और इन्हीं  के आधार पर मैं पिछले 70 सालों से अपनी विद्या को बचाते हुए, अपने हुनर का इस्तेमाल करते हुए अपनी जीविका को बड़ी मुश्किल से सुरक्षित  कर पाया हूँ; दशकों से मुझे गरीब मेरी विद्या या मेरे हुनर ने नहीं, अपितु आधुनिक सभ्यता की परिभाषा, अवधारणा और उससे जुड़े निज़ाम ने बनाये रखा! 

मेरा मानना है कि ईश्वर ने या फिर प्रकृति ने इंसान को जिस प्रकार का दिमाग दिया है वैसा किसी और जीव जन्तु को नहीं, इसलिए पशु पक्षी अपना जीवनकाल सिर्फ रोजमर्रा की जरूरतें पूरा करने में  व्यतीत कर देते हैं ! इंसान पर  ऐसी कृपा है कि वह सोच-शक्ति के भरोसे खुद की और समाज की प्रगति के लिए प्रकृति, पशु-पक्षियों, फूल-पौधों, आदि के साथ एक प्रकार का रिश्ता जोड़ता है ! एक समाज की प्रगति का मानदंड केवल उसका धनी होना या होना नहीं, बल्कि उसकी प्रकृति की समझ के विस्तार से भी जुड़ा है ! जैसे जैसे इस समझ में वृद्धि होती जाती है वैसे वैसे प्रकृति और संस्कृति के बीच सकारमक संतुलन स्थापित हो जाता है ! यदि इस रिश्ते के बीच लोभ का प्रवेश हो जाये  तो दोनों का विनाश निश्चित है !

आधुनिक सभ्यता के ठेकेदारों ने मुझे और मेरे समाज को इस रिश्ते को समझने पर प्रतिबन्ध लगा दिया, इतना ही नहीं उन्होंने समस्त प्रकृति पर प्रभुत्व (एकाधिकार ) का एलान कर दिया !

जानवर दो किस्म के हैं ! एक जंगली और दूसरे पालतू ! जंगली जानवर अपनी जिंदगी खुद तय करते हैं जबकि पालतू को सिर्फ आदेशों के मुताबिक जीना होता है ! 

अन्य राजनीतिक दलों के नेता और उनकी बनायी गयी सरकारें मुझसे यह वादा करते आये हैं कि वह मेरे लिए योजनायें बनायेगे जिनके मुताबिक मुझे मकान, पानी, बिजली और सड़कों जैसी सुविधाएं प्राप्त होंगी ! यह एक तरीका है मुझे मेरी ग़ुरबत का एहसास दिलाने के लिए! चलिए अच्छा है!

लेकिन क्या मुझ में गैरत नहीं ? क्या मैं अपने फैसले खुद नहीं कर सकता? क्या मैं खुद की जिंदगी अपने तरीके से नहीं जी सकता ? मैं कोई कठपुतली तो नहीं जो सूत्रधार के इशारों पर नाचूँ ; कोई पालतू नहीं कि जो मुझे दिया जाये मैं उसे स्वीकार करूँ ! मुझे मकान देंगे, बिना मुझसे पूछे कि मेरे परिवार की जरूरतें क्या हैं ? या फिर मैं कैसे मकान में रहना चाहता हूँ ; बिजली पानी की मात्रा भी मेरे ठेकेदार ही तय करेंगे ; सडकें मुझ तक इसलिए पहुंचायी जायेंगी ताकि मैं दूर-दूर के इलाकों में  मजदूरी के अवसर तलाश करूँ !  मुझे गरीब बना कर सब मेरे हमदर्द बने फिरते हैं ! मुझे हमदर्दी नहीं चाहिए मुझे मेरे हुनर मेरी विद्या के लिए मान्यता चाहिए ! मेरे देश का संविधान कहता है कि मुझे जीने का हक है लेकिन मेरी जिंदगी तो कोई और तय करता है ! ऐसे  जीने के  हक का मै क्या करूँ जब मुझको मेरी मानसिक क्षमताओं से बेदखल कर दिया गया है और इस कारणवश मै समाज की प्रगति मे  योगदान करने से सदैव वंचित रहा हूँ ! जब तक मै अपनी मानसिक क्षमताओं के बल पर निजी जिंदगी का मार्ग तै नहीं कर पाता तब तक ‘ जीने का हक ‘ निरर्थक है और मात्र नारेबाजी है !

मेरी सोच, मेरी समझ और मेरे अनुभवों को अंधविश्वास  माना गया है लेकिन मेरी समझ में  वह सब से बड़े असत्यधर्मी  हैं, जो विभिन्न प्रकार की सोच, समझ और अनुभव को सिरे से ख़ारिज करते हैं ! ऐसी मानसिकता प्रकृति के स्वरुप के खिलाफ है और जो कुछ भी प्रकृति के खिलाफ है असत्य है !

आधुनिक सभ्यता की नींव शोषण पर टिकी है ; एक छोटा सा वर्ग एक बड़े बहुमत का शोषण करना निजी अधिकार समझता है और इस सभ्यता से जुड़ी संस्थाएं उन्हीं के हित में काम करती हैं ! आधुनिक सभ्यता के निज़ाम ने मेरी विद्या को इसलिए रद्द कर दिया क्योंकि वह शोषण करने का जरिया नहीं बन सकती ! मेरी विद्या मुझे आत्मनिर्भर बनाती है इसलिए मुझे नौकरी की तलाश नहीं रहती जबकि मान्यता प्राप्त विद्या हासिल करने के पश्चात नौकरियों की तलाश रहती है. और नौकरी का मतलब : किसी और की सोच और समझ लागू करने का काम करना, और यहाँ से शोषण और भ्रष्टाचार  की शुरुआत होती है !

मेरा प्रश्न :  किस प्रकार की विद्या को मान्यता प्राप्त होनी चाहिए ? जो समाजों के हित में  काम आये या जो उनके शोषण का यंत्र बने ? जो प्रकृति और संस्कृति के बीच का संतुलन बनाये रखने या उसे बिगाड़ने में कारगर साबित हो ? जो समाजों की प्रगति के रास्ते यह मान कर निकाले कि प्रकृति के अन्य संसाधन पीढ़ी दर पीढ़ी आने वाली पीढ़ियों की अमानत हैं या फिर एक ऐसा खज़ाना है जिसे लूटना आज की पीढ़ी का हक है ? विद्या जो समाज के काम आये या जो विद्याधर को समाज से अलग कर दे , उसे पराया बना दे !

कितनी सी है मेरी दुनिया :  भूलोक चाहे कितना ही बड़ा हो, साम्राज्य कितने ही बड़े क्यों ना हों , लेकिन मेरी  दुनिया बहुत छोटी सी है :  मेरा परिवार (माँ, बाप, बीवी और बच्चे ), मेरे  रिश्तेदारों ( भाई-बहन, आदि) के परिवार , मेरे  मित्र आदि ! ऐसे ही कई परिवारों से समाज का गठन होता है और इस प्रकार से परिवार और समाज के हितों में कोई आपसी विरोध नहीं होता ! प्रगति का मूलाधार विद्या है , यदि विद्या हासिल करने के पश्चात समाज और परिवार का सदस्य उनसे अलग हो जाये, यह कहकर कि उसकी हासिल की गयी विद्या से उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता, तो ऐसी विद्या किसी काम की नही!

एक संपन्न समाज की परिभाषा क्या है ? निरोगी समाज ; कुपोषण व  प्रदूषण मुक्त जल और वायु  ; भरपूर अनाज , कपड़ों  और रोजमर्रा की चीज़ों की उपलब्धि ; हर परिवार के सर पर छत! सामाजिक न्याय की व्यवस्था , कला और संगीत में  रुचि ! मैं  किसान या  बुनकर हूँ , लोहार या तरखान हूँ , सुनार या कुम्हार हूँ , वैद्य या शास्त्री हूँ , व्यापारी हूँ , कलाकार हूँ , वास्तु कला का ज्ञानी हूँ , कारीगर हूँ , आदि आदि ! प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल करके मैं समाज की सभी जरूरतों की पूर्ति कर सकता हूँ ; बदलते वक़्त के साथ बदलती जरूरतों की भी मैं पूर्ति कर सकता हूँ क्योंकि मेरी विद्या गतिहीन नही! मेरा अस्तित्व किसी के अधीन नहीं क्योंकि मुझे नौकरी की तलाश नहीं ! मेरी विद्या समाज संगत है ; मेरे विद्या हासिल करने के तरीकों से सामाजिक अर्थ व्यवस्था पर किसी भी प्रकार का बोझ नहीं पड़ता !  मेरी विद्या का स्वरुप समाज को जोड़ने का काम करता है, उसे तोड़ने का नही, क्योंकि यह विद्या ही ऐसी है जो हर पेशेवर को लेन देन से जोड़ कर रखती है ! एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करती है जिसमें मैं विक्रेता और उपभोक्ता दोनों ही हूँ ! इन सब के बावजूद मेरी विद्या , मेरी समझ , मेरे अनुभवों को तिरस्कृत क्यों किया जाता है ? 

मशीनों का युग : कहते हैं ईश्वर ने ब्रह्माण्ड बनाया जिसमें  इंसान, पशु-पक्षी , फूल-पौधे , अनेक ग्रह , तारा-मंडल और आकाशगंगा हैं ! कल्पना कीजिये यदि ईश्वर की बनायी हुई चीजें ईश्वर पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास करें तो नतीजा क्या होगा !

इसी प्रकार से इंसान ने मशीनों का निर्माण किया लेकिन इनके योगदान को सीमित नहीं किया ! आधुनिक सभ्यता में  इंसानों पर मशीनों  का प्रभुत्व बना हुआ है और यह बढता ही जा रहा है ! इंसान को मशीनों के अधीन कर दिया है ! ऐसी मशीनों का आविष्कार हुआ और हो रहा है जो  इंसानों जैसी क्षमताओं से लैस हैं ! यानि कि हर प्रकार की इंसानी मानसिक क्षमताएं इनमें  भर दी गयी हैं ! मेरी विद्या से भी मशीनों का निर्माण हुआ, जिनका लक्ष्य सिर्फ शारीरिक मेहनत को कम करने का था ! अब अगर मशीनें ही सब कार्य करेंगी तो इंसान क्या करेंगे ! इन मशीनों को निर्मित करने की विद्या दुनिया भर मे कुछ गिने चुने लोगों के पास है और इंसानों का बहुत बड़ा बहुमत केवल इनको चलाने का हुनर जानता हैं क्योंकि उनको इसके लिए प्रशिक्षित किया जाता है ! किसी को भी कुछ अलग सोचने के अवसर प्रदान नहीं होते क्योंकि सब नौकरी पेशा हैं ! इस प्रकार की विद्या की एक और खासियत यह है कि इसको पाने के लिए असीम धनराशि की जरूरत पड़ती है! आम इंसान की पहुँच के बाहर और उसके समाज की प्रगति के विपरीत है यह विद्या जो ना केवल अपना एकाधिकार जमाये बैठी है , दुनिया भर के समाजों को मुफलिसी की ओर निरंतर ढकेलती आयी है ! इस विद्या ने ऐसे अस्त्र-शस्त्र का निर्माण किया है जो पूरी दुनिया को कुछ लम्हों में ध्वस्त कर सकते हैं, लेकिन उसकी प्रगति में कोई योगदान नहीं दे सकते !

इंसान और पालतू एक समान : मुझे पिछड़ा घोषित कर दिया गया क्योंकि मैं नयी विद्या के निज़ाम के विरुद्ध एक चुनौती बन कर खड़ा हो सकता हूँ ! मैं तो पिछड़ा हो गया लेकिन आने वाले वक़्त में उनका क्या हश्र होने वाला है जिन्होंने मान्यता प्राप्त विद्या हासिल की है ? मेरा मानना है कि  प्रौद्योगिकी से हर कोई प्रभावित और मोहित है ! मानव समाजों का उद्धार प्रौद्योगिकी से ही संभव है ऐसा लोगों मे कूट-कूट कर भर दिया गया है ! 1000 में से 999 इसका अर्थ नहीं समझते क्योंकि इसके निर्माण में  उनकी कोई भागीदारी नहीं है ! लेकिन राजनेताओं ने एक ऐसा माहौल बनाया है कि लोग एक परम असत्य को सत्य मानने लगे हैं ! स्वचालन को भी हर मर्ज की दवा बताया जाता है , यानि कि किसी भी इंसान को कुछ करने की जरूरत नहीं, सब मशीनें करेंगी ! अब जब सब कुछ मशीनें करेंगी तो करोड़ों इंसानी दिमागों  का कोई अस्तित्व नहीं रहेगा !

स्वचालन के नतीजे : सुनने में आता है कि रोबोटिक्स प्रौद्योगिकी बहुत तीव्र गति से प्रगति कर रही है ! रोबोट होटल में खाना परोसने का काम करेंगे, खाने का आर्डर लेंगे और ऐसा हर कोई काम जो आजकल इंसान करते हैं वह रोबोट करेंगे ! अब वे लोग जो होटल में काम करने वाले रोबोट का निर्माण तो कर नहीं पाएंगे और इसलिए वह सब पिछड़ा वर्ग कहलायेंगे क्योंकि उनकी विद्या स्वचालन के निज़ाम में  किसी काम की न होगी ! ध्वनि चालक यंत्रों का भी बहुत तेजी से निर्माण हो रहा है ! इशारों पर काम करने वाली मशीनों का भी निर्माण हो रहा है ! मतलब कि एक ऐसे समाज की कल्पना की जा रही है जिसमें  इंसान सिर्फ बोल  कर या फिर इशारे करके अपना हर काम करवा सकता है ! यह सब रोजमर्रा के काम रोबोट करेंगे और आपको सिर्फ आदेश देने हैं या फिर इशारे करने हैं ! आपको रोबोट नहला देगा , खाना पकाएगा और खिलवाएगा , घर की सफाई करेगा , संडास करवाएगा , घर की बत्तियाँ रोशन करेगा या फिर बुझायेगा , आपके लिए बिस्तर तैयार करेगा. यहाँ तक कि आपको बिस्तर ले जा कर आपको सुला देगा ,आदि आदि ! इन सब कामों को करने के लिए कुदरती तौर पर  इंसानी दिमाग का इस्तेमाल होता रहा है , लेकिन अब उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि सब रोबोट करेंगे और आप अपने दिमाग से बेदखल हो जायेंगे ! नतीजा यह कि आपकी हैसियत जानवर के समान होगी ; लेकिन जानवर फिर भी  शारीरिक बल पर श्रम करता है लेकिन इंसान शारीरिक और मानसिक क्षमताओं से बेदखल हो जायेगा !

शल्य चिकित्सक : इनका समाज में आजकल बहुत दबदबा है , सम्मान है क्योंकि यह रोगी शरीर के किसी भी अंग को काटपीट कर स्वस्थ कर सकते हैं ! मशीने इनके पास भी हैं लेकिन वह सिर्फ इनका काम सरल करने में इनकी सहायता करती हैं ! यह आधुनिक वर्ग के सम्मानित लोग हैं , इन्हें पिछड़ा नहीं शिक्षित कहा जाता है और यही इनकी पहचान है ; इनके मुकाबले एक वैद्य जिसके मरीज़ को स्वस्थ बनाने के तरीके इनसे अलग हैं उसे तिरस्कृत किया जाता है क्योंकि उसे पिछड़ा घोषित किया गया है ! खैर ! मैं अपना रोना नहीं रो रहा बल्कि मुझे इनकी चिंता है क्योंकि जो मेरे साथ हुआ है वही इनके साथ होने वाला है , ऐसी मेरी समझ है ! लेज़र और रोबोट का ऐसा मेल विकसित हो रहा है जो हिन्दुस्तान मे बैठे रोगी का इलाज़ अमरीका मे बैठे रोबोट चालक कर पाएंगे ! मतलब यह कि अब इनकी विद्या की जरूरत नहीं होगी , केवल उनकी जरूरत होगी जो इस रोबोट और लेज़र को चलाना जानते हों क्योंकि सारी विद्या रोबोट के दिमाग में रहेगी और चालक को सिर्फ इतना तय करना होगा कि किस बिमारी के लिए कोनसा बटन दबाना है ! लेज़र के माध्यम से हिन्दुस्तानी रोबोट चालू हो जायेगा और आदेश के अनुसार काम संपन्न कर देगा ; मतलब या तो शल्य चिकित्सक रोबोट चालक बन जाये (नयी विद्या हासिल करे और नए निज़ाम को तसलीम करे ) या फिर पिछड़े वर्ग मे शामिल हो जाये ! अब आप कहेंगे कि हम रोबोट के स्वास्थ्य का ख्याल करेंगे ; उसके पुर्जों की बदली और मरमत करेंगे. लेकिन यह काम भी दूसरे रोबोट ही करेंगे !तो आधुनिक समाजों के मान्यता प्राप्त विद्याधर पूर्ण रूप से निष्क्रिय हों जायेंगे और मेरे समुदाय के सदस्य बनेगें ! मानव जीवन के हर आयाम हर पहलू में  कुछ ऐसा ही होने वाला है ; देरी सिर्फ वक़्त की है!

प्रश्न विद्या का : समाज की रोजमर्रा की समस्याओं के समाधान के लिए विभिन्न प्रकार की मानसिक क्षमताओं  से लैस  सदस्यगण सक्रिय रहते हैं और इस प्रकार से नयी विद्या का जन्म होता है और यह प्रक्रिया निरंतर सदियों से चली आ रही है ! लेकिन यदि यही विद्या इसके जन्मदाता को निष्क्रिय कर दे तो अंजाम एक बेरोजगार और मुफलिस समाज होगा ! ऐसे में इसे मान्यता प्राप्त कैसे हो सकती है ?आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा की गयी प्रोद्योगिकी विकास की पहल का राजनितिक उद्देश्य  लगभग समस्त दुनिया के समाजों को अपने अधीन करके उनके निर्धारित किये गए जीवन जीने के फलसफों को स्थापित करना है ! यह विद्या ऐसी है जो लोगों को अपने गाँव , शहर और देशों से पलायन करने पर  मजबूर करती है और इसे सुविधाजनक बनाने हेतु यातायात के साधनों का भी निर्माण हुआ है ! लम्बी से लम्बी दूरी छोटे से छोटे समय में तय करने की सुविधाएं उपलब्ध हैं! इनकी दावेदारी कुछ भी हो लेकिन सत्य तो यह है कि इंसान मजबूर हो गया है , प्रकृति अपना संतुलन खोने के कगार पर  है ; वायु , जल और आकाश प्रदूषित हैं, जिस कारण अनेकों बीमारियों का आगमन हुआ है ! दुनिया भर में  अनगिनत नदियों के होते हुए भी पीने का पानी बोतलों में बिक्री किया जा रहा है, क्योंकि नदियों का जल प्रदूषित है ! तो फिर ऐसी विद्या को मान्यता कैसे प्राप्त हो सकती है? 

मेरी विद्या (लोकविद्या ) ऐसी नहीं क्योंकि इसका कोई राजनितिक लक्ष्य नहीं , किसी अन्य समाज या देश पर  प्रभुत्व  ज़माने का लक्ष्य नहीं , यह तो केवल मेरे समाज की प्रगति के प्रति वचनबद्ध है ! मेरी विद्या किसी भी किस्म का प्रदूषण नहीं फैलाती क्योंकि यह प्रकृति को निजी सम्पति नहीं समझती ! यदि मेरी विद्या को मान्यता प्राप्त हो तो समाज का कोई भी व्यक्ति पलायन करने पर मजबूर न होगा , सामाजिक और पारिवारिक रिश्ते टूटेगें नहीं !

तो फिर किसको विद्या माने ? जो समाजों का शोषण करे या उन्हे प्रगतिशील बनाये ? मानव समाज का भविष्य इस सवाल के जवाब तय  करेंगे !  

ललित कौल