Friday, May 31, 2019

गंगाजी ज्ञान दर्शन


दर्शन अखाड़ा पर ‘गंगा मैया गीत’ नाम से बुधवार, दिनांक 29 मई, 2019, शाम 5 बजे से  एक आयोजन हुआ. स्थानीय समाज की महिलाओं ने मिल बैठ कर गंगाजी के गीत गाये. आप कभी ऐसे गीतों पर एक समग्र दृष्टि डालें तो वे स्वयं ज्ञान गंगा प्रतीत होंगे और सामान्य महिलाओं के ज्ञान की गहराई से आपका परिचय होगा. बहुधा यह माना जाता है कि सामान्य महिलाएं जो अनपढ़ हैं या मामूली पढ़ी हैं, वें अज्ञानी हैं, कुछ नहीं जानती. क्योंकि आज ज्ञान का अर्थ ‘विकास’ के ज्ञान से ही लिया जाता है और अब तक यह साफ़ है ही कि विकास का ज्ञान ‘विनाश’ का ज्ञान होता है. ज्ञानी तो वही हैं जो समाज को एक ऐसे पथ पर आगे ले चलें जिस पर समाज के सभी लोगों की न्यायसंगत और विवेकपूर्ण सक्रियता व भूमिका बने.




हमारे समाज में संवेदना, भाईचारा, त्याग, विवेक, पर-पीड़ा की अनुभूति आदि को ज्ञान के अभिन्न अंग के रूप में देखा जाता रहा है. आज का ‘विकास’ का ज्ञान जिसे हम साइंस कहते हैं, इन सब नैतिक मूल्यों से अछूता है. यानि इन मूल्यों को वह सिद्धांततः ज्ञान का अन्तर्निहित गुण नहीं मानता. इसकी सोच व समझ न हमारे वैज्ञानिकों में है, न राजनेताओं में, न मीडिया में और न विश्वविद्यालयों में पढ़ने-पढ़ाने वाले लोगों में. नतीजा यह है कि इस ‘विकास’ की आंधी में लालच, आक्रामकता, नफ़रत, विलासिता को बड़ा स्थान मिलता जा रहा है. प्राकृतिक संसाधनों की बेतहाशा लूट और किसान-कारीगर समाजों को उजाड़ कर थोड़े से लोगों के लिए वैभव और विलास के महल खड़े करने में बड़ा अधर्म हो रहा है.

गंगा जी मात्र एक नदी नहीं, बल्कि ज्ञान गंगा हैं. धरती माँ की तरह ही वे लोकहित में अपनी सक्रियता को निर्धारित करती हैं और त्याग, ममत्व, सहजीवन, न्याय जैसे गुणों को ज्ञान के अभिन्न अंग के रूप में देखना सिखाती हैं. यह आयोजन गंगाजी की आवाज़ को सुनने, समझने, आत्मसात करने और फ़ैलाने का आग्रह रखता है. इन्हीं बातों पर वार्ता के दौरान श्रीमती शांतिदेवी और श्रीमती चैत्रा देवी के समूह ने गंगाजी के गीत प्रस्तुत किये. ढोलक पर मनोज ने संगत की. चंदा यादव, पारमिता, प्रभावती, प्रेमलताजी, चित्राजी ने गीत गाये जिसमें अन्य महिलाओं ने स्वर मिलाए. प्रेमलताजी ने गंगाजी पर लिखी अपनी कविता और कुछ अन्य कवियों की कवितायेँ भी सुनाई.
प्रेमलताजी ने कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए कहा कि गंगाजी के अतित्व पर संकट के बादल हैं. हम स्त्रियों को इसके बारे में सजग होना है क्योंकि गंगाजी के चलते हमारा भी जीवन, अस्तित्व और सम्मान है. हम सभी स्त्रियाँ माँ होने के नाते जन्म और लालन-पालन के कार्यों में आवश्यक ज्ञान को हासिल करती रही हैं और इस दौरान पर-पीड़ा की समझ, भाव, प्रेम, ममत्व, विवेक, त्याग, संयम, सहजीवन आदि बहुत से गुणों की परख करना सीखती हैं, उन्हें आत्मसात करती हैं. ये गुण हासिल करने की क्रिया ही ज्ञान-तपस्या है. अपने बच्चों में और समाज में इस ज्ञान और इन गुणों को विकसित करना यह हमारा धर्म है. आज इन गुणों को समाज में पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता है. इस कार्य को आगे बढ़ाने का काम स्त्रियों को अपने हाथ में लेना होगा.

कलाकार मनोज का सम्मान करते हुए 


 अंत में श्रीमती शांतिदेवी, श्रीमती चैत्रा देवी व मनोज का लोकविद्या साहित्य और एक गमछे की भेट देकर सम्मान किया गया.

विद्या आश्रम

Thursday, May 30, 2019

भारत की राजनीति में दर्शन की भूमिका - बैठक का जायजा


स्वदेशी दर्शन परम्पराएं और मूल्य आधारित राजनीति
28 मई 2019 को शाम 5 बजे

        28 मई 2019 को शाम 5 बजे दर्शन अखाड़ा, राजघाट, वाराणसी पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन हुआ. विषय था - भारत की राजनीति में दर्शन की भूमिका : स्वदेशी दर्शन परम्पराएं और मूल्य आधारित राजनीति. 
लोकसभा चुनाव नतीजों के सन्दर्भ में यह बैठक आनन-फानन में ही तय हुई थी और सूचना केवल एक दिन पहले ही दी जा सकी थी इसलिए कई लोग नहीं आ पाये. उपस्थित थे - अमरनाथ भाई, योगेन्द्र नारायण शर्मा, मो. आरिफ, मिथिलेश दुबे, रामजनम, फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, प्रेमलता सिंह, चित्रा सहस्रबुद्धे, लक्ष्मण प्रसाद, गोरखनाथ, अरुण कुमार और सुनील सहस्रबुद्धे. 
स्वदेशी दर्शन परम्पराओं से हमारा अभिप्राय गाँधी, कबीर, रविदास, तथा इन जैसे संतों के दर्शन से रहा. इस विचार गोष्ठी में भी राजनीति में दर्शन की भूमिका की बात करते हुए इन्हीं लोगों के दर्शन की ओर ध्यान खींचा गया. विश्वविद्यालयों में या तो इन्हें पढाया नहीं जाता है, या फिर हिंदी, इतिहास, राजनीति शास्त्र जैसे विभागों में पढाया जाता है, दर्शन विभाग में नहीं. इसके चलते और यूरोपीय विचारों के प्रभाव के चलते पढ़े-लिखे लोग इन्हें दार्शनिकों के रूप में सहजता से नहीं देख पाते. जो वैचारिक स्थापनाएं राजनीति में प्रासंगिक हो सकती हैं उन्हें अधिकांश 18 वीं औरे 19 वीं सदी के यूरोप से लिया जाता है और अपने दार्शनिकों के विचार समाज और व्यक्ति स्तर पर ग्राह्य तो माने जाते हैं लेकिन राजनीति में उनकी भूमिका नहीं देखी जाती. हम राजनीतिक सन्दर्भों में सत्य, प्रेम, अहिंसा, न्याय, भाईचारा जैसे विषयों पर कम ही बात करते हैं. अब सत्याग्रह की बात भी सामाजिक संघर्षों से बाहर हो चली है. इन्हीं स्थितियों पर गौर करने के लिए और आवश्यक सुधार की दृष्टि से एक बहस शुरू करने के इरादे से यह चर्चा रखी गई थी और वैसा ही हुआ. जो उभर कर आया वह यह था कि हमें राजनीतिक बहस और क्रियाओं के लिए नए प्रस्थान बिंदु चाहिए. ऐसे प्रस्थान बिंदु जो दर्शन को लोकमन और सामान्य जीवन के इतने नज़दीक देखें कि दार्शनिक व्याख्याओं और राजनैतिक चर्चाओं के बीच अंतर मिटने लगें. लोगों ने कहा कि यह बड़ा प्रश्न है और किसी एक बैठक में ऐसे प्रस्थान बिंदु खोज लिए जायेंगे, यह नहीं हो पायेगा. इसके लिए ऐसी बैठकों का सिलसिला चलना चाहिए और नए-नए लोगों को विमर्श में जोड़ा जाना चाहिए. 
अगले दिन फिर इसी विषय पर विद्या आश्रम में अमरनाथ भाई, मो. आरिफ, नूर फातमा, लक्ष्मण प्रसाद, चित्रा जी और सुनील की आपस में बातचीत हुई.








विद्या आश्रम 

Monday, May 27, 2019

भारत की राजनीति में दर्शन की भूमिका



दर्शन अखाड़ा
ए 11/13 नया महादेव, राजघाट, वाराणसी

निमंत्रण
विचार गोष्ठी
भारत की राजनीति में दर्शन की भूमिका
 स्वदेशी दर्शन परम्पराएं और मूल्य आधारित राजनीति
28 मई 2019 को शाम 5 बजे

28 मई 2019 को शाम 5 बजे दर्शन अखाड़ा, राजघाट, वाराणसी पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन है. विषय है - भारत की राजनीति में दर्शन की भूमिका : स्वदेशी दर्शन परम्पराएं और मूल्य आधारित राजनीति.

बात अब लोकसभा चुनाव की चर्चा के आगे बढ़ जानी चाहिए. भारत के सामाजिक जीवन में दर्शन का एक प्रमुख स्थान हमेशा से रहा है. साम्राज्यवाद ने राजनीति और समाज के बीच जो अलगाव पैदा किये उसे हम आज तक ढो रहे हैं. समाज की दार्शनिक चर्चाओं को राजनीति विस्थापित करती हैं और खुद दर्शन से मुक्त होकर समाज पर शासन के औजार बनाती हैं. भारत की राजनीति ने जिन लोगों को मन की गहराइयों तक उद्वेलित किया है वे तरह-तरह के कोण से समाज में संवेदना और विचार की प्रतिष्ठा के बारे में और खुद विचार पर भी सोचते रहते हैं. मनुष्य स्पष्ट विचार तभी कर पाता है जब अपने को विवश नहीं समझता. यही सब सोचते हुए प्रस्तावित वार्ता की बात बनी. अमरनाथ भाई और विजय नारायण जी से चर्चा करके यह तय किया गया कि दर्शन अखाड़ा राजघाट पर ऐसा कुछ विचार विनिमय किया जाये. आप सभी सादर आमंत्रित हैं. 

सुनील सहस्रबुद्धे                                 गोरखनाथ