Thursday, April 10, 2014

जन-आंदोलन पर विचार आमंत्रित हैं

आज 2014  के आम चुनावों के पहले के दिनों में परिवर्तन के कार्यकर्त्ता दो प्रमुख विषयों पर विचार कर रहे हैं।  पहला यह कि जन-आंदोलनों के नेता व वरिष्ठ कार्यकर्ता अच्छी तादाद में चुनाव लड़ रहे हैं, तो अब जन-आंदोलनों का भविष्य क्या है ? दूसरा यह कि आम आदमी पार्टी (आप) कैसी पार्टी है, इसका चरित्र क्या है, इसकी नीतियां क्या हैं , क्या इसके चलते शोषित और गरीब जनता के लिए कोई नयी आशा जगती है या फिर इतना ही कि इस पार्टी के आ जाने से स्थापित राजनीति में मची खलबली परिवर्तन के पक्ष में काम करने के लिए नए स्थान बनाती है।  

ये सवाल एक दूसरे से अलग नहीं किये जा सकते क्योंकि ज्यादातर जन-आंदोलन के नेता 'आप' के टिकट  से ही चुनाव मैदान में हैं।  मेधा पाटकर-मुम्बई, संजीव साने-ठाणे, सुभाष लोमटे-औरंगाबाद, अलोक अग्रवाल-खंडवा, अनिल त्रिवेदी-इंदौर, सोनी सोरी-बस्तर, दयामनी बरला-खूंटी, लिंगराज-बरगढ़ , अलीमुद्दीन अंसारी-किशनगंज, उदय कुमार-कन्याकुमारी, राकेश टिकैत-गजरौला ( रालोद ) इत्यादि। और भी होंगे, हमें सबकी जानकारी नहीं है। 'आप' के साथ जाने और न जाने को लेकर आंदोलनों के कार्यकर्ताओं में बड़ी बहस है।  पक्ष और विपक्ष दोनों में इस बात पर मोटी सहमति दिखाई देती है कि 'आप' से शायद कोई बड़ी उम्मीद नहीं की जा सकती, लेकिन जबकि एक पक्ष कुछ ऐसा सोचता है कि वहाँ जाकर इस उम्मीद को बनाने का काम किया जा सकता है, वहीं  दूसरे पक्ष को यह लगता है कि 'आप' में शामिल होने का ऐसा कोई नतीजा निकले या न निकले , किन्तु यह प्रक्रिया अब दो दशकों से अधिक से चल रहे जन-आंदोलन के इस चरण का पटाक्षेप अवश्य कर सकती है। 

परिवर्तन के कार्यकर्ताओं की यह आम मान्यता रही हैं कि जन-आंदोलन परिवर्तन के कारक घटकों का अनिवार्य हिस्सा होते हैं।  जन-आंदोलनों की अनुपस्थिति में न्याय के पक्ष में नीतियां नहीं बन पाती हैं और न जन-पक्ष के फैसले ही हो पाते हैं। ये जन-आंदोलन किसानों, आदिवासियों, कारीगरों, महिलाओं और नौजवानों के होते रहे हैं।  अब इनमें पटरी के दुकानदार भी शामिल हो गए हैं।  ये सब अपने संसाधन बचाने, जीविका बचाने, सुरक्षा के लिए अथवा अपने काम और उत्पादन के दाम हासिल करने के लिए संघर्ष करते रहे हैं।  इनके संघर्षों और संगठनों  से ही जन-आंदोलन बनते रहे हैं, जिन्हें बनाने और चलाने में सामाजिक कार्यकर्ता अपनी भूमिका निभाते रहे हैं।  इन समाजों की पार्टियां नहीं होतीं।  इनके आंदोलन समाज में बड़े बदलाव के रास्ते खोजते रहे हैं , लेकिन जब-जब इन्होंने पार्टियां बनाईं, तब-तब कोई बड़ा रास्ता खुलना तो दूर आंदोलन ही कमज़ोर हुआ।  पार्टियां पूंजीपतियों की होती हैं, व्यापारियों, व्यावसायिक वर्गों और संगठित क्षेत्र के कामगारों की होती हैं। जब-जब आंदोलन पार्टियों के फेर में पड़ते हैं, वे इन्हीं वर्गों में से किसी का नेतृत्व स्वीकार करने के लिए मजबूर हो जाते हैं और आंदोलन अपने मुख्य रास्ते से भटक जाता है।  

वास्तविकता यह है कि देश भर में किसानों और आदिवासियों के संघर्ष चल रहे हैं, लेकिन जन-आंदोलनों का नेतृत्व उनके बीच किसी व्यापक एकता अथवा समन्वय को प्रभावी रूप नहीं दे पा रहा है।  इस परिस्थिति में लोकविद्या जन आंदोलन  सामाजिक कार्यकर्ताओं के सामने यह बात रखता आ रहा है कि आंदोलन के नेतृत्व को प्रगति, विकास और लोकतंत्र की  भाषा से अपने को मुक्त करके लोगों के ज्ञान और उनकी भाषा का सहारा लेना होगा।  लोकविद्या के आधार पर व्यापक एकता के विचारों को अपनाना होगा।  महात्मा गांधी के दर्शन में जन-आंदोलन के पुनर्निर्माण का आधार खोजना होगा।  

किसान, कारीगर, मज़दूर, आदिवासी, महिलाएं, पटरी के दुकानदार ये सब मिलकर इस देश का एक बहुत बड़ा ऐसा बहुमत हैं, जो अपने ज्ञान के बल पर अपना परिवार और समाज चलते हैं।  इस देश की  सरकारों ने इनकी विद्या और क्षमता के संवर्धन पर कोई खर्च नहीं किया है, उलटे इनके ज्ञान और श्रम को लूटने की सारी व्यवस्थाएं बनाई हैं।  यह लोकविद्या समाज है और इनके ज्ञान, विचार और भाषा के जरिये ही देश और दुनिया में सत्य और न्याय का सम्मान करने वाली व्यवस्थाओं का निर्माण किया जा सकता है।  ज़रुरत यह है कि बड़ा और दूर का सोचा जाये और नई बन रही दुनिया में जन-आंदोलनों के जरिये समाज की ताकत के नए रूपों की खोज की जाये।  

विद्या आश्रम 

Tuesday, April 8, 2014

प्रिय सुनील जी,

मैं आम आदमी पार्टी के बारे में आपके विचारों से मोटे तौर पर सहमत होते हुए भी असहमत हूँ। पहले मैं आपको अपनी बात बता दूँ। मैं अरविंद और मनीष सीसोदिया को करीब ढाई तीन साल से जानता हूँ - आंदोलन के पहले से। आनंद और योगेंद्र को तो काफी लंबे समय से। पर मैं सिर्फ अरविंद की बात करता हूँ। इन वर्षो मे उससे 8-9 बार मिलना हुआ होगा। जब आप कई बार किसी से भी मिलते हैं तो आपके विचारों मे तब्दीली आती रहती है - कुछ बढ़ता है कुछ घटता है। कमियाँ भी दिखाई देने लगती हैं। पर हर मीटिंग के बाद मेरा  अरविंद के प्रति सम्मान बढ़ा - घटा नहीं। उसमे एक ईमानदारी झलकती है, साहस और एक intuitive समझ भी है। मीडिया से जो दिखाई देता है, उसमे भी थोड़ी सच्चाई होगी ही, उससे जो तस्वीर उभरती है वह मेरे impression से अलग है।

अब बात आम आदमी पार्टी की करे। यह पार्टी दो साल पुरानी भी नहीं है। एक तरह से तो 1 वर्ष पुरानी भी नहीं। इसे बनाने में वक्त लगेगा। इनकी समझ बन रही है, अभी बनी नहीं है। ये आपके जैसे पृष्ठभूमि से आए लोग नहीं हैं। इस बात को आलोचना की दृष्टि से नहीं, इसे ध्यान में रखने की ज़रूरत है। इसमे ऐसे लोग हैं जिन्हे प्राचीलित मुहावरों, भाषा और प्राचीलित ideologies से कुछ निकलता नहीं लगता। इनमे एक impatience है, जो समझी जा सकती है - यह स्थिति हर प्रकार के आम आदमी की है, उनकी भी जिनके बीच आप काम कर रहे हैं, सिर्फ पढे लिखे professional किस्म के लोगों तक ही यह सोच सीमित हो, ऐसा नहीं। यह एक खीज की उपज है - आज की व्यवस्था से, भले ही इनमे  व्यवस्थाओं की समझ बहुत गहरी न हो, या बहुत ही सतही हो। मेरा अपना मानना है अरविंद भ्रष्टाचार के मुद्दे को इतनी अहमियत इसलिए भी देते है क्योंकि यह बात आम आदमी को communicate होती है। साथ ही यह भी सही है ही कि भ्रष्टाचार का मुद्दा व्यवस्था और नीतियों से जुड़ा हुआ है। कम समय में, व्यवस्था की बाते, व्यापक समाज को  ठीक से communicate नहीं हो पाती। उसके लिए मेहनत और समय की ज़रूरत होती है जो आज जिस हालात में वो अपने को पाते हैं उसमे, उनके पास नहीं है। शायद हमे लोकसभा चुनाव के बाद 3-4 महीने इंतज़ार करना चाहिए, उन्हे ठीक से जाँचने के लिए।     

इसके अलावा आपका ध्यान इस बात पर भी दिलाना चाहूँगा कि बहुत सारी जगह उनकी तरफ से अच्छे प्रत्याशी खड़े हुए हैं। सोनी सोरेन छतीसगढ़ से खड़ी हुई हैं। महाराष्ट्र से कुछ पुराने आंदोलन और समाजवादी धारा से जुड़े लोग खड़े हुए है, बिहार के किशनगंज से भी एक पसमंदा मुसलमान प्रत्याशी अच्छा माना जा रहा है। और भी लोग केरल एवं तमिलनाडू जैसी जगह से खड़े हुए हैं। खैर यह मैं कोई उनकी पैरवी करने के आशय से नहीं बता रहा हूँ।
यह पार्ट अभी बन रही है, बनी नहीं है अभी प्रक्रिया चल रही है। इसमे संभावनाएं अभी समाप्त नहीं हुई हैं। महात्मा गांधी के हिंदुस्तान आने से पहले वाली कांग्रेस, और उनके आने के बाद वाली कांग्रेस में बड़ा बदलाव था। इस पार्टी ने हिलाया तो है। इसका असर हर जगह दिखाई देता है। इसने एक space बनाया है, या इन्हे credit न भी दे तो यह कह सकते हैं की अनजाने में एक space create हो गया है। अब इस अवकाश का हम और आप और बहुत सारे अलग अलग क्षेत्रों में लगे लोग, कैसे फायदा उठा सकते हैं - यह प्रमुख मुद्दा है। कुछ हद तक जड़ता टूटी है, लोग नए सिरे से सोचने को तैयार हैं - शायद। हम आम आदमी पार्टी से जुड़े या नहीं, इस अवसर का लाभ उठाया जा सकता है। साथ ही अरविंद जैसे लोगों को समझाया भी जा सकता है - इशारे में ही सही। मेरा विश्वास है की उसमे इतना माद्दा है की वह समझ लेगा।

इस सिलसिले मे आप से कुछ share करना चाहता हूँ। दिल्ली सरकार के चले जाने के बाद मध्यम और उच्च मध्यम वर्गी और professional किस्म के लोगों का एक बड़ा तबका  आम आदमी पार्टी से दूर हुआ है। मेरा अपना मानना है यह इसीलिए दूर हुआ क्योंकि उन्हे कहीं लगने लगा की ये लोग तो व्यवस्था ही तोड़ना या हिलाना चाहते हैं। जबकि इन लोगों को व्यवस्था से कोई खास शिकायत नहीं है। ये वो लोग हैं जो  भ्रष्टाचार और वर्तमान व्यवस्था को अलग अलग देखते हैं जिनकी आपने  अपने ब्लॉग में चर्चा की है। मेरे लिए यह एक अच्छा संकेत है। आप भी इस पर सोचे।   

इस सब के बावजूद मुझे भी कुछ आशंकाए हैं। उनकी टीम मे उन्ही लोगों की जगह लगती है जो राजनैतिक  रूप से परिपक्व नहीं। वे 50 वर्ष से ऊपर के लोगों को दूर ही रखना चाहते हैं। ऐसा लगता है। इसलिए शायद्द हम जैसे लोगो को एक दूरी बना कर ही चलना ठीक रहेगा पर सहानुभूति के साथ। पर जो हम करना चाहते थे पर जड़ता की वजग से कर नहीं पा रहे थे वह जगह खुली है और हमे उसे देखना और समझ कर उसका लाभ उठाने की सोचनी चाहिए।

सादर
आपका 

पवन
सिद्ध, मसूरी   

Sunday, April 6, 2014

Are not Social Movements and AAP Complementary !

Mohini Mullick
Dear Sunil,
A few thoughts in response to your post dealing with the AAP. in no particular order. You say:

Also these movements, although rising often in the name of democracy, have allied with the armed forces with ease. No wonder that the peasants, artisans and adivasis are by and large absent from the discourses started by AAP.
It was Prashant Bhushan of AAP who raised the issue of AFSPA some time ago, suggesting that at least for civilian area deployment, the people of Kashmir be consulted. There was a huge outcry and Kejriwal distanced himself from the Bhushan statement, but mostly because as a party it had not been discussed, no policy had been formulated which is of course true for a number of other important political issues.
Recently I heard a debate in which Bhushan again was arguing for raising the price of crops to farmers. A BJP spokesman countered this with the point that such a move would be inflationary ; then what concern was Bhushan showing towards the 'aam admi'. To which came the prompt reply:'Is the farmer not an aam admi?'
Whereas it is true that AAP  primarily addressed  (during its stint at Delhi) the problems of the urban poor, it is not quite correct to say that the discourse started by AAP finds no place for artisans and the rural poor. There was a forceful move to abolish daily wage work except for small short termed projects. This would directly impact  the income of artisans working in cities. These are  most often a migratory population from the rural areas. 
You are right to say that they have declared that they are not against capitalism--but only crony capitalism which they see as corrupt. Nor are they against corporates per se
But one of the first steps that their government took was to ban FDI in retail in the state of Delhi. This cannot be seen as a defense of capitalism or of the corporate structure. You say about these educated persons of AAP: this class is less connected with the people than any other ruling classes so far.
 
But you have noticed they have at least succeeded in changing some aspects of the political culture already. Almost all candidates are now going on foot to make contact with the people. no lal battis are seen in the footage telecast by tv channels. Even 'chai pe charcha' is the result of the kind of contact that AAP made 'fashionable', if nothing else.
But let me come to my major point/suggestion for you to ponder over..
If there are values and some goals that are compatible if not overlapping with those of LJA, then you could explore the possibility that this movement is complementary rather than antagonistic to what you are trying in your own way, to achieve. I am not wanting to prejudge the outcome of such an effort. It is just that I feel a very strong peoples' movement could be the result of mutual support rather than antagonism. Each movement has its own history: it draws on a particular section of society whose concerns it feels most strongly for. Also its approach and method is limited by these concerns. So focus on vidya is one, and I do feel that lok vidya is a very foundational concept for all peoples movements. But as Amit Basaole(spelling?) said, let us also look at lok , Then we will find a multiplicity of loks and their vidyas ( about which I have written earlier).
Medha Patkar initially worked  with the urban poor--I could be wrong about that : she worked in Bombay. But she did not hesitate to take on the settlers --adivasis-- of the Narmada valley. And now has joined AAP. Of course so has Sanyal--Meera I think. But why? Even corporates need cleaning up--not just governments. In any case she has probably left the corporate world. Should we hold her background against her?
In conclusion, Let me repeat that there could emerge an important complementarity in the efforts of SMs and AAP whixh is also one. To see this as a process of co-option without exploring all possibilities, I see as unfortunate for all concerned, which is all of us who are concerned --in our own limited way.
Warmest wishes to you and Chitra in your life's work,
Mohini Mullick

वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति पर बैठक , नागपुर, 29 मार्च 2014

(अप्रैल 3  और अप्रैल 5 के अंग्रेजी के ब्लॉग पोस्ट का हिंदी रूपांतरण नीचे दिया जा रहा है। )

आगामी लोकसभा चुनावों के सन्दर्भ में 29 मार्च 2014  को आपस में चर्चा के लिए लोकविद्या जन आंदोलन ने एक बैठक आयोजित की।  हालांकि बैठक छोटी थी , 15 के आस-पास व्यक्ति उपस्थित थे , सामाजिक आंदोलनों , ट्रेड यूनियन, दलित संगठन, शेतकरी संघटना, मीडिया , लोकविद्या जन-आंदोलन (लो.ज.आ.) और विद्या आश्रम से भागीदारी रही।  आम आदमी पार्टी (आप ) के उदय के अर्थ और जन आंदोलनों के भविष्य पर चर्चा हुई।

सुनील सहस्रबुद्धे ने आप पर चर्चा शुरू की।  उन्होंने कहा कि यह उस नये व्यावसायिक वर्ग की  पार्टी है जो अब लगभग 20 साल से वैश्वीकरण तथा नई सूचना प्रोद्योगिकी के तहत आकर ले रहा है।  यह ऐसे बहुत पढ़े-लिखे समूह के रूप में देखा जा रहा है जिसके सदस्य आपस में सामाजिक मीडिया यानि इंटरनेट के मार्फ़त जुड़े हैं।  यह एक ऐसा वर्ग है जो अभी तक के सभी शासक वर्गों की  तुलना में आम जनता से अधिक दूर है।  उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और 'आप' भारत में एक वैसी ही प्रक्रिया के रूप में उपजे हैं जैसी आंदोलनात्मक  प्रक्रियाएं मिस्र, तुर्की , तुनीशिया , लीबिया, सीरिया , यूक्रेन , थाईलैंड और अमेरिका में भी पिछले 5 सालों में खड़ी होते देखी गयी हैं।  इन सभी आंदोलनों के बारे में यह कहा जाता रहा है कि इन्हें बनाने में सामाजिक मीडिया, फेस बुक इत्यादि की  बड़ी भूमिका रही हैं।  इन सभी आंदोलनों को पश्चिम की  सरकारों  और वहाँ के मीडिया  का समर्थन प्राप्त रहा है।  हालाँकि इनमें से अधिकतर लोकतंत्र के हवाले खड़े हुए, उन्हें फ़ौज की मदद लेने में कोई गुरेज नहीं रहा है।  कोई अचरज की बात नहीं है कि 'आप' द्वारा शुरू की गयी बहसों में किसान, कारीगर और आदिवासी कहीं दिखाई नहीं देते।  यह एक शहरी आंदोलन है और इसने शहरी ग़रीबों की परिस्थिति पर चिंता व्यक्त की है।  'आप' का उस हद तक स्वागत है जिस हद तक वह वर्तमान राजनीतिक तौर-तरीकों और ढांचे को हिला रही है , लेकिन यह न भूला जाए कि उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि वे पूंजीवाद के खिलाफ नहीं हैं।  वे मुकेश अम्बानी और अडानी  पर हमला तो बोल रहे हैं लेकिन कार्पोरेशन के नेतृत्व में पूंजीवादी अर्थ व्यवस्था के खिलाफ वे नहीं बोलते।  उनकी खुले तौर पर कथित नीति भ्रष्टाचार समाप्त करने की  है  और इसके  हल का रास्ता  वे प्रशासनिक सुधार में देखते हैं।  उनके उम्मीदवारों के चयन और प्रचार के तरीकों से यही दिखाई  देता है कि दिल्ली से उपजी यह पार्टी क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के दायरे घटाने का ही काम करेगी और इसके चलते भी राजनीतिक प्रक्रियाओं को लोगों से और दूर ले जायेगी।  पूरा का पूरा घटनाक्रम जनता की , किसानों, कारीगरों और आदिवासियों की एक नई राजनीति की ज़रुरत को  रेखांकित करता है।
उन्होंने कहा कि जन आंदोलनों के कई वरिष्ठ नेता 'आप' के टिकट पर इस लोकसभा चुनाव के उम्मीदवार  हैं। इससे ऐसा लगता है कि पार्टी आधारित चुनावी राजनीतिक प्रक्रियाओं ने जन-आंदोलनों को अपने अंदर ले लिया है।  इसका कारण यह नहीं दिखाई देता कि जन-आंदोलनों के कार्यकर्ता 'आप' में कोई भविष्य देख रहे हैं , लेकिन यह ज़रूर प्रतीत होता है कि वे जन-आंदोलनों का कोई भविष्य नहीं देख रहे हैं।  इसलिए जन-आंदोलनों का पुनर्निर्माण यह देश भर में संघर्षों में जुटे सामाजिक कार्यकर्ताओं के सामने एक बड़े कार्य के रूप में उभरा है।
वर्धा से अाये शेतकरी संघटना के प्रसिद्ध किसान नेता विजय जवंधिया ने कहा कि 'आप' का जन्म भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से हुआ है, जिस मूल विषय पर वे अभी भी टिके हुए हैं लेकिन उन्हें इस देश के सबसे बड़े भ्रष्टाचार पर कुछ कहने के लिए नहीं है।  किसानों और आदिवासियों के संसाधनों की लूट और उनके उत्पादन और काम के लिए कम-से-कम दाम देना, ये इस देश के भ्रष्टाचार के सबसे बड़े नमूने हैं , जिनके बारे में 'आप' चुप है।  उन्होंने असंगठित व संगठित क्षेत्र में आय की विषमता को प्रमुख मुद्दे के रूप में प्रस्तुत किया। सरकार द्वारा बनाये वेतन आयोगों का सन्दर्भ लेते हुए खेतिहर मज़दूरों और सरकारी कर्मचारियों की आमदनी की तुलना की।  उन्होंने कहा कि सातवां वेतन आयोग घोषित है और 2016  से उसकी संस्तुतियां लागू होंगी और उस समय तक एक आंदोलन तेज़ किया जाना चाहिए जो इस देश के हर कार्यकर्ता के लिए उसी आय कि मांग करे जो सरकारी कर्मचारियों के लिए तय किया जाता है।  यह लो.ज.आ. की ही मांग है जो कहता है कि अपने ज्ञान के बल पर यानि लोकविद्या के बल पर काम करने वाले लोगों की आय सरकारी कर्मचारियों की आय के बराबर होनी चाहिए।  अब की बार जन-आंदोलन को लोकविद्या ज्ञान की  भाषा का इस्तेमाल करके लोकदृष्टि से एक नयी दुनिया पेश करनी है।
कोलकाता से प्रकाशित अख़बार  द टेलीग्राफ के नागपुर संवाददाता जयदीप हर्डीकर ने नौजवानों की  दृष्टि से कई बातें कहीं।  उन्होंने कहा कि उन लोगों ने कोई चुनावी लहर कभी नहीं देखी है और इस चुनाव में उन्हें जनता के मुद्दों पर कोई बहस नहीं दिखाई देती। उन्होंने इस मूल्यांकन से अपनी सहमति दिखाई कि 'आप' नए व्यावसाइक वर्ग की पार्टी है और यह कहा कि  यह लोग बड़े पैमाने पर मीडिया में हैं।  इस बात पर उन्होंने ज़ोर दिया कि इस चुनाव में मीडिया और राजनीति  दोनों का ही जनता और सामाजिक प्रक्रियाओं के साथ कोई सम्बन्ध  नहीं दिखाई देता।  संपर्क (connectivity) पर आधारित वर्ग का उदय समाज और जनता के साथ एक नए और ज़बरदस्त असंपर्क (disconnect) का शिकार दिखाई देता है।  उनका कहना था कि जन-आंदोलनों का पुनर्निर्माण एक गम्भीर चुनौती के रूप में उभरा है।
एडवोकेट अशोक थुल ने 'आप' पार्टी के चरित्र के उपरोक्त विश्लेषण से सहमति व्यक्त की और कहा कि अब परिस्थितियां बहुत बदली हुई हैं और जन-आंदोलनों के पुनर्निर्माण में सभी को साथ आने की  ज़रुरत है।
लो. ज. आ. के डा. गिरीश सहस्रबुद्धे ने कहा कि आम और गरीब लोगों की ज़रुरत के सन्दर्भ में नयी दृष्टि अपनाना आवश्यक है।  समाजवाद और प्रगति की भाषा भविष्य की कोई संकल्पना तैयार करने में अब कारगर नहीं है।  अब जन-आंदोलनों के निर्माण के लिए लोकविद्या के ज्ञान विमर्श के मार्फ़त लोगों की ज़रुरतों  और उनकी ताकत की एक एकीकृत दृष्टि अपनानी चाहिए।
सीटू ट्रेड यूनियन के कामरेड गुरप्रीत सिंह  ने जन-आंदोलनों में संगठित क्षेत्र के संघर्षों को शामिल करने की बात कही।  उन्होंने कहा कि इनके यूनियन सक्रिय हैं लेकिन मीडिया उनके काम नहीं दिखाता।  उन्होंने उदाहरण दिया उस वाकये का जब जंतर -मंतर पर 'आप' पार्टी का एक छोटा सा प्रदर्शन मीडिया में छाया रहा जबकि उसी दिल्ली में  उसी दिन ट्रेड यूनियन के लाखों लोग एक प्रदर्शन में इकठ्ठा थे किन्तु मीडिया ने उस ओर नज़र तक नहीं डाली।
दलित पैंथर के नेता प्रकाश बंसोड़ ने बैठक का समापन किया।
लो. ज. आ. और कष्टकरी जन-आंदोलन के विलास भोंगाडे ने इस बैठक का सञ्चालन किया और अंत में यह विचार के लिए रखा कि इस बैठक की प्रक्रिया आगे कैसे जायेगी ? इस बात से सब सहमत थे कि चुनाव के बाद, शायद जून अंत में, जन संघर्षों का एक ऐसा समागम संगठित किया जाये जिसमें इस बैठक में विशेष तौर पर उभरी दो बातें प्रमुख हों।  ये बातें हैं -
  1. असंगठित क्षेत्र और सरकारी कर्मचारियों के वेतन की विषमता दूर हो।  केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त वेतन आयोग द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन सभी को मिलना चाहिए।  ज्यादातर लोग अपने ज्ञान यानि लोकविद्या के आधार पर काम करते हैं और अपनी जीविका कमाते हैं।  इन सब लोगों को नियमित मासिक वेतन मिलना चाहिए जो सरकारी कर्मचारी के बराबर हो।  
  2. देश भर में विभिन्न मुद्दों , विषयों और क्षेत्रों में कार्यरत सामाजिक कार्यकर्ता, अभियान और संघर्ष साथ आकर जन-आंदोलन का पुनर्निर्माण करें।  विकास, लोकतंत्र और प्रगति की भाषा के जाल से अपने को मुक्त करें और अपने ज्ञान व अपनी भाषा के जरिये एक नयी दुनिया के आधारभूत विचार की चर्चा आगे बढ़ाएं। यही आर्थिक न्याय और सभी को बराबरी का सम्मान के आधार पर इस देश के पुनर्निर्माण का रास्ता है।   
इस नागपुर बैठक के बाद इस चुनाव के दौर में  लो.ज.आ. क्या करे इस पर दो बातें सामने आयीं -
  1. जहाँ-जहाँ लो.ज.आ. सक्रिय है वहाँ और संगठनों और धाराओं के साथ मिलकर सार्वजनिक कार्यों, सभा इत्यादि को आकार दिया जाये।  उन सब लोगों को शामिल करने का प्रयास हो जो इस चुनाव के मार्फ़त गरीब लोगों के भविष्य में सुधार की कोई सम्भावना नहीं देखते।  ये सभाएं या प्रक्रियाएं उम्मीदवारों से वार्ता के लिए न हों, बल्कि यह कहने के लिए हों कि सामाजिक कार्यकर्ताओं की दृष्टि में इस देश की जनता इस देश को कैसा देखना चाहती है।  
  2. लो. ज. आ. अपने कार्यों के प्रमुख स्थानों पर चुनाव के दिन के पहले प्रेस वार्ताएं बुलाएं।  यह नागपुर, पटना / दरभंगा, सिंगरौली / बस्तर , इंदौर / भोपाल , हैदराबाद , विजयवाड़ा और वाराणसी में हो सकती हैं।  गिरीश, विजय कुमार, रवि शेखर, संजीव, अवधेश, कृष्णराजुलु, नारायणराव , मोहनराव , दिलीप और चित्राजी कृपया इस पर विशेष ध्यान दें।  प्रेस वार्ता के अपने पत्रक में लो.ज.आ. दृष्टिकोण, उस क्षेत्र से सम्बंधित बातें , चुनाव में ग़रीबों के मुद्दों की अनुपस्थिति और जन-आंदोलनों का 'आप' में समाहित हो जाना जैसी बातें हों।  लोकविद्या ज्ञान विमर्श के जरिये जन-आंदोलन के नए आधार को बनाने की बात हों।  इसके लिए दो बातें विशेष रूप से शामिल की जा सकती हैं-  (i) लोकविद्या आधारित जीविका के परिवारों में कम-से-कम एक तनख्वाह आनी  चाहिए जो सरकारी कर्मचारी की तनख्वाह के बराबर हो।  (ii) राष्ट्रीय संसाधनों का बराबर का बंटवारा हो।  ये राष्ट्रीय संसाधन हैं - बिजली, पानी, वित्त, शिक्षा और स्वास्थ्य। 
प्रेस वार्ता के ये पत्रक वहीँ तैयार किये जाएं जहाँ प्रेस वार्ता आयोजित की जा रही हो।

सुनील सहस्रबुद्धे 
विद्या आश्रम 

Saturday, April 5, 2014

LJA Press Conferences Proposal

Since we wrote the previous post reporting the Nagpur meeting of 29th March, there has been discussion here about the role of LJA in the present situation. There are two ways -
(i) At different places where we are active we may ally with other organizations to take a general stand, organize meetings and campaigns which we are already doing at many places,  and
(ii)  LJA may take a public stand in the present situation at least in places where there is LJA initiative at work.
It seems it would be appropriate if we held press conferences at Nagpur, Patna/Darbhanaga, Singrauli/Bastar, Indore/Bhopal, Hyderabad, Vijaywada and Varanasi. Girish, Vijay Kumar, Ravishekhar, Sanjeev, Awdhesh, Krishnarajulu, Narayan Rao, Mohan Rao, Dilip may please pay attention to this and do the needful.
These press conferences need to be held before the polling in these cities. Reference may be taken of our Multai LJA Conference (Blog post 21 January 2014), Varanasi Kisan-Karigar Panchayat (Blog post 22 February 2014), and Nagpur Meeting (Blog post 3rd April 2014). The press statement may contain the general LJA stand, some issues specific to that region, the absence of any promise for the poor and the deprived in the General Election which this time has become the agency for co-option of the people's movements. One may talk about the necessity of rebuilding the people's movement with a contemporary lokavidya knowledge perspective in which  we may like to focus on two of the five points listed in the Multai Conference which relate to -
(i) assured monthly remuneration to lokavidya households equal to the salary of a government employee and
(ii) equal distribution of national resources which includes electricity, water, finance, education and health.

These are only suggestions and the press statements may be prepared at places where the press conference is held.

Sunil Sahasrabudhey
Vidya Ashram