Thursday, May 30, 2019

भारत की राजनीति में दर्शन की भूमिका - बैठक का जायजा


स्वदेशी दर्शन परम्पराएं और मूल्य आधारित राजनीति
28 मई 2019 को शाम 5 बजे

        28 मई 2019 को शाम 5 बजे दर्शन अखाड़ा, राजघाट, वाराणसी पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन हुआ. विषय था - भारत की राजनीति में दर्शन की भूमिका : स्वदेशी दर्शन परम्पराएं और मूल्य आधारित राजनीति. 
लोकसभा चुनाव नतीजों के सन्दर्भ में यह बैठक आनन-फानन में ही तय हुई थी और सूचना केवल एक दिन पहले ही दी जा सकी थी इसलिए कई लोग नहीं आ पाये. उपस्थित थे - अमरनाथ भाई, योगेन्द्र नारायण शर्मा, मो. आरिफ, मिथिलेश दुबे, रामजनम, फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, प्रेमलता सिंह, चित्रा सहस्रबुद्धे, लक्ष्मण प्रसाद, गोरखनाथ, अरुण कुमार और सुनील सहस्रबुद्धे. 
स्वदेशी दर्शन परम्पराओं से हमारा अभिप्राय गाँधी, कबीर, रविदास, तथा इन जैसे संतों के दर्शन से रहा. इस विचार गोष्ठी में भी राजनीति में दर्शन की भूमिका की बात करते हुए इन्हीं लोगों के दर्शन की ओर ध्यान खींचा गया. विश्वविद्यालयों में या तो इन्हें पढाया नहीं जाता है, या फिर हिंदी, इतिहास, राजनीति शास्त्र जैसे विभागों में पढाया जाता है, दर्शन विभाग में नहीं. इसके चलते और यूरोपीय विचारों के प्रभाव के चलते पढ़े-लिखे लोग इन्हें दार्शनिकों के रूप में सहजता से नहीं देख पाते. जो वैचारिक स्थापनाएं राजनीति में प्रासंगिक हो सकती हैं उन्हें अधिकांश 18 वीं औरे 19 वीं सदी के यूरोप से लिया जाता है और अपने दार्शनिकों के विचार समाज और व्यक्ति स्तर पर ग्राह्य तो माने जाते हैं लेकिन राजनीति में उनकी भूमिका नहीं देखी जाती. हम राजनीतिक सन्दर्भों में सत्य, प्रेम, अहिंसा, न्याय, भाईचारा जैसे विषयों पर कम ही बात करते हैं. अब सत्याग्रह की बात भी सामाजिक संघर्षों से बाहर हो चली है. इन्हीं स्थितियों पर गौर करने के लिए और आवश्यक सुधार की दृष्टि से एक बहस शुरू करने के इरादे से यह चर्चा रखी गई थी और वैसा ही हुआ. जो उभर कर आया वह यह था कि हमें राजनीतिक बहस और क्रियाओं के लिए नए प्रस्थान बिंदु चाहिए. ऐसे प्रस्थान बिंदु जो दर्शन को लोकमन और सामान्य जीवन के इतने नज़दीक देखें कि दार्शनिक व्याख्याओं और राजनैतिक चर्चाओं के बीच अंतर मिटने लगें. लोगों ने कहा कि यह बड़ा प्रश्न है और किसी एक बैठक में ऐसे प्रस्थान बिंदु खोज लिए जायेंगे, यह नहीं हो पायेगा. इसके लिए ऐसी बैठकों का सिलसिला चलना चाहिए और नए-नए लोगों को विमर्श में जोड़ा जाना चाहिए. 
अगले दिन फिर इसी विषय पर विद्या आश्रम में अमरनाथ भाई, मो. आरिफ, नूर फातमा, लक्ष्मण प्रसाद, चित्रा जी और सुनील की आपस में बातचीत हुई.








विद्या आश्रम 

Monday, May 27, 2019

भारत की राजनीति में दर्शन की भूमिका



दर्शन अखाड़ा
ए 11/13 नया महादेव, राजघाट, वाराणसी

निमंत्रण
विचार गोष्ठी
भारत की राजनीति में दर्शन की भूमिका
 स्वदेशी दर्शन परम्पराएं और मूल्य आधारित राजनीति
28 मई 2019 को शाम 5 बजे

28 मई 2019 को शाम 5 बजे दर्शन अखाड़ा, राजघाट, वाराणसी पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन है. विषय है - भारत की राजनीति में दर्शन की भूमिका : स्वदेशी दर्शन परम्पराएं और मूल्य आधारित राजनीति.

बात अब लोकसभा चुनाव की चर्चा के आगे बढ़ जानी चाहिए. भारत के सामाजिक जीवन में दर्शन का एक प्रमुख स्थान हमेशा से रहा है. साम्राज्यवाद ने राजनीति और समाज के बीच जो अलगाव पैदा किये उसे हम आज तक ढो रहे हैं. समाज की दार्शनिक चर्चाओं को राजनीति विस्थापित करती हैं और खुद दर्शन से मुक्त होकर समाज पर शासन के औजार बनाती हैं. भारत की राजनीति ने जिन लोगों को मन की गहराइयों तक उद्वेलित किया है वे तरह-तरह के कोण से समाज में संवेदना और विचार की प्रतिष्ठा के बारे में और खुद विचार पर भी सोचते रहते हैं. मनुष्य स्पष्ट विचार तभी कर पाता है जब अपने को विवश नहीं समझता. यही सब सोचते हुए प्रस्तावित वार्ता की बात बनी. अमरनाथ भाई और विजय नारायण जी से चर्चा करके यह तय किया गया कि दर्शन अखाड़ा राजघाट पर ऐसा कुछ विचार विनिमय किया जाये. आप सभी सादर आमंत्रित हैं. 

सुनील सहस्रबुद्धे                                 गोरखनाथ                               

Tuesday, April 23, 2019

कारीगर किसान पंचायत, वाराणसी


      वाराणसी में शनिवार, 20 अप्रैल 2019 को दोपहर 1 से 4 बजे के बीच पराड़कर भवन, मैदागिन में एक कारीगर-किसान पंचायत का आयोजन हुआ. करीब सौ लोगों की भागीदारी में इस पंचायत ने प्रमुखरूप से ज्ञान की बराबरी और आय की बराबरी का दावा किया.


कारीगर, किसान, हर तरह के मिस्त्री, तरह-तरह की सेवा देने वाले, मरम्मत और रख-रखाव का काम करने वाले, छोटी पूँजी से धंधा करने वाले, पटरी और ठेले वाले और इन सबके घरों की स्त्रियाँ, ये सभी अपने सब काम अपने ज्ञान (लोकविद्या) के बल पर करते हैं. यह कारीगर-किसान पंचायत यह दावा पेश करती है कि इन सबका ज्ञान विश्वविद्यालय के ज्ञान से कम नहीं आँका जा सकता और यह कि इन्हें भी वैसी ही आय का हक़दार माना जाना चाहिए जैसी आय एक सरकारी कर्मचारी की होती है. वक्ताओं ने कारीगरों और किसानों के ज्ञान के विविध पक्षों को उजागर किया और कहा कि इनका ज्ञान विश्वविद्यालय के ज्ञान से अलग होता है. इसके मूल्य, संगठन के तरीके, तर्क के विधान, समाज और प्रकृति से रिश्ते, ये सभी अलग होते हैं. इसी ज्ञान के बल पर समाज की तमाम आवश्यकताएं पूरी की जाती हैं. यह ज्ञान व्यवहार और सिद्धांत दोनों ही स्तरों पर विश्वविद्यालय के ज्ञान से कम नहीं होता. ज्ञान के क्षेत्र में ऊँच-नीच में सामाजिक और आर्थिक ऊँच-नीच पैदा करती है.
 
2019 के आम चुनावों में भाग ले रही सभी पार्टियों और उम्मीदवारों से इस पंचायत की दरख्वास्त है कि खैरात नहीं, इमदाद नहीं, न्यूनतम आय नहीं, गरीबी और मज़दूरी की बात नहीं, बल्कि बात पक्की और नियमित आय की है क्योंकि बात ज्ञान और बराबरी की है.

दुनिया के खुशहाल देशों में शुमार होने के लिए और सबके प्रति न्याय के लिए यह ज़रूरी है कि समाज में प्रचलित हर तरह के ज्ञान को अपना योगदान देने के पूरे मौके मिलें. बराबरी का सम्मान और बराबरी की आय से ही ये मौके तैयार होते हैं. लोकविद्या किसी भी समाज की सबसे बड़ी शक्ति होती है. उसे पहचानो, बराबरी का सम्मान दो, यही हमारी प्रगति का रास्ता है. जज़्बे और इज़ाफे से काम करने के लिए आर्थिक और सामाजिक बराबरी अनिवार्य है. बराबर की आय की मांग इसी शर्त को पूरा करने की तरफ एक कदम है.

काशी के वरिष्ठ समाजवादी चिन्तक विजय नारायण, बुनकरों के नेता अब्दुल हमिद अंसारी, करसडा के किसान संघर्ष की नेता लालती देवी, ग्राम सेवा संघ, बंगलुरु के अभिलाष और लोकहित सृजन समिति सिंगरौली के अवधेश कुमार और सुनील सहस्रबुद्धे, ये सब इस पंचायत के अध्यक्ष मण्डल के सदस्य थे. लक्ष्मण प्रसाद और फ़ज़लुर्रहमान अंसारी ने पंचायत का विचार और प्रस्ताव सबके सामने रखा और पंचायत का सञ्चालन किया. बोलने वालों में प्रमुख रहे -- सुनील सहस्रबुद्धे, विजय नारायण, मोबिन अहमद अंसारी, इदरिस अंसारी, अब्दुल मतीन अंसारी, मुहम्मद अहमद, महेंद्र प्रताप मौर्य, जितेन्द्र तिवारी, रामजनम, लालती देवी, जाग्रति, बाबूलाल मौर्य, रणधीर सिंह, महेंद्र यादव इत्यादि. बंगलुरु से ग्राम सेवा संघ के अभिलाष और सिंगरौली के आदिवासी किसान एकता संगठन से लक्ष्मीचंद दुबे ने अपनी बात रखी.

लोकविद्या जन आन्दोलन (लक्ष्मण प्रसाद 9026219913), कारीगर नज़रिया, (एहसान अली),    भारतीय किसान यूनियन(वाराणसी मण्डल अध्यक्ष जितेन्द्र तिवारी), अंसारी एकता संगठन (फ़ज़लुर्रहमान अंसारी 7905245553), बुनकर दस्तकार अधिकार मंच (इदरिस अंसारी), बुनकर दस्तकार मोर्चा (मोबिन अहमद), गांधी विद्या संस्थान कर्मचारी परिषद (गोरखनाथ यादव ) और स्वराज अभियान (रामजनम) के समर्थन में विद्या आश्रम, सारनाथ ने इस पंचायत को आयोजित किया.

विद्या आश्रम 





Wednesday, April 10, 2019

कारीगर नजरिया

मार्च 2019 से एक अंतराल के बाद 'कारीगर नजरिया' फिर से छपना शुरू हुआ है. फिलहाल आगामी लोकसभा चुनाव के ठोस सन्दर्भों के चलते बहस की ज़रूरतों को ध्यान में रखा गया है. जिन विषयों को सामने रखा गया हैं वे हैं -- ज्ञान, आय और रोज़गार ; बौद्धिक सम्पदा, प्रगति के मानक और जलवायु ; सामाजिक न्याय संघर्ष के आगे के कदम, स्वराज का विचार और वास्तविक सम्भावनायें , सामाजिक और राजनैतिक नेतृत्व से वार्ता व लोकविद्या जन आंदोलन की रिपोर्टिंग, जिसमें ज्ञान पंचायतों की प्रक्रिया और सबकी पक्की आय के दावे प्रमुख हैं.

मार्च के अंक में कारीगर और किसान देश का अजेंडा बनाएं इस पर ज़ोर दिया गया है. सब्सिडी और खैरात से एकदम अलग, गरीबी और मज़बूरी से दूर हटकर ज्ञान पर आधारित आय को जायज़ बताते हुए वस्तुपरक तर्क प्रस्तुत किये गए हैं, तथा इस सन्दर्भ में स्वराज के ज्ञान आधार पर चर्चा है. अविरल निर्मल गंगाजी के लिए साधुओं के त्याग भरे संघर्ष को समर्थन दिया गया है। 

'कारीगर नजरिया' का छठा अंक अप्रैल ,  2019  का  है.  इसमें स्थानीय कारीगरों और राजनीतिक नेताओं से ‘सबकी पक्की और नियमित आय’ के सवाल पर की गई वार्ता को स्थान दिया गया है. इसके अलावा इस प्रश्न को एक बड़े घेरे में भी रखा गया है जिसके अन्तर्गत पूँजी और संपत्ति के प्रश्न पर बहस के लिए एक पहल की गई है और आय की सुरक्षा को ‘शहरीकरण कैसा हो’, महानगरों की तुलना में कस्बाई प्रवृत्ति का हो, इससे जोड़ा गया है.

अप्रैल अंक का  लिंक है: http://www.vidyaashram.org/papers/Karigar%20Najariya-ank-6-April-2019.pdf


मार्च अंक का लिंक है: http://www.vidyaashram.org/papers/Karigar%20Nazaria.pdf-ank-5-Mar-2019.pdf

Tuesday, March 26, 2019

काशी दर्शन के विविध अर्थ

23 मार्च की दोपहर को दर्शन अखाड़े पर 'काशी दर्शन के विविध अर्थ' पर चर्चा हुई. काशी की संस्कृति और समाज की बृहत् जानकारी रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार श्री अमिताभ भट्टाचार्य ने अपनी बात लगभग 25 की संख्या में उपस्थित सामाजिक सरोकार रखने वाले प्रबुद्ध जनों के सामने रखी. उन्होंने ' मैं और हम' का मुहावरा रूप इस्तेमाल किया और काशी को ज्ञान, धर्म, राजनीति इत्यादि में विविध पथों पर संचरण कर रहे लोगों के आपसी सामंजस्य, सौहार्द और संवाद का अद्भुत स्थान बताया . उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आजकल बहुवचन के स्थान पर एकवचन (सेल्फी) के आरोप का दौर चल रहा है, यह अनिष्ट का सूचक है. 




यदि यह दौर चलता रहा तो काशी का बहुवचनीय विविधता का मूल स्वरुप नष्ट हो जायेगा. इसी विविधता में काशी दर्शन के विविध अर्थों को भी देखा जा सकता है. परिचर्चा में वरिष्ठ सहयोगी विजय नारायण सिंह, अशोक मिश्र, राजेंद्र प्रसाद सिंह और अमर बहादुर सिंह ने अपने विचार रखे. काशी के राजनितिक चरित्र से लेकर पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति की अवधारणा तक चर्चा हुई. दर्शन अखाड़ा के संयोजक सुनील सहस्रबुद्धे ने काशी दर्शन के विविध अर्थों के अंतर्गत 'ज्ञान पर्यटन' का विचार सामने रखा, यह कहते हुए कि कबीर, रविदास, रामानंद, पार्श्वनाथ, महात्मा बुद्ध, बाबा विश्वनाथ, माँ गंगा, कृष्णमूर्ति, एनी बेसेन्ट, महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी, इदारतुल - बुहोसिल इस्लामिया जामिया सल्फिया, कीनाराम अवधूत परंपरा , माँ आनंदमयी, ये सब तथा और कई, विविध ज्ञान परम्पराओं से हमारा परिचय काशी की भूमि पर कराते हैं. उन्होंने कहा कि आज 23 मार्च इस चर्चा के लिए बहुत बड़ा दिन है, तथा दर्शन अखाड़े की ओर से भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को उनकी महान शहादत के लिए याद किया और डा. लोहिया को उनके जन्म दिवस के लिए. कहा कि हमें इन सबको एक दार्शनिक के रूप में भी देखने की ज़रूरत है. दर्शन न अमूर्त होना ज़रूरी है और न उसे विश्वविद्यालय की मुहर की दरकार है. दर्शन अविभाज्य और अबाधित चिंतन हैं. बातों को उनकी गहराई और व्यापकता में एक साथ देखने की वृत्ति है. 



अंत में हम सबके वरिष्ठ साथी विश्वास चन्द्र जी ने अपने अध्यक्षीय सम्भाषण में काशी दर्शन के अर्थों को समझने के लिए कुछ पुस्तकों के नाम बताये और कहा कि कभी भी दोपहर को पराड़कर भवन में उनसे मिलकर ये पुस्तकें पढ़ने के लिए प्राप्त की जा सकती हैं.