Tuesday, July 30, 2019

विद्या आश्रम स्थापना दिवस


स्थापना : 1 अगस्त 2004
निमंत्रण

विद्या आश्रम स्थापना दिवस
गुरूवार, 1 अगस्त 2019
दिन में 11.00 से 2.00

दिन में 11. 00 बजे
विमर्श :  लोकविद्या समाज के नौजवानों का भविष्य

2.00 बजे – सामूहिक भोजन

वरिष्ठ सामाजिक विचारक एवं कार्यकर्ताओं के सामने लोकविद्या-समाज के संगठनकर्ता एवं नौजवान अपनी बात रखेंगे, उन्हें सुनने और प्रोत्साहित करने अवश्य आइये.

वक्ता

बिंद्रा पटेल                       किसान, डोमरी
हरिश्चंद्र बिंद                     माँ गंगा निषाद समिति
धर्मेन्द्र कुमार निषाद               निषाद समाज, राजघाट
आरती कुमारी                    सराय मोहाना
प्रेम सोनकर                     पटरी-ठेले संघर्ष समिति
आबिद शेख                      बुनकर, मलदहिया
चंदा यादव                       नारी हस्तकला समिति
मकबूल अहमद                   बुनकर, जैतपुरा
अब्दुल मतीन अंसारी              दस्तकार बुनकर मोर्चा
अजय कुमार मौर्य                 शिक्षक, सलारपुर

वक्ताओं के बाद खुली चर्चा होगी और सभी अपनी बात रखेंगे.
सञ्चालन : लक्ष्मण प्रसाद और फ़ज़लुर्रहमान अंसारी

निवेदक
चित्रा सहस्रबुद्धे                              लक्ष्मण प्रसाद
समन्वयक, विद्या आश्रम                     लोकविद्या जन आन्दोलन

Monday, July 22, 2019

प्रेमचंद का दर्शन : सामान्य जीवन, समाजबोध और प्रगति के मानक


निमंत्रण

दर्शन अखाड़ा पर एक वार्ता
28 जुलाई 2019
शाम 5 बजे

प्रेमचंद (जन्म 31 जुलाई 1880) वाराणसी शहर से सटे हुए लमही गाँव के निवासी थे. चूँकि 31 जुलाई को शहर में और लमही में कार्यक्रम होते हैं, हमने सोचा कि रविवार 28 जुलाई को कुछ बातचीत दर्शन अखाड़ा पर हो जाये. प्रेमचंद के दर्शन पर कुछ बात हो.
साहित्य, कला और सृजन के पीछे एक दर्शन और विश्व दृष्टि न हो तो वह कालजयी कैसे हो सकता है? आइये, प्रेमचंद को एक दार्शनिक के रूप में देखने का प्रयास किया जाए. खोजा जाये आज के लिए कैसी भावी दृष्टि की विरासत उनसे मिलती है. हमें लगा कि सामान्य जीवन, समाजबोध व प्रगति के मानक के सन्दर्भों में बातचीत से कुछ प्रस्थान बिंदु मिल सकते हैं.  
विद्या आश्रम साहित्य में दर्शन की खोज का हिमायती है. हम उसकी जाँच की बात को ठीक नहीं समझते. दर्शन ढूंढ़ें तो अक्ल में कुछ इजाफा हो सकता है.  
प्रेमचंद को कमोबेश हम सबने पढ़ा है. उनके लेखन पर चिंतन भी किया है. आपसे अनुरोध है कि एक डेढ़ पेज या दो पेज इस पर लिख कर भेजें. वार्ता में शामिल हों और अपनी बात कहें. फेसबुक पर ही लिखकर भेज दें या फिर विद्या आश्रम के ई–मेल vidyaashram@gmail.com पर.

सुनील सहस्रबुद्धे (9839275124)        गोरखनाथ (9450542636)

दर्शन अखाड़ा स्थान : ए 11/13 नया महादेव, राजघाट, वाराणसी
राजघाट (भैंसासुर घाट) पर रविदास मंदिर से दशाश्वमेध की ओर बढ़ने पर सुलभ शौचालय के पीछे पंच अग्नि अखाड़ा के बीस कदम आगे


Saturday, June 15, 2019

दर्शन अखाड़ा में कबीर ज्ञान पंचायत

वाराणसी का पंचगंगा घाट कबीर के ज्ञान प्राप्ति का स्थान माना जाता है. कबीर ज्ञान पंचायत के लिए यह सबसे उपयुक्त स्थान होता. इस बार हम इसे नहीं कर पाए, अगली बार यहाँ कबीर दर्शन से साक्षात्कार का आयोजन करने का प्रयास ज़रूर करेंगे. वाराणसी में पंचगंगा घाट से उत्तर-पूर्व दिशा में लगभग एक किलोमीटर दूर, राजघाट (भैंसासुर घाट) पर दर्शन अखाड़ा है. इस वर्ष कबीर जयंती (17 जून ) के चार दिन पूर्व 13 जून को दर्शन अखाड़ा में कबीर ज्ञान पंचायत रखी गई. इस कबीर ज्ञान पंचायत में वाराणसी के कुछ सामाजिक विचारक और कार्यकर्त्ता जुटे. आज की दुनिया में कबीर दर्शन से क्या उजाला मिलता है इस विषय पर सभी ने अपने-अपने विचारों को साझा किया. कबीर दर्शन ज्ञान और विचार की दुनिया में एक बहुत बड़ा फलक देता है, ऐसे में चर्चा के प्रस्थानबिन्दु के रूप में उनका एक पद पंचायत के सामने रखा गया.     
मेरा तेरा मनुवा कैसे होई एक रे II
मैं कहता आंखन की देखी, तू कहता कागज़ की लेखी I
मैं कहता सुरझावनहारी, तू राख्यो उरझाई रे I
मेरा तेरा मनुवा कैसे होई एक रे II
मैं कहता जागत रहियो, तू रहता है सोई रे I
मैं कहता निर्मोही रहियो, तू जाता है मोई रे I
मेरा तेरा मनुवा कैसे होई एक रे II
बायें  से -- महेंद्र मौर्य, अरुण कुमार, रामजनम, फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, 
एहसान अली. मतीन अंसारी, गोरखनाथ और मो. अलीम  
कबीर ने अपने समय के स्थापित संगठित ज्ञान और सत्ता की सांठ-गांठ को चुनौती दी.  ज्ञान जिसे समाज का एक छोटा सा समूह ही हासिल कर पाता है और जिस ज्ञान का सत्ता से सीधा सम्बन्ध होता है उस समूह को अपने ज्ञान का अपार दंभ हो जाता है. वह खुद को समाज के अन्य लोगों से अलग करता है, अपने को विशेष समझता है, शेष समाज को मूर्ख समझता है. कबीर के समय यही स्थिति थी. उनके समय स्थापित ज्ञान बहुत कुछ धार्मिक घेरे में रहा, ऐसे में वे धर्म के ठेकेदारों को संबोधित करते दिखाई देते हैं. आज अगर कबीर होते तो किसे संबोधित करते? आज का प्रतिष्ठित ज्ञान विश्वविद्यालय का ज्ञान है. विश्वविद्यालय राजसत्ता के साथ सांठ-गांठ कर ज्ञान के ठेकेदार बने हुए हैं. ये राजसत्ता की नीतियों को समाज में मान्यता और आधार प्रदान करने के औजार हैं. इस ज्ञान का सत्य और न्याय से कोई लेना-देना नहीं है, लोगों की आवश्यकतायें और कष्टों से कोई लेना-देना नहीं है. अगर होता तो हमारी रोज़गार, उद्योग, शिक्षा, न्याय, चिकित्सा, आदि की नीतियां, गाँव और शहरों का संगठन और सम्बन्ध कुछ ही लोगों के लिए लाभ और सुविधा देने के लिए न बन गए होते. हम सभी जानते हैं कि गांधीजी ने भी अपने समय के प्रतिष्ठित ज्ञान और सत्ता के सम्बन्ध को अन्यायी और लोक विरोधी कह कर चुनौती दी.
आज के “कागज़ की लेखी” ज्ञान के वाहक और राजसत्ता से सुविधा प्राप्त समूह के ज्ञान और ज्ञान-संस्थानों को चुनौती “आंखन देखी” ज्ञान-परंपरा के वाहक समाजों से जब मिलेगी तो समाज के सभी तबकों और हिस्सों के लिए न्याय का रास्ता खुलेगा. पंचायत में विषय को रखते हुए सुनीलजी ने कहा कि इस चुनौती को पद की पहली पंक्ति “मेरा तेरा मनुवा कैसे होई एक रे” अपनी सम्पूर्णता में सामने लाती है. समाज को सभी तरह के ज्ञान की आवश्यकता है. ऐसे में किसी एक ही ज्ञान को प्रतिष्ठित किया जाये या ज्ञान की कसौटी बना दिया जाए तो यह अन्याय का रास्ता खोल देता है. ऐसे में प्रतिष्ठित ज्ञान और समाज में स्थित ज्ञान प्रवाहों के बीच बराबरी और मैत्री का सम्बन्ध आवश्यक है.

बाएं से -- प्रेमलताजी, चित्राजी, सरगम येर्रा और वनलता बुलुसु

कबीर ज्ञान पंचायत में उपरोक्त पद का सन्दर्भ लेते हुए सभी लोगों ने अपने विचार रखे. महेंद्र प्रसाद मौर्य ने कहा कि कबीर ज्ञान की इजारेदारी का विरोध करते हैं. सबके पास ज्ञानेन्द्रियाँ हैं और हर कोई ज्ञान प्राप्त करता है. सबका ज्ञान अलग अलग होता है. यह अलग-अलग ज्ञान समाज के बीच आना चाहिए. हैदराबाद से इस पंचायत में शामिल होने आई वनलता ने सवाल उठाया कि ज्ञान पर सहमति के आधार क्या हों, इस पर भी विचार होना चाहिए. प्रेमलताजी ने इस बात पर जोर दिया कि ज्ञान को व्यक्तिगत पहचान के साथ न देख कर समाज के ज्ञान  के रूप में देखना होगा. लक्ष्मण प्रसाद ने कबीर के सहज ज्ञान की ओर सबका ध्यान खींचा और कहा कि सहज ज्ञान को समाज में प्रतिष्ठा मिलेगी तो पाखंड और अन्याय से मुक्ति का रास्ता खुलेगा. रामजनम ने कहा कि किसान और गाँव- समाज के पास जो ज्ञान है उसे न्याय मिलना चाहिए. गोरखनाथ ने कबीर के ज्ञान को सत्य से तपा और प्रेम से सिक्त हुआ कहा. एहसान भाई का जोर हमेशा की तरह नैतिकता पर था. कैसे भी दबाव के बावजूद सही और गलत की पहचान से ही रास्ता बने और अपने को बड़ा और दूसरे को छोटा न देखा जाए. फ़ज़लुर्रहमान अंसारी ने इस बात पर जोर दिया कि कबीर की ज्ञान परंपरा में हमें खुद को देखना होगा, न कि कबीर संस्थानों की परम्परा में. ऐसे में कारीगर और किसान समाजों को अपने ज्ञान को विश्वविद्यालय के ज्ञान के बराबर होने का दावा प्रस्तुत करना होगा. रास्ता चाहे लम्बा हो लेकिन यही सत्य का रास्ता है, यही कबीर का रास्ता है. अरुणजी ने कहा कि इन सभी बातों पर सहमति है लेकिन प्रमुख बात “मेरा तेरा मनुवा कैसे होई एक रे” में देखी जाये. लोकविद्या समाज और उच्च शिक्षित लोगों के बीच, उनकी विद्याओं के बीच मैत्री और सद्भाव का रिश्ता कैसे बने यह प्रमुख चिंता का विषय है. इसके लिए क्या क्रिया करनी चाहिए? बुनकर दस्तकार मंच के मतीन भाई ने कहा कि “मेरा तेरा मनुवा कैसे होई एक रे” यही आज जनसंगठनों और जन आंदोलनों का प्रमुख कार्य है. चित्राजी ने कहा कि इस पद से स्वराज की कल्पना को आधार मिलता दिखाई देता है. ऐसे समाज की कल्पना जिसमें विशेषज्ञों के बल पर नहीं बल्कि सामान्य जन के ज्ञान के बल पर सबकी अपनी-अपनी पहल के साथ भागीदारी हो. अंत में गोरखनाथ जी ने दर्शन अखाड़ा की ओर से सबके प्रति अपने आभार व्यक्त किये.

विद्या आश्रम      

Friday, May 31, 2019

गंगाजी ज्ञान दर्शन


दर्शन अखाड़ा पर ‘गंगा मैया गीत’ नाम से बुधवार, दिनांक 29 मई, 2019, शाम 5 बजे से  एक आयोजन हुआ. स्थानीय समाज की महिलाओं ने मिल बैठ कर गंगाजी के गीत गाये. आप कभी ऐसे गीतों पर एक समग्र दृष्टि डालें तो वे स्वयं ज्ञान गंगा प्रतीत होंगे और सामान्य महिलाओं के ज्ञान की गहराई से आपका परिचय होगा. बहुधा यह माना जाता है कि सामान्य महिलाएं जो अनपढ़ हैं या मामूली पढ़ी हैं, वें अज्ञानी हैं, कुछ नहीं जानती. क्योंकि आज ज्ञान का अर्थ ‘विकास’ के ज्ञान से ही लिया जाता है और अब तक यह साफ़ है ही कि विकास का ज्ञान ‘विनाश’ का ज्ञान होता है. ज्ञानी तो वही हैं जो समाज को एक ऐसे पथ पर आगे ले चलें जिस पर समाज के सभी लोगों की न्यायसंगत और विवेकपूर्ण सक्रियता व भूमिका बने.




हमारे समाज में संवेदना, भाईचारा, त्याग, विवेक, पर-पीड़ा की अनुभूति आदि को ज्ञान के अभिन्न अंग के रूप में देखा जाता रहा है. आज का ‘विकास’ का ज्ञान जिसे हम साइंस कहते हैं, इन सब नैतिक मूल्यों से अछूता है. यानि इन मूल्यों को वह सिद्धांततः ज्ञान का अन्तर्निहित गुण नहीं मानता. इसकी सोच व समझ न हमारे वैज्ञानिकों में है, न राजनेताओं में, न मीडिया में और न विश्वविद्यालयों में पढ़ने-पढ़ाने वाले लोगों में. नतीजा यह है कि इस ‘विकास’ की आंधी में लालच, आक्रामकता, नफ़रत, विलासिता को बड़ा स्थान मिलता जा रहा है. प्राकृतिक संसाधनों की बेतहाशा लूट और किसान-कारीगर समाजों को उजाड़ कर थोड़े से लोगों के लिए वैभव और विलास के महल खड़े करने में बड़ा अधर्म हो रहा है.

गंगा जी मात्र एक नदी नहीं, बल्कि ज्ञान गंगा हैं. धरती माँ की तरह ही वे लोकहित में अपनी सक्रियता को निर्धारित करती हैं और त्याग, ममत्व, सहजीवन, न्याय जैसे गुणों को ज्ञान के अभिन्न अंग के रूप में देखना सिखाती हैं. यह आयोजन गंगाजी की आवाज़ को सुनने, समझने, आत्मसात करने और फ़ैलाने का आग्रह रखता है. इन्हीं बातों पर वार्ता के दौरान श्रीमती शांतिदेवी और श्रीमती चैत्रा देवी के समूह ने गंगाजी के गीत प्रस्तुत किये. ढोलक पर मनोज ने संगत की. चंदा यादव, पारमिता, प्रभावती, प्रेमलताजी, चित्राजी ने गीत गाये जिसमें अन्य महिलाओं ने स्वर मिलाए. प्रेमलताजी ने गंगाजी पर लिखी अपनी कविता और कुछ अन्य कवियों की कवितायेँ भी सुनाई.
प्रेमलताजी ने कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए कहा कि गंगाजी के अतित्व पर संकट के बादल हैं. हम स्त्रियों को इसके बारे में सजग होना है क्योंकि गंगाजी के चलते हमारा भी जीवन, अस्तित्व और सम्मान है. हम सभी स्त्रियाँ माँ होने के नाते जन्म और लालन-पालन के कार्यों में आवश्यक ज्ञान को हासिल करती रही हैं और इस दौरान पर-पीड़ा की समझ, भाव, प्रेम, ममत्व, विवेक, त्याग, संयम, सहजीवन आदि बहुत से गुणों की परख करना सीखती हैं, उन्हें आत्मसात करती हैं. ये गुण हासिल करने की क्रिया ही ज्ञान-तपस्या है. अपने बच्चों में और समाज में इस ज्ञान और इन गुणों को विकसित करना यह हमारा धर्म है. आज इन गुणों को समाज में पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता है. इस कार्य को आगे बढ़ाने का काम स्त्रियों को अपने हाथ में लेना होगा.

कलाकार मनोज का सम्मान करते हुए 


 अंत में श्रीमती शांतिदेवी, श्रीमती चैत्रा देवी व मनोज का लोकविद्या साहित्य और एक गमछे की भेट देकर सम्मान किया गया.

विद्या आश्रम

Thursday, May 30, 2019

भारत की राजनीति में दर्शन की भूमिका - बैठक का जायजा


स्वदेशी दर्शन परम्पराएं और मूल्य आधारित राजनीति
28 मई 2019 को शाम 5 बजे

        28 मई 2019 को शाम 5 बजे दर्शन अखाड़ा, राजघाट, वाराणसी पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन हुआ. विषय था - भारत की राजनीति में दर्शन की भूमिका : स्वदेशी दर्शन परम्पराएं और मूल्य आधारित राजनीति. 
लोकसभा चुनाव नतीजों के सन्दर्भ में यह बैठक आनन-फानन में ही तय हुई थी और सूचना केवल एक दिन पहले ही दी जा सकी थी इसलिए कई लोग नहीं आ पाये. उपस्थित थे - अमरनाथ भाई, योगेन्द्र नारायण शर्मा, मो. आरिफ, मिथिलेश दुबे, रामजनम, फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, प्रेमलता सिंह, चित्रा सहस्रबुद्धे, लक्ष्मण प्रसाद, गोरखनाथ, अरुण कुमार और सुनील सहस्रबुद्धे. 
स्वदेशी दर्शन परम्पराओं से हमारा अभिप्राय गाँधी, कबीर, रविदास, तथा इन जैसे संतों के दर्शन से रहा. इस विचार गोष्ठी में भी राजनीति में दर्शन की भूमिका की बात करते हुए इन्हीं लोगों के दर्शन की ओर ध्यान खींचा गया. विश्वविद्यालयों में या तो इन्हें पढाया नहीं जाता है, या फिर हिंदी, इतिहास, राजनीति शास्त्र जैसे विभागों में पढाया जाता है, दर्शन विभाग में नहीं. इसके चलते और यूरोपीय विचारों के प्रभाव के चलते पढ़े-लिखे लोग इन्हें दार्शनिकों के रूप में सहजता से नहीं देख पाते. जो वैचारिक स्थापनाएं राजनीति में प्रासंगिक हो सकती हैं उन्हें अधिकांश 18 वीं औरे 19 वीं सदी के यूरोप से लिया जाता है और अपने दार्शनिकों के विचार समाज और व्यक्ति स्तर पर ग्राह्य तो माने जाते हैं लेकिन राजनीति में उनकी भूमिका नहीं देखी जाती. हम राजनीतिक सन्दर्भों में सत्य, प्रेम, अहिंसा, न्याय, भाईचारा जैसे विषयों पर कम ही बात करते हैं. अब सत्याग्रह की बात भी सामाजिक संघर्षों से बाहर हो चली है. इन्हीं स्थितियों पर गौर करने के लिए और आवश्यक सुधार की दृष्टि से एक बहस शुरू करने के इरादे से यह चर्चा रखी गई थी और वैसा ही हुआ. जो उभर कर आया वह यह था कि हमें राजनीतिक बहस और क्रियाओं के लिए नए प्रस्थान बिंदु चाहिए. ऐसे प्रस्थान बिंदु जो दर्शन को लोकमन और सामान्य जीवन के इतने नज़दीक देखें कि दार्शनिक व्याख्याओं और राजनैतिक चर्चाओं के बीच अंतर मिटने लगें. लोगों ने कहा कि यह बड़ा प्रश्न है और किसी एक बैठक में ऐसे प्रस्थान बिंदु खोज लिए जायेंगे, यह नहीं हो पायेगा. इसके लिए ऐसी बैठकों का सिलसिला चलना चाहिए और नए-नए लोगों को विमर्श में जोड़ा जाना चाहिए. 
अगले दिन फिर इसी विषय पर विद्या आश्रम में अमरनाथ भाई, मो. आरिफ, नूर फातमा, लक्ष्मण प्रसाद, चित्रा जी और सुनील की आपस में बातचीत हुई.








विद्या आश्रम