Friday, July 31, 2015

प्रेमचंद जयंती के अवसर पर चिंतन ढाबा पर वार्ता

विद्या आश्रम, सारनाथ से 5 - 6 किलो मीटर की दूरी पर हिंदी साहित्य के महान लेखक प्रेमचंद जी का गांव, लमही बसा हुआ है। 31 जुलाई को प्रेमचंद जयंती के अवसर पर वाराणसी के कला जगत के लोग लमही में जुटते हैं और 30 , 31 जुलाई व 1 अगस्त तक तीन दिनों के कला प्रदर्शन के साथ कलाकारों का जमावड़ा यहाँ लगता है। कई वर्षों से यह मेला लगता है और धीरे-धीरे बड़ा होता जा रहा है।

प्रेमचंद हिंदी साहित्य के महान लेखक और कला जगत की महत्वपूर्ण हस्ती हैं और उनका लेखन सामान्य जीवन की अद्भुत शक्ति  को उजागर करता है।  सामान्य लोगों के नैतिक बल, ज्ञान और संकल्पों को सशक्त अभिव्यक्ति देता है।  गाँवों और बस्तियों में  बसे  किसानों और कारीगरों , स्त्रियों और अनपढ़ लोगों के ज्ञान को परत दर परत खोलता है, उसकी गहराई, दूरगामी और विवेकपूर्ण दृष्टि को सामने  रखता है। लोकविद्या जन आंदोलन इन्हीं लोगों के ज्ञान की प्रतिष्ठा का आंदोलन है। 
प्रेमचंद ने बहुत पहले ही कहा है - "भारत की राष्ट्रीय जागृति का सबसे महत्वपूर्ण शुभ परिणाम वे बैंक और डाकखाने नहीं हैं जो पिछले कुछ सालों में स्थापित हुए हैं और होते जाते हैं , न वे विद्यालय हैं जो देश के हर भाग में खुलते जाते हैं बल्कि वह गौरव जो हमें अपने प्राचीन उद्योग धंधों और ज्ञान - विज्ञान व साहित्य पर 
होने लगा है और वह आदर का भाव जिससे हम अपने देश की कारीगरी व प्राचीन स्मारकों को देखने लगे हैं। " 

भारतीय  कला के जानकर इ.बी. हैवेल  के अनुसार " भले ही कारीगर विश्वविद्यालयों में न गए हों परन्तु वे अपने शिल्पशास्त्र, लोकसंस्कृति और जातीय महाकाव्यों से खूब अच्छी तरह परिचित होते हैं और वे औसत भारतीय ग्रेजुएट से अधिक ज्ञानी होते हैं। "

मुक्तिबोध की पंक्तियाँ शायद इसी सत्य को शब्द दे रही हैं - 
हरेक छाती में आत्मा अधीरा है 
प्रत्येक सुस्मित में विमला सदानीरा है 
प्रत्येक  वाणी में महाकाव्य पीड़ा है 
मुझे भ्रम होता है...   
प्रत्येक पत्थर में चमकता हीरा है 
मैं कुछ गहरे उतरना चाहता हूँ... 

लोक ज्ञान की गहराई में उतरने की तैयारी  में विद्या आश्रम के सामने बने चिंतन ढाबा पर प्रेमचंद जयंती मनाई गयी।  लोकविद्या सत्संग के साथ शुरू हुए इस आयोजन में प्रेमचंद की कहानी ' मोटर के छींटें ' ( http://www.hindisamay.com/contentDetail.aspx?id=230&pageno=5 )  का पाठ  हुआ और कहानी पर चर्चा हुई।  सभी ने चर्चा में हिस्सा लिया।

 कृष्ण कुमार क्रांति ने कहा कि अँगरेज़ साहब किस तरह यहाँ के लोगों को कीड़े-मकौड़े समझते रहे लेकिन यही लोग संगठित होकर उनके द्वारा ढाये जा रहे ज़ुल्मों का विरोध भी कर सकते हैं । आज की सत्ता भी किसान-कारीगरों को अंग्रेज़ों की तरह ही देखती है तो इसका भी संगठित विरोध ज़रूरी है।  लक्ष्मण प्रसाद ने कहा कि कहानी  छोटे में संगठित होकर अन्याय के खिलाफ खड़े होने का सन्देश देती है।  लोग अपने छोटे-छोटे लालच और स्वार्थ में डूबे हुए और तमाशबीन बने भले ही दिखाई देते हों लेकिन समय आने पर एकजुट होकर अन्याय के खिलाफ खड़े हो जाते हैं। शाम बिहारी का कहना था कि विरोध तो किया लेकिन पुलिस आने पर तो सब लोग भाग गए और पंडितजी भी भाग गए, भगोड़े साबित हो गये।  प्रेमलताजी ने कहा कि नहीं, इसे यूँ समझें कि शुरू में लोग संगठित नहीं थे , पंडितजी ने जब ललकारा तो लोगों को भी कुछ बात सही लगी और लोग संगठित होकर मोटर वालों का विरोध करने लगे।  लेकिन पुलिस आते ही जब वो गलियों में भागे तो इसका अर्थ  वे भगौडे हैं ऐसा नहीं है बल्कि ये है कि वे इतने संगठित नहीं थे कि राज्यसत्ता की संगठित ताकत से मोर्चा ले लेते। ऐसे में कोई जान थोडे ही देनी है। गलियों में भागने का प्रतीक यह है कि राज्यसत्ता जैसी शक्तिशाली संस्था से न्याय हासिल करने की लड़ाई के लिए अधिक संगठित ताकत की तैयारी की ज़रूरत है और उसे बनाने के लिए एक कदम पीछे हटने की बात है। दिलीप ने लोकविद्या गायकी के साथ लोकविद्या समाज की एकता की शक्ति को उजागर किया और आवाहन किया कि लोकविद्या समाज अपने ज्ञान का दावा ठोंके और अपने को सरकारी कर्मचारी के बराबर की आमदनी का हक़दार घोषित करें।  




 

विद्या आश्रम 

Sunday, July 26, 2015

Kisan - Karigar Panchayat at Vidya Ashram Sarnath, 1st August 2015

A kisan-karigar panchayat is called on the Foundation Day of Vidya Ashram on 1st August 2015 at the premises of the Ashram in Sarnath , Varanasi. The invitation circulated here is given below.

निमंत्रण 
विद्या आश्रम के स्थापना दिवस पर किसान-कारीगर पंचायत 
विषय : हर किसान व कारीगर की आय पक्की और नियमित हो और सरकारी कर्मचारी के बराबर हो।  
दिन : शनिवार, 1 अगस्त 2015
समय : दिन में 12 बजे से
स्थान : विद्या आश्रम, सारनाथ, वाराणसी

साथियों ,
गाँव, किसान और कारीगर के ज्ञान पर केंद्रित समाज का निर्माण हो इस उद्द्येश्य को लेकर विद्या आश्रम की स्थापना 1 अगस्त 2004 को  की गई थी। देश की  सरकारों ने साइंस , अंग्रेजी , बड़े उद्दोग , कम्प्यूटर व मैनेजमेंट केंद्रित समाज को बनाने में गाँव , किसान और कारीगर समाजों को इस व्यवस्था से बाहर कर दिया है।  इन सबको अज्ञानी करार दिया है। क्या  पक्की आमदनी के हक़दार  केवल डिग्रीधारी ही माने जायेंगे ? क्या केवल डिग्रीधारी ही ज्ञानी हैं ? क्या किसान और कारीगर ज्ञानी नहीं हैं ?

शनिवार 1 अगस्त 2015 को दिन में 12 बजे से विद्या आश्रम के स्थापना दिवस पर इन सवालों पर विचार होगा और ऊपर लिखे विषय पर किसानों और कारीगरों की पंचायत होगी जिसमें किसान-कारीगर समाज के हितचिंतक और मित्र भी शामिल होंगे।

आप सादर आमंत्रित हैं।

आयोजक
विद्या आश्रम (प्रेमलता सिंह 9369124998 )
लोकविद्या जन आंदोलन (दिलीप कुमार 'दिली' , 9452824380 )
भारतीय किसान यूनियन , वाराणसी (लक्ष्मण प्रसाद मौर्य , अध्यक्ष , 9026219913 )
कारीगर नजरिया , (एहसान अली , 8303244310 )

निवेदक 
कृष्णा कुमार क्रांति (भाकियू वाराणसी नगर अध्यक्ष ), शाम बिहारी , दीनानाथ , शिव प्रसन्न कुशवाहा , प्रभावती देवी , मो. अलीम , फ़िरोज़ खान , बबलू कुमार , कमलेश, नन्दलाल , दूधनाथ , संतलाल , विजय कुमार विश्वकर्मा , चित्रा  सहस्रबुद्धे , सुनील सहस्रबुद्धे 

Monday, June 1, 2015

भूमि अधिग्रहण का भूत

केंद्र सरकार अब भूमि अधिग्रहण पर एक तीसरे अध्यादेश की बात कर रही है।  सारी कवायद एक ऐसा कानून बनाने की है जो अभी तक की तुलना में और बहुत बड़े पैमाने पर किसानों से ज़मीनें छीनना वैध बना दे।  किसानों के हर तरह के संगठन इस कवायद के खिलाफ हैं। जैसे भारतीय किसान यूनियन का कहना है कि ज़मीनों के लिए यह अलग से कानून किसलिए ? किसान ज़मीन बेचना चाहेगा तो बेचेगा और उसका दाम लगाएगा और खरीदने वाले को मंज़ूर होगा तो खरीदेगा। 1894 में अंग्रेज़ों ने भूमि अधिग्रहण का एक कानून बनाकर किसानों की ज़मीनें छीनने का एक ज़बरदस्त औजार तैयार किया, जो आज़ादी के बाद की हर सरकार को भी बहुत पसंद आया।  लोकविद्या का दृष्टिकोण कहता है कि भूमि अधिग्रहण की बात ही नाज़ायज़ है।  इस पर कोई कानून होना ही नहीं चाहिए।  लेकिन यह बात बहस में नहीं है।  कारण बहुत बड़े हैं लेकिन अब उनका समय पूरा हो रहा है।

यूरोप में औद्योगिक क्रांति के बाद कुछ दशकों में यह विचार पक्का होता चला गया कि भविष्य का समाज एक औद्योगिक समाज होना है और यह कि उस समाज में किसान किसी वर्ग या समुदाय के रूप में नहीं होंगे। यही बुर्जुआ विचार है और यही मार्क्सवादी विचार है। इस विचार का दबदबा वहां से शुरू हो कर पूरे विश्व में यूरोपीय साम्राज्यवाद के साथ तथा कम्युनिस्ट क्रांतियों के साथ फैलता चला गया और आज भी कायम है। पूरा पढ़ा-लिखा वर्ग भावी समाज में किसान की कोई सक्रिय और रचनात्मक भूमिका नहीं देखता।  सभी जानते हैं कि महात्मा गांधी का विचार एकदम अलग था।  वे एक न्यायसंगत और शोषण मुक्त समाज की कल्पना में किसान और गांव को धुरी के रूप में देखते थे। आज के सामाजिक विचारों के दो सबसे बड़े खेमे यही हैं।  एक में आधुनिक उद्योग को धुरी के रूप में देखा जाता है और दूसरे में किसान और गांव की प्राथमिकताएं जायज़ मानी जाती हैं।

हमारी शिकायत संगठनकर्ताओं और आंदोलनकर्ताओं से है कि वे किसान, गांव और खेती के बचाव की बातों में फंस जाते हैं और औद्योगिक दुनिया की कसौटियों और पैमानों के अंतर्गत ही इस बचाव को अंजाम देना चाहते हैं।  वे किसान या गांव को परिवर्तन और पुनर्निर्माण में धुरी के रूप में नहीं देख पा रहे हैं। इसीलिए अधिग्रहण के विचार को चुनौती न देकर, वे कानून क्या हो इसकी बहस में फंसे रहते हैं , मुआवज़ा, पुनर्वसन, सहमति , सिंचित भूमि जैसी बातों में फंसे रहते हैं।  हम जानते हैं कि सरकार भूमि अधिग्रहण के समय अपने खुद के बनाये कानूनों का पालन बिलकुल नहीं करती है, मध्य प्रदेश, उड़ीसा , आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश , वास्तव में सभी जगह यही हो रहा है।  तो बहस किस बात की है ? बहस लायक अगर कोई बात है तो यह कि अधिग्रहण का विचार गलत है। अधिग्रहण को सरकार की नीतियों में कोई स्थान नहीं होना चाहिए।  बहस लायक अगर कुछ है तो वह यह कि देश के भविष्य में, लोगों की खुशहाली में महात्मा गांधी के विचारों की कोई जगह होनी है या नहीं।

किसान और गांव की प्राथमिकता का अर्थ है किसान के पास, गांव में जो विद्या है, ज्ञान , हुनर , दक्षताएं , कौशल और दर्शन है, समाज और प्रकृति का दर्शन है , जायज़ और नाजायज़ की जो अवधारणाएं हैं , संगठन और परिवर्तन के जो विचार हैं, इस सब को मान्यता देना और आधुनिक शिक्षा से अधिक और ऊँचा स्थान नहीं, तो कम से कम उसके बराबर का स्थान देना। गांधी के विचारों को आज की दुनिया में बहस में कैसे लाना यह सामाजिक कार्यकर्त्ता के सामने की सबसे बड़ी चुनौती है।  हमारा अनुभव और हमारा सुझाव यह है कि कार्यकर्ता अपने संगठन और संघर्ष के कार्यों में ज्ञान की भाषा का इस्तेमाल करें - उदाहरण के लिए यह न कहें कि ज़मीन ले ली गयी तो किसान क्या करेगा, उसे और कोई काम नहीं आता, बल्कि यह कहें कि किसान खेती का ज्ञानी है इसलिए उसकी ज़मीन नहीं ली जानी चाहिए।  रोज़गार की सरकारी नीति की बुनियाद इसी में होनी चाहिए कि जिसके पास जो ज्ञान है और जो काम वह पहले से कर रहा है उसके बल पर उसकी जीवन निर्वाह की आमदनी पक्की होनी चाहिए और इसमें ज्ञान - ज्ञान में फर्क नहीं किया जाना चाहिए।  आधुनिक शिक्षा और किसान के ज्ञान में ऊँच - नीच का हिसाब बनाना गलत और अन्यायकारी है, यह बंद होना चाहिए।  

विद्या आश्रम

Sunday, May 17, 2015

महात्मा टिकैत अमर हैं

15 मई को चौ. महेंद्र सिंह टिकैत की पुण्यतिथि रही।  भारतीय किसान यूनियन की वाराणसी जिला इकाई ने इस मौके पर दीनापुर के संघर्ष स्थल पर एकत्र होकर अपने नेता को श्रद्धांजलि दी और इस पर चर्चा की कि किस तरह वाराणसी के इर्द गिर्द हो रहे किसान संघर्षों में एकजुटता पैदा की जाये । दीनापुर में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के लिए ली गयी ज़मीन का मुआवज़ा 1986  से अभी तक नहीं दिया गया है और अभी भी उच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद नहीं दिया जा रहा है।  इसी मुआवज़े के लिए वहां के करीब 50 किसान प्लांट के दरवाज़े बंद करके अब 15 दिन से धरने पर बैठे हैं।  इसी धरना स्थल पर इन्हें समर्थन देते हुए किसान यूनियन ने टिकैत जी की स्मृति में विचारों का आदान प्रदान किया।  नीचे इसके दो फोटो हैं।  


सभा में बोलते सुनील सहस्रबुद्धे, जिन्होंने कहा कि टिकैत साहब यह सिखा गये हैं कि किसानों को अपने संगठन और संघर्षों का नेतृत्व खुद करना है और यह कि इसके लिए आवश्यक समझ और सूझबूझ किसानों से अधिक किसी के पास नहीं है।  


सभा में बोलते हुये दिलीप कुमार 'दिली', जिन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि किसान के ज्ञान को जब तक वह मुआवज़ा नहीं मिलता जो विश्वविद्यालय के ज्ञान को मिलता है तब तक सभी संघर्ष अधूरे हैं।  

भारतीय किसान यूनियन के वाराणसी ज़िले के अध्यक्ष  आचार्य लक्ष्मण प्रसाद और नगर अध्यक्ष कृष्ण कुमार 'क्रांति' ने वार्ता जारी रख कर यह बताया की किस तरह वाराणसी नगर का विकास मंत्र वाराणसी के किसानों के लिए विनाश मन्त्र बनकर आया है और यह कि किसान यूनियन किसानों के हितों की रक्षा में शहर और गाँव के बीच संतुलित रिश्ते की बहस को खोल रहा है और उसके लिए किसानों को एकजुट कर रहा है।  इस धरना सभा का संचालन राममूरत मास्टर साहब ने किया। 

विद्या आश्रम 







Friday, May 15, 2015

Nigri Chalo 18-19 May 2015

Singrauli is the land of exceedingly high pollution and environmental destruction which includes clearing of forests, sweeping land grab and damming of rivers. High handed administration deals with adivasis and peasants with brute force. There have been innumerable struggles for Jal-Jangal-Zameen since the early 1980s. Corporate industry has appeared there with a new aggression in the last decade.

Lokavidya Group at Singrauli is engaged with others in putting together activists in the Vindhya Region to form a general support group for the Jal-Jangal-Zameen struggles in that region. This group called Vindhya Janandolan Samarthak Samooh (VJSS) has had several meetings in last few months, activists coming from the districts of Singrauli, Seedhi, Reeva , Satna, Umariya, Shahadol and Anooppur. VJSS has given a call to gather at Nigri on 18th and 19th May.
The program is -

  • Khet Bachao-Gaon Bachao Mahapanchayat - 18th May, 10 am, Higher Secondary School Field 
  • Bandh Hatao - Nadi Bachao - Atikraman Girao Dharna - 19th May, 10 am, The place of dam on the river Gopad.  
Gopad river divides Singrauli and Seedhi. Flowing northwards it joins the river Son. By the side of the river JP Associates has captured a very large plot of land on both sides of the road and is engaged in building a thermal power station and a metals/minerals factory. It has built a dam on Gopad to serve its industries and the entire administration of Seedhi and Singrauli admits not being aware of this dam at all. People of the region are being mobilized for this program to challenge the entirely illegal encroachment by JP on the river Gopad. The river flows through a protected forest and time and again the fishermen are hauled up by the district administration on charges of illegal fishing, who do it only to augment their dwindling livelihoods. 

For more information you may contact 
Umesh Tiwari of Toko-Roko-Thoko Krantikari Morcha, Convener VJSS,  09630650750
Ravi Shekhar of Kisan Adivasi Visthapit Manch, Secretary VJSS, 08225935420

Ekta