Thursday, February 6, 2020

Invitation: State of the Nation Dialogue - Whither India?


INVITATION
State of the Nation Dialogue : Whither India?
29 Feb-1 March 2020
Vidya Ashram, Sarnath, Varanasi

  
Friends,

Vidya Ashram proposes to organize a dialogue on The Present State of the Nation and its Future on 29th Feb - 1st March 2020 at Varanasi. You are invited to this dialogue. Please come and contribute with your ideas and experiences. You may come with persons of your choice. Please find time and resources to come. The Ashram will arrange for everybody's food and stay. We shall sit at the Sarnath premises of Vidya Ashram in Varanasi. The dialogue will start at 11 in the morning on 29th.  

The struggles against CAA, NRC and NPR have grown beyond all expectations and nobody knows what is in store in the coming days. Much more is bound to happen before we meet for this dialogue. The nation is at cross-roads, projected as being caught in the struggle between the forces of secularism and Hindutva, also being seen through the binaries of left-right, liberal-fascist, democratic-autocratic etc. This is a trap, since these two sides largely have similar views on knowledge, development and economics, making it difficult to address larger and deeper issues, which are at the base of present struggles. The struggles on the university campuses and also in the open spaces have brought fresh claims of ownership of the nation to the fore. This ought to be expected to bring into the idea of nation new thoughts and in building of the nation new strategies. This is a radically new situation.

The persistent, courageous and unprecedented Dharna’s in public places by Muslim women and widespread opposition by students, artists and social activists, seen in a single frame, appear to be writing a preface to not just a new idea of the nation but demanding civilizational take on a new politics of change.

The proposed dialogue is expected to break free of existing binaries. People - ordinary people, with their knowledge and world - need to occupy a place of importance in any debate that seeks to have answers or at least lay bare the fundamental issues. Knowledge Politics and Ontological Politics are the names being given to such efforts.

Vidya Ashram, Sarnath, Varanasi
Vidyaashram.org

Wednesday, February 5, 2020

संत रविदास जयंती के अवसर पर ज्ञान-वार्ता


9 फरवरी को रविदास जयंती है। रविदास जी के जन्म स्थान बनारस में इस दिन बहुत बड़े-बड़े उत्सव होते हैं। इस महान संत की स्मृति में उनके दर्शन पर चर्चा के लिए दर्शन अखाड़े पर 4 फरवरी को लगभग 30 व्यक्ति एकत्र हुये. संत रविदास जी के निम्नलिखित पद को चर्चा में रखा गया था. ज़ाहिर है चर्चा उसी तक सीमित नहीं रही.  

नामहि पूजा कहाँ चढ़ाऊँ, फल अरु फूल अनुपम न पाऊँ l
दूधत बछरयो थनहु जुठारयो, पुहुप भँवर, जल मीन बिगारयो ll
मलयागिरि बांधियो भुजंगा, विष अमृत बसइ इक संगा l
मनहि पूजा, मनहि धूप, मनहि से सेऊँ सहज सरूप ll
तोडूं न पाती, पूजूं न देवा, सहज समाधि करूं हरी सेवा l
पूजा अरचा न जानूं तोरी, कह ‘रैदास’ कौन गति मोरी ll


वार्ता की शुरुआत राजकुमार के नेतृत्व में सरायमोहना गाँव की रविदास गायक मण्डली के सुन्दर भजनों से हुई. गुरु रविदास जन्मस्थान मंदिर, सीरगोबर्धनपुर, वाराणसी के आचार्य भारत भूषण दास ने संत रविदास का आध्यात्मिक दर्शन को विस्तार से रखा. मध्ययुगीन भारत के इतिहासकार डॉ. मोहम्मद आरिफ ने वर्तमान राजनीतिक एवं सामाजिक विषमता के सन्दर्भ में संत रविदास के दर्शन के महत्व को अनेक उद्धरण और पदों का ज़िक्र करते हुए सामने लाया. ज्ञान की दुनिया में विश्वविद्यालय के दब-दबे को चुनौती देने में रविदास दर्शन का महत्व विद्या आश्रम की समन्वयक डॉ. चित्रा सहस्रबुद्धे ने अपने वक्तव्य में सामने रखा। सभा के सह अध्यक्ष सतीश कुमार उर्फ़ फगुनीराम-व्यवस्थापक संत रविदास मंदिर, राजघाट, ने वार्ता के लिए दिए गये पद में उजागर भाव को रस्मों का विरोध और ईश्वर से सीधे संबंध के रूप में व्याख्या की.  
सुनील सहस्रबुद्धे ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि भारत की दार्शनिक परंपरा में संतों का बहुत बड़ा योगदान रहा है लेकिन चूंकि विश्वविद्यालय इसका अवमूल्यन करते हैं इसलिये दर्शन अखाड़े ने इसके न्यायोचित स्थान के लिए अभियान चलाया है.
समय अभाव के कारण गोष्ठी में आये व्यक्तियों में प्रेमलता सिंह, नूर फातमा, शीलम झा, प्रवाल सिंह, महेंद्र प्रसाद, राजकुमार, लक्ष्मण प्रसाद जैसे कई ज्ञानी व्यक्तियों को बोलने का समय नहीं मिल पाया.
गोष्ठी के अंत में आमंत्रित वक्ताओं और गायक मंडली के सदस्यों को एक गमछा व साहित्य देकर सम्मानित किया गया. गोष्ठी के स्थान पर ही तिलमापुर के पंकज कुमार मौर्य ने वहां संत साहित्य की कुछ पुस्तकों को प्रदर्शन के लिए रखा.   
आरती ने सभी का स्वागत किया और दर्शन अखाड़े के व्यवस्थापक गोरखनाथ ने सबके प्रति आभार व्यक्त करते हुये गोष्ठी का समापन किया और सभी ने जलपान किया.   




विद्या आश्रम 


Wednesday, January 29, 2020

खुल जा सिम सिम


जब से नागरिकता संशोधन कानून (CAA) , राष्ट्रीय नागरिकता पंजिका (NRC) और राष्ट्रीय आबादी पंजिका (NPR) बनाने का फैसला केन्द्रीय सरकार ने लिया है तब से देश की जनता में उबाल सा आ गया है. कहा जा रहा है कि देश के संविधान पर डाका पड़ गया है. इस संशोधन और उससे जुड़कर आई इन पंजिकाओं के खिलाफ जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. इस कानून के समर्थन में भी कुछ प्रदर्शन हुये हैं. समर्थन तथा विरोध के प्रदर्शनों में दोनों ओर तिरंगा लहराया जा रहा है, बावजूद एक नया दौर शुरू हो गया लगता है, जिसमें पार्टी और विचारधाराओं के दायरे तोड़ देने का आवाहन जनता स्वीकार करती नज़र आती है. अगर वाकई ऐसा है तो हम मानते हैं कि यह शुभ संकेत है. आर्थिक महासंकट के इस दौर में देश, राष्ट्र, राष्ट्रवाद व संविधान जैसे विषय सामान्य लोगों में सैद्धांतिक चर्चा के विषय बन गये हैं. नतीजे स्वरूप मनुष्य और समाज-संगठन के नैतिक विचार अब प्रकट होना लाजिमी है.
हम सभी यह देख रहे हैं कि केन्द्रीय सरकार के निर्णयों के खिलाफ देश भर में जो ये बड़े-बड़े विरोध हो रहे हैं उनका नेतृत्व न किसी राजनैतिक नेता, पार्टी या धार्मिक संगठन के हाथ है और न किन्हीं स्थापित विचारधाराओं के दायरे में. छात्र-छात्राओं, महिलाओं (विशेषकर मुसलमान महिलाओं), कलाकारों  और सामाजिक कार्यकर्ताओं की स्वयंस्फूर्त भागीदारी का प्रमाण बने ये शांति पूर्ण विरोध प्रदर्शन एक नये दौर का आगाज़ कर रहे हैं.
इस विरोध में महिलाओं ने जिस हिम्मत, अडिगता, लगन, निर्भीकता और स्पष्टता से इस कानून का विरोध किया है वह निश्चित ही इस देश की जनता के नैतिक बल को एक नई ऊंचाई पर ले आया है. छात्र-छात्राओं ने कालेज में पढ़ी हुई बातों को और अपने विचारों को बाहर आकर समाज के सरोकार से जोड़ा. विशेष बात यह कि कलाकारों ने अपनी रचनाओं से इस आन्दोलन को पिछले दो सौ साल की यूरोपीय वैचारिक कैद से मुक्त कर देशज विचारों के आधार पर ऊर्जा का स्रोत बना दिया. फैज़ की ग़ज़ल ‘हम देखेंगे..’ ने नव-सृजन की ज़मीन मुहैया करा दी. वरुण ग्रोवर की ‘हम कागज़ नहीं दिखायेंगे’ या पुनीत शर्मा की ‘इस मिट्टी से मेरा सीधा रिश्ता है, तू कौन है बे !’ में कबीर और गाँधी की परम्परा में अन्यायी राज्यसत्ता से असहयोग और ललकार की मिलीजुली गूँज के साथ दिशा बोध भी है.
लेकिन इससे आगे का रास्ता बनाने के लिये जिस उर्जा की ज़रूरत है वह उस समाज में बसी है, जो वाकई में कागज़ से कभी भी बंधा नहीं रहा है या यूं कहें कि कागज़ से बंधने से इनकार करता रहा है, जबकि राज्यसत्ता इसे तरह-तरह से कागज़ से बांधना चाहती रहीं हैं. यही वह लोकविद्या-समाज है जो अपने ज्ञान से आलोकित है और जिसमें इस देश की बहुसंख्य जनता है. हम सब जानते हैं कि ये लोग हर धर्म, जाति और हुनर के हैं. यह समाज इस भूमि की गौरवशाली परम्परा का निर्माता है. इसमें किसान, कारीगर, आदिवासी, छोटे-छोटे दुकानदार, महिलायें और तमाम तरह के सेवा-मरम्मत कार्य से जुड़े परिवार हैं. इसी समाज के लिए गांधीजी ने कहा था कि “इस देश की जनता पर कोई राज नहीं कर सकता...” अन्यायी राज्यसत्तायें शोषण करने के लिये अपने कदमों को हमेशा ही कानून का जामा पहनाती हैं और औपचारिक घेरेबंदियाँ बढ़ाती जाती हैं. ऐसी सत्ताओं का मुकाबला ‘कागज़ नहीं दिखायेंगे’ से किया जा सकता है. इसमें भविष्य की बड़ी संभावनायें हैं.
‘हम मांगें आज़ादी’ के नारे को ज़मीनी अर्थ देने की क्षमता भी लोकविद्या-समाज के पास है. कागज़ के बल पर लादी गई तमाम तरह की गुलामी से मुक्ति का विचार इस समाज के ज्ञान और जीवन में है. एक नई नैतिक, सैद्धांतिक और राजनैतिक दिशा का बोध इस समाज के साथ जीवंत वार्ताओं में सामने आ सकता है. इसे ‘बौद्धिक सत्याग्रह’ का नाम दिया जा सकता है. गांधीजी ने हमें पहले ही इस संसदीय लोकतंत्र के पाखण्ड से आगाह कर दिया था. उन्होंने इस बात को बहुत गहराई से समझ लिया था कि हमारे किसान-कारीगर-आदिवासी समाजों में स्वायत्त सत्ताओं को बनाने और उन्हें बनाये रखने का आग्रह है. विभिन्न कार्यक्षेत्रों में बिखरी ये स्वायत्त सत्तायें ही उनकी आज़ादी को साकार करने की क्षमता रखती हैं. ये स्वायत्त सत्तायें ही उन्हें अन्याय का मुकाबला करने के नये-नये तरीकें उपलब्ध कराती हैं. इनमें नैतिक विचारों की वरीयता होती हैं. यह उस दुनिया का आगाज़ होगा जहाँ समाज का निर्धारण बाहरी दबावों से मुक्त होगा. हिंसा तथा बल के इस्तेमाल के लिये कोई स्थान नहीं होगा.

विद्या आश्रम