Friday, September 21, 2018

स्वराज ज्ञान पंचायत की तैयारी बैठक 9 सितम्बर 2018


किसान ज्ञान पंचायत और स्वराज ज्ञान पंचायत तैयारी बैठक

विद्या आश्रम, सारनाथ में सुबह 11 बजे से किसान ज्ञान पंचायत हुई जिसमें वाराणसी और वाराणसी के आस-पास से आये किसान संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने ‘गाँव के हर परिवार को सरकारी कर्मचारी के बराबर, पक्की व नियमित आय हो’ इस मुद्दे का समर्थन करते हुए अपने विचार रखे l सभी ने इस बात पर जोर दिया कि एक ऐसे कानून की ज़रूरत है जो ऐसी नीति पर अमल करने के लिए सरकारों को बाध्य करे l इसके बाद विभिन्न संगठनों के ज़िम्मेदार लोगों ने बैठकर यह तय किया कि 24 अक्तूबर 2018 को देश की आय नीति पर विद्या आश्रम में एक सम्मलेन किया जाये l  तय हुआ कि इस सम्मलेन को स्वराज ज्ञान पंचायत का नाम दिया जाये और देश के हर परिवार में सरकारी कर्मचारी के बराबर, पक्की और नियमित आय हो इस विषय के विभिन्न पक्षों पर इस पंचायत में  बात हो. चार प्रमुख पक्ष तय किये गए  ---  दर्शन, नीति, व्यवस्था और कानून l प्रस्ताव यह रहा कि हर विषय पर एक या दो प्रमुख वक्तव्य हों और उन पर बातचीत के लिए समय रखा जाये l  इस सम्मलेन की बात पहले से कई संगठनों के साथ चल रही थी l स्वराज विद्यापीठ इलाहाबाद से बातें हुई थीं , उनके लोग आज के समागम में शिरकत करने आने वाले थे लेकिन किन्हीं अपरिहार्य कारणों से नहीं आ सके l आयोजन समिति में शामिल होने की उनकी सहमति प्राप्त है l
पंचायत में बोलते हुए इंकलाबी कामगार यूनियन के अरविन्द मूर्ती 

स्वराज ज्ञान पंचायत के लिए एक आयोजन समिति बनाई गई, जिसके सदस्य हैं--- लक्ष्मण प्रसाद, लोकविद्या जन आन्दोलन वाराणसी,  अरविन्द मूर्ति, इन्कलाबी कामगार यूनियन मऊ,  राघवेन्द्र कुमार, कृषि भूमि बचाओ अभियान, बलिया, जितेन्द्र तिवारी, भारतीय किसान यूनियन चंदौली,  ऊषा शरण (सासाराम), शोषित समाज दल बिहार, योगिराज पटेल , पूर्वांचल किसान यूनियन वाराणसी , स्वप्निल श्रीवास्तव या मनोज त्यागी स्वराज विद्यापीठ, इलाहाबाद l यह आयोजन समिति सदस्यों के स्थानों पर तैयारी बैठकें करेंगी और जल्दी ही स्वराज ज्ञान पंचायत की रूपरेखा बनाएगी l

पूर्वांचल किसान किसान यूनियन के योगिराज पटेल अपनी बात रखते हुए 
सुबह के सत्र में हुई किसान ज्ञान पंचायत का विषय था --' गाँव के हर घर में सरकारी कर्मचारी के बराबर, पक्की और नियमित आय होनी चाहिए' l लोकविद्या आन्दोलन इस विषय पर लम्बे समय से  वार्ताएं आयोजित कर रहा है l इस विचार से कमोबेश सहमत अलग-अलग संगठनों के लोगों को अपने विचार पंचायत में रखने के लिए बुलाया गया था l  जिन्हें प्रमुख वक्ताओं के रूप में बुलाया गया वे हैं -- इंकलाबी कामगार यूनियन मऊ से अरविन्द मूर्ती व ब्रिकेश यादव,  भारतीय किसान यूनियन वाराणसी मण्डल के अध्यक्ष , चंदौली से जितेन्द्र तिवारी, कारीगर नज़रिया, वाराणसी की ओर से फज़लुर्रहमान अंसारी (आलम भाई), कृषि भूमि बचाओ अभियान, बलिया से राघवेन्द्र कुमार, पूर्वांचल किसान यूनियन के वाराणसी से योगिराज पटेल, शोषित समाज दल की बिहार प्रमुख, सासाराम से श्रीमती ऊषा शरण और लोकविद्या जन आन्दोलन विद्या आश्रम वाराणसी से श्रीमती प्रेमलता सिंह , जन आन्दोलनों के राष्ट्रीय समन्वय, वाराणसी से सतीश सिंह l

कृषि भूमि बचाओ अभियान के राघवेन्द्र कुमार 

पंचायत के अधिकांश वक्ताओं ने आज की परिस्थितियों की सामाजिक राजनीतिक व्याख्याएं की और इस बात पर बल दिया कि आय का सवाल इस तरह सीधे सीधे उठाना ज़रूरी है l अभी चाहे यह दूर की बात लगती हो लेकिन बहुत संभव है कि जल्दी ही सार्वजनिक राजनैतिक बहस का एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन जाये l इस बात पर भी जोर आया कि किसान को एक ज्ञान समुदाय के रूप में देखा जाना चाहिए और उस ज्ञान को विश्वविद्यालय के ज्ञान के बराबर दर्जा मिलना चाहिए l सभी किस्म के ज्ञान की बराबरी में सामाजिक असमानता, जातिवाद, आर्थिक असमानता, गैर-बराबरी और गरीबी दोनों पर ही बड़ा प्रहार करने की क्षमता है l ज्ञान की बराबरी का दावा और हर घर के लिए सरकारी कर्मचारी जैसी आय की व्यवस्था की मांग एक ऐसी ज्ञान की राजनीति को जन्म दे सकती हैं जिसमें परिवर्तन के कार्यकर्ताओं के सपनों को साकार करने की क्षमता हो l यह बात प्रमुखरूप से उभर कर आई कि आय के सवाल पर बराबरी के दृष्टिकोण को समाहित करते हुए एक ऐसा कानून बनना चाहिए जो सभी को देश के वेतन आयोग द्वारा समय-समय पर निर्धारित आय का अधिकार दे और इसे सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी सरकार पर रहे l पंचायत का समापन विद्या आश्रम के सुनील सहस्रबुद्धे ने किया और सञ्चालन भारतीय किसान यूनियन के वाराणसी जिला अध्यक्ष तथा विद्या आश्रम के लक्ष्मण प्रसाद ने l
भारतीय किसान यूनियन वाराणसी मण्डल अध्यक्ष जितेन्द्र तिवारी बोलते हुए 

इस किसान ज्ञान पंचायत में वनवासी समाज के वाराणसी के सुरेश फिर से अपनी बस्ती के उजाड़े जाने के बारे में बताने आये थे l कई जगह से उजाड़े जाने के बाद करीब 25 परिवार सारनाथ स्टेशन जाने वाले रास्ते के दोनों तरफ टूटी-फूटी झोपड़ियों में रहते हैं l दो दिन पहले ए.डी.एम. उनकी बस्ती पर आये और धमकी दिए कि तुरंत यहाँ से भाग लें नहीं तो जेसीबी से उखाडकर फेंकवा देंगे l  स्थानीय समाज के कार्यकर्त्ता इस प्रयास में लगे हैं कि प्रशासन उन्हें बसने के लिए किसी और जगह की अनुमति दे दें l


शोषित समाज दल प्रांतीय अध्यक्ष, बिहार  ऊषा शरण बोलते हुए 

कारीगर नजरिया वाराणसी के फ़ज़लुर्रहमान अंसारी पंचायत को संबोधित करते हुए 




पंचायत का  सञ्चालन करते हुए विद्या आश्रम के लक्ष्मण प्रसाद 

विद्या आश्रम 


Thursday, August 2, 2018

विद्या आश्रम स्थापना दिवस


हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी 1 अगस्त 2018 को विद्या आश्रम का स्थापना दिवस मनाया गया. स्थापना दिवस के अवसर पर एक कारीगर ज्ञान-पंचायत का आयोजन हुआ. ज्ञान-पंचायत में विषय था ‘केवल श्रम का नहीं ज्ञान का भी मूल्य चाहिए’. यह अलग से रोज़गार की मांग का सवाल नहीं है, कहा यह जा रहा है कि तमाम कारीगर जो काम कर रहे हैं उस काम को केवल मज़दूरी नहीं बल्कि ज्ञानपूर्ण काम माना जाये और मेहनत के साथ उनके ज्ञान का भी मूल्य दिया जाये, ठीक वैसे ही जैसे किसी विश्वविद्यालय से पढ़े व्यक्ति को दिया जाता है. बहुत जायज़ बात कही जा रही है और बेहद सरल शब्दों में इसके पक्ष में तर्क भी रखे जा सकते है. इस बात को अगर समाज और देश का नेतृत्व नहीं सोच पा रहा है, तो हम समझते हैं कि या तो वे इसे नही करना चाहते अथवा वे सोच ही नहीं पाते हैं कि सभी का ज्ञान और आय एक सी प्रतिष्ठा के अधिकारी होते हैं.
इस ज्ञान-पंचायत में अधिकांश सामाजिक कार्यकर्त्ता और कारीगर समाज के लोग थे. वाराणसी के तीन सामाजिक कार्यकर्ता मुख्य वक्ता के रूप में बुलाये गए थे – चौधरी राजेन्द्र, डा. अनूप श्रमिक और फ़ज़लुर्रहमान अंसारी (आलम भाई).
पंचायत में बोलते हुए फजलुर्रहमान अंसारी (आलम भाई)

                                                  डा. अनूप श्रमिक अपनी बात रखते हुए 

चौधरी राजेंद्र  बोलते हुए  

सुरेश जी, वनवासी बस्ती, सारनाथ से 

ज्ञान-पंचायत की शुरुआत लोकविद्या गायकी के साथ हुई. सर्वेंदु व उनके साथी, लालबाबू, मु. अलीम हाशमी, फ़िरोज़ खान, कमलेश भारद्वाज, लक्ष्मण प्रसाद और बबलू ने गायकी की अगुवाई की.  
विद्या आश्रम की समन्वयक चित्रा सहस्रबुद्धे ने थोड़े में यह बताया कि 2004 में आश्रम की स्थापना में तरह-तरह के वैचारिक रुझान के लोग रहे और कारीगर-समाज के अलग-अलग हुनर के लोग सक्रिय सहयोगी रहे. आश्रम के विचार में ज्ञान का सवाल शुरू से रहा है. आश्रम से समाज में यह दावा खड़ा करने के लिए तरह-तरह के कार्य किये गए कि सामान्य लोगों के पास भी ज्ञान (लोकविद्या) होता है जो किसी भी अर्थ में विश्वविद्यालय के ज्ञान से कम दर्जे का नहीं होता. इसके अलावा ज्ञान-पंचायत की प्रक्रिया सबके सामने रखी गई जिसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सभी उपस्थित लोगों के ज्ञान को बराबर का दर्जा दिया जाता है.

आलम भाई ने कहा कि कारीगर के पास ज्ञान होता है और कारीगर-समाज को कोई रियायत या सब्सिडी नहीं चाहिए. उन्हें उनके ज्ञान और श्रम का पूरा मूल्य मिले अर्थात उन्हें भी सरकारी कर्मचारी के जैसी आय होनी चाहिए. डा. अनूप श्रमिक ने सफाई कर्मी जातियों की स्थिति और महिलाओं के ज्ञान के प्रकार और उसकी ताकत पर प्रकाश डाला. कानून और योजनाओं की चर्चा करते हुए डीग्रीधारी और गैर-डीग्रीधारी लोगो के बीच अंतर को सामने रखा. चौधरी राजेंद्र ने आदिवासी और ग्रामीण समाजों के ज्ञान और मूल्यों से सीख लेने की बात रखी. अगरिया जनजाति द्वारा किये जा रहे पारंपरिक लौह आगलन के उदहारण के साथ उन्होंने आदिवासी ज्ञान की श्रेष्ठता को सामने रखा और कहा की सरकारी नीतियों ने ऐसे ज्ञानियों को गरीब बना दिया.
ज्ञान-पंचायत की चर्चा में कई लोगों ने भाग लिया. वक्ताओं ने ज्ञान की दुनिया, उसकी बनावट, उसके अन्दर की ऊँच-नीच, जातियों में उसका बंटवारा, शिक्षित लोगों की सीमाएं, सरकारों का रुख, किसान-कारीगर-आदिवासी-ठेलापटरी के व्यवसाइयों तथा महिलाओं के ज्ञान के प्रकार और उसकी ताकत पर प्रकाश डाला. ये संदेह भी उभर कर आये कि कहीं लोकविद्या की प्रतिष्ठा से जातियों से बना वर्तमान सामाजिक संगठन और मज़बूत तो नहीं होगा?
सारनाथ में वनवासियों की एक छोटी-सी बस्ती हैं. इस बस्ती के लोग पहले जंगल से खदेड़े गए और अपने ज्ञान के इस्तेमाल से बिछड़े ये अब मजदूरी करते हैं. पंचायत में इस बस्ती से आये सुरेश जी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि उनकी बस्ती को प्रशासन कई बार बेदखल करने के बाद अब फिर से बेदखल करने जा रहा है. सवाल यह है कि ज्ञानियों के साथ सरकारों की यह बेरुखी और गैर-जिम्मेदारी से निपटने का क्या मार्ग हैं? पंचायत में इस समाज के लिए मदद की अपील कि गई.   
रामजनम भाई ने जोर देकर कहा कि कारीगर-समाज को उनके ज्ञान का मूल्य मिलना ही चाहिए. आज विश्वविद्यालयों में लूटेरों के हित में शोध हो रहे हैं और कारीगरों के ज्ञान को वे ख़ारिज कर रहे हैं.
भाई एहसान अली ने कहा कि कारीगर को एक सरकारी कर्मचारी के जैसी ही आय हो यह एक बहुत जायज़ बात है और इसके लिए कारीगर-समाज एकजुट हो तो यह बात मनवाना कोई मुश्किल काम भी नहीं होगा.
जागृति जी ने लोकविद्या को सहज ज्ञान के रूप में देखा और इसे प्रकृति की नजदीकी तथा उसके साथ तालमेल में देखा. यह भी कि सरकारी बनाम गैर-सरकारी तंत्र में लोगों को बाँटने और लड़ाने वाला यह तंत्र बदलना होगा. कारीगरों को उनके ज्ञान का मूल्य मिलना चाहिए.
साथी महेंद्र प्रताप मौर्य ने कारीगर-समाज के ज्ञान को उच्च दर्जे का ज्ञान बताते हुए यह कहा कि ज्ञान में ऊँच-नीच नहीं होनी चाहिए और आज सामाजिक विषमता को मिटाने के लिए यह मांग मजबूती से उठाई जानी चाहिए कि हर कारीगर के ज्ञान को सरकारी कर्मचारी के बराबर की आय हो.
शिवपूजन जी ने इस बात पर जोर दिया कि जातियां ख़त्म होनी चाहिए और कारीगर के ज्ञान को सरकारी कर्मचारी के बराबर मूल्य मिलना चाहिए.  
पंचायत का सञ्चालन करते हुए लक्ष्मण भाई ने कहा कि आज केवल पुराने ब्राह्मणवाद के खिलाफ बात करने से कुछ नहीं होगा. एक उच्च शिक्षित लोगों का जो नया ब्राह्मणवाद उभर आया है वह सामाजिक विषमता का एक मज़बूत खम्भा बन गया है. पुराने और नए ब्राह्मणवाद से एकसाथ मोर्चा लेने का तरीका लोकविद्या की प्रतिष्ठा से निकलता है. लोकविद्या प्रतिष्ठा का पहला कदम इस बात को समाज और नेतृत्व से मनवाने में है कि लोकविद्या के स्वामी कारीगर-समाज को सरकारी कर्मचारी के बराबर आय हो.
विद्या आश्रम के अध्यक्ष सुनील जी ने कहा कि कारीगर समाज की ज्ञान परम्परा को याद करें, कबीर साहब, संत रैदास, गाडगे महाराज, महात्मा फुले आदि संतों से प्रेरणा लें. यह समझना होगा कि आज़ादी के बाद पुराने और नए ब्राह्मणवाद ( उच्च शिक्षित) के बीच समझौता हो गया है जिसके चलते सामाजिक असमानताएं बड़े पैमाने पर पुख्ता हुई हैं. संसदीय लोकतंत्र इस समझौते का नेतृत्व करता है. यही कारण है कि 80 साल की आज़ादी के बाद भी परिवर्तन के लिए उच्च शिक्षा तथा संसदीय लोकतंत्र की ओर देखना बेमानी हो गया है. सुनीलजी ने इस ज्ञान-पंचायत में सीधे यह बात विचार के लिए रखी कि क्या सामाजिक न्याय और स्वराज के विचार संयुक्त रूप से सामाजिक असमानताओं से मुकाबले का नया विचार दे सकते हैं? श्रम के साथ ज्ञान का भी मूल्य हो यह बात इन दोनों विचारों को एक साथ आने का मार्ग खोलती है. 

पहल की दिशा पर सुनील जी 


ज्ञान-पंचायत का सञ्चालन करते हुए लक्ष्मण प्रसाद 
अंत में प्रेमलता जी ने ज्ञान-पंचायत की आयोजन समिति की ओर से पंचायत में हुई चर्चा पर आगे चिंतन को बढ़ाने और इसे समाज के बीच ले जाने की बात कही और ज्ञान-पंचायत में भागीदार सभी लोगों को और व्यवस्था करने वाले साथियों, प्रभावती देवी, अंजू देवी, पप्पू सोनकर, मल्लू पुल्धाने भलाऊ, सचानु मानव, भागमती देवी, राजेंद्र मिस्त्री, को धन्यवाद दिया.   
फिर सभी ने साथ बैठकर जलपान किया. पानी बरस रहा था इसलिए लोग थोड़ी देर रुके रहे. इसके चलते आपस में बातचीत के लिए कुछ और समय मिल गया. 
   पंचायत के बाद एक साथ बैठकर जलपान 
स्थापना दिवस की पूर्व संध्या, यानि 31 जुलाई 2018 को आश्रम पर प्रेमचंद जयंती मनाई गई. इस अवसर पर आश्रम के सामने स्थित चिंतन ढाबा पर बैठकर उनकी कहानी 'मंत्र' का पाठ हुआ। पाठ के बाद कहानी पर चर्चा हुई जिसमें सभी ने भाग लिया। कहानी के एक पात्र डा. चड्ढा आधुनिक विद्या का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं तो दूसरे मुख्य पात्र, भगत लोकविद्या का। डाक्टर साहब अपनी विद्या के दम्भ में संवेदना और कर्त्तव्य से बहुत दूर चले जाते हैं। दूसरी तरफ लोकविद्या के धनी भगत को तमाम कटु भावों के बीच किस तरह लोकविद्या नैतिक कर्त्तव्य की ओर खींच ले जाती है, इस संघर्ष को प्रेमचंद जी ने बखूबी इस कहानी में उकेरा है। कहानी के पाठ के पहले चिंतन ढाबा पर दो पेड़ों का पौधारोपण हुआ और लोकविद्या के बोल का गायन हुआ। 
मंत्र कहानी का लिंक http://premchand.kahaani.org/…/blog-post_114178929605087256…



विद्या आश्रम 


Tuesday, July 31, 2018

विद्या आश्रम के स्थापना दिवस पर


निमंत्रण
विद्या आश्रम के स्थापना दिवस के अवसर पर
कारीगर ज्ञान पंचायत
विषय : केवल श्रम ही नहीं, ज्ञान का भी मूल्य चाहिए
दिन : बुधवार, 1 अगस्त 2018
समय : दिन में 11 से 3 बजे तक
स्थान : विद्या आश्रम परिसर, सारनाथ
1 अगस्त 2004 को सारनाथ में  विद्या आश्रम की स्थापना हुई थी. लोकविद्या विचार से प्रेरित इस आश्रम से किसान और कारीगर समाजों की शक्ति और पहल के स्रोतों को उजागर करने के प्रयास रहे हैं. आश्रम के स्थापना-दिवस के अवसर पर 1 अगस्त 2018 को दिन में 11 से 3 बजे तक  कारीगर ज्ञान पंचायत का आयोजन है. 
कार्यक्रम
 
1.     विषय प्रवेश : चित्रा सहस्रबुद्धे
2.     वक्ता : चौधरी राजेन्द्र, डा. अनूप श्रमिक, फज़लुर्रहमान अंसारी
3.     सबकी भागीदारी से विचार विमर्श
4.     पहल की दिशा में दो शब्द – सुनील सहस्रबुद्धे  
5.     समापन : प्रेमलता सिंह
6.     सञ्चालन : लक्ष्मण प्रसाद
7.     जलपान
लोकविद्या सत्संग के साथ ज्ञान-पंचायत शुरू होगी.
-    निवेदक -
कार्यक्रम आयोजन समिति – प्रेमलता सिंह, एहसान अली, प्रभावती देवी, फ़िरोज़ खान, मु. अलीम हाशमी, अंजू देवी, कमलेश, राजेंद्र मिस्त्री 


Friday, July 6, 2018

आय का सवाल - जनता का अजेंडा लोकसभा चुनाव 2019


   देश के अनेक स्थानों पर सामाजिक कार्यकर्ताओं ने 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले जन पक्ष की एक मुहिम चलाई थी और व्यापक पैमाने पर भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के खतरों से लोगों को आगाह किया था. अब पांच वर्षों का अनुभव यह है कि दिल्ली की सत्ता पर कब्ज़े के बाद से इनकी सरकार ने आम जनता की आवश्यकताओं के बारे में कुछ करना तो दूर, कुछ सोचा हो ऐसा भी नहीं दीखता, उलटे ये देश के धन्ना सेठों के खजाने भरने में लगे रहे और ऐसा करने में किसानों, कारीगरों, मजदूरों, आदिवासियों, ठेला-पटरी वालों, महिलाओं, सभी सामान्य लोगों के हितों को कुर्बान कर दिया. इतना ही नहीं तो समाज को बांटने का आक्रामक दौर चलाया. अब एक बार फिर 2019 के लोकसभा चुनाव के सन्दर्भ में सामाजिक कार्यकर्ताओं को और समाज के प्रति संवेदना और सरोकार रखने वाले सभी लोगों को अपना कर्त्तव्य तय करने का समय आ गया है. 
साम्प्रदायिकता बनाम धर्म निरपेक्षता को केंद्र में रखकर बड़ी बहस चलाई गई है तथा इसे राजनैतिक ध्रुवीकरण का आधार बनाया गया है. यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण होते हुए भी सार्वजनिक बहस पर पूरा छा जाये यह इस देश की जनता के हित में नहीं है. यह आवश्यक है कि आम लोगों की ज़िन्दगी से जुड़े बुनियादी सवाल भी सार्वजनिक बहस का मुद्दा बनें. एक ऐसा ही सवाल है --- किसान, कारीगर, मज़दूर, ठेला-पटरीवाले तथा आदिवासी परिवारों की आय का सवाल. इस सवाल को सामने रखकर आगामी लोकसभा चुनाव के लिए अजेंडा बनाया जाना चाहिए.
उपरोक्त सभी समाजों के लिए तरह-तरह की परियोजनाएं सभी सरकारें लाती हैं लेकिन इन लोगों की वास्तविक परिस्थितियां गिरती ही चली गई हैं. आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, क़र्ज़, उत्पादों के दाम, रोज़गार, इत्यादि की बातें होती रहती हैं लेकिन इन सबकी आय में वृद्धि के लिए न नीतियां बनती हैं, न कोई कानूनी, अथवा अन्य व्यवस्थाओं की ही बात होती है. आय के प्रश्न पर व्यापक बहस की ज़रूरत है और इस बात की ज़रूरत है कि सभी दल इसपर अपनी स्पष्ट राय ज़ाहिर करें.
किसान अपने उत्पादन के दाम, क़र्ज़, बिजली, सिंचाई, खाद-बीज के लिए कई दशकों से बड़े पैमाने पर आन्दोलन कर रहा है लेकिन स्थितियां बद से बदतर ही हुई हैं. ऐसे में यह विचार प्रबल रूप से सामने आया है कि सारी बातचीत किसान परिवार की आय को केंद्र में रखकर होनी चाहिए. मांग यह होनी चाहिए कि हर किसान परिवार को वैसी ही आय हो जैसी आय एक सरकारी कर्मचारी की होती है. इस मांग का मूल आधार इस बात में है कि किसान परिवार सभी दृष्टियों से अपने आर्थिक और सामाजिक कार्यों को अपने ज्ञान के आधार पर करता है. उसका ज्ञान विश्वविद्यालय के ज्ञान से किसी भी अर्थ में कम नहीं होता. यह बात कारीगर, आदिवासी औए ठेला-पटरी पर धंधा करने वाले परिवारों को भी लागू होती है. ये सब अपने सारे काम अपने ज्ञान के आधार पर ही करते हैं. तथा हर अर्थ में भारत देश के उतने ही सम्मानित नागरिक हैं जितने सम्मानित नागरिक इस देश के पढ़े-लिखे स्त्री-पुरुष हैं.
अतः जनता का भविष्य संवारने का मूल मुद्दा यह है कि इस देश के हर परिवार को ऐसी आय होनी चाहिए जैसी एक सरकारी कर्मचारी की होती है.
हमारी अपील है कि अलग-अलग विचारों से व अलग-अलग संगठनात्मक ढांचों में काम करने वाले लोग अपने-अपने ढंग से इस वार्ता को आगे बढायें.
आशा है कि बैठकों और सभाओं में तथा सोशल मीडिया पर ऐसी गूँज होगी कि सभी दल इस विषय पर अपना दृष्टिकोण साफ करना ज़रूरी समझेंगे.
विद्या आश्रम

Friday, June 15, 2018

दर्शन अखाड़ा ब्लॉग का आमंत्रण


यह आपको दर्शन अखाड़ा ब्लॉग का आमंत्रण है. लिंक है ---  https://darshanakhadablog.wordpress.com
दर्शन अखाड़ा के नाम से विद्या आश्रम ने यह ब्लॉग शुरू किया है.
जब प्रचलित समकालीन राजनीतिक धाराएं अप्रासंगिक मालूम पड़ने लगें अथवा एकांगी और ज्यादती करने वाली जान पड़ें तो समझा जा सकता है कि सवाल अथवा उलझन केवल राजनीतिक नहीं है. जब यह आम चर्चा का विषय हो जाये कि कोई भी राजनीतिक दल जनोपयोगी कार्य करने में असफल नज़र आ रहा है तो चिंता का विषय केवल नया दल बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए. इन परिस्थितियों में सामाजिक सरोकार रखने वाले और समाज की चिंता करने वाले एक नए दर्शन की खोज में होते हैं. विद्या आश्रम इसी खोज का एक साथी है और दर्शन अखाड़ा उसका एक प्रयास.
हम मानते हैं कि हर व्यक्ति में एक दार्शनिक होता है. हम दार्शनिक संवाद की भाषा को खोलना चाहते हैं. जब सामान्य भाषा में दर्शन संवाद होगा तब सामान्य लोगों और समाज के नेतृत्व के बीच दर्शन संवाद हो सकेगा. यानि शिक्षा, प्रबंधन, कानून, स्वास्थ्य, आर्थिकी, साइंस, प्रौद्योगिकी, नीति, प्रशासन, राजनीति, कला, बिरादरी, धर्म, आदि क्षेत्रों के नेतृत्व और आम लोगों के बीच बुनियादी वार्ताएं हो सकेंगी.   
आइये, विचार की दुनिया में एक नई हलचल और भाईचारा बनाने का प्रयास किया जाये. समाज में बदलाव के लिए एक नई ज़मीन बनाई जाये.
हमें आपके जवाब का इंतज़ार रहेगा. कृपया अपना मत व्यक्त करने के साथ ही इस पर भी सुझाव दें कि इस ब्लॉग को एक दार्शनिक बहस के स्थान के रूप में कैसे संगठित किया जाये.

विद्या आश्रम