Tuesday, September 17, 2019

Listening to Philosophers

Listening to Philosophers 
Dialogue in Varanasi 

Venue : Vidya Ashram, Sarnath and Darshan Akhada, Rajghat. 
Date : 12-13-14 October 2019 , Saturday, Sunday, Monday.
13th is Sharad Poornima

All those interested are invited

Introductory Remarks 

When all politics is bereft of ideological considerations, there is need of a philosophical intervention. When ordinary life gets very muddled and moral imperatives fail to provide the criteria of resolution, philosophical intervention becomes imperative and inevitable.  The world today appears to be in the grip of changes which have no promise for a better world.

What is the contemporary philosophical scene which may come to rescue? Where do we look for philosophers, who we should like to listen to?

Where we look for may be - new epistemological foundations in the wake of the emergence of the virtual world, reflections on the human condition in the wake of the new forms of oppression let loose by the New Empire, debates on Climate Justice, culturally rooted thought on economics and politics, holistic thought as against piecemeal, art as preferred way of thinking over science, lokavidya darshan when organized knowledge is seen as hand maiden of the state, neighbourhood as primary form of social organisation and the like.

Every department of human life and social organization has undergone huge changes since the appearance of the internet and the world wide web, close to 30 years ago. Economics, politics, trade, social organization, finance, industry, education, science research and finally also ordinary life, everything has undergone great changes. Vidya Ashram has tried to look at these changes by its research, investigations and dialogues pertaining to the world of knowledge, particularly the flux in it. In the process it encountered radically different approaches for understanding the world which had different epistemological perspectives and pointed towards new ontological constructions. New languages and idioms can be seen emerging to enable these approaches to be true to their contexts including the emancipatory needs of the people - farmers, women, artisans, service providers, workers, students, adivasis and those in the market doing business with tiny capital. One would often find that these approaches do not accept the riders of logic, values and methods of modern science. Some of these approaches are broadly mentioned below.
·        The Rights of Mother Earth and buen vivir that emerged in some countries of South America like Bolivia, Ecuador and part Colombia.
·        Lokavidya Jan Andolan in India - an explicitly epistemological movement creating the concept of lokavidya.
·       European Students Movement against corporatization of   education creating the idea of Cognitive Capitalism.
·        La Via –Campesina, an international farmers organization and movement focusing on Climate Change and Food Sovereignty – suggesting a Swaraj like reorganization of societal priorities.

There are explicit philosophical writings in the context of these movements and phenomena. There is also wide ranging philosophical reflection which is not rooted explicitly in these phenomena. They come from different ends like: primacy of art in life and understanding, reassertion and innovation of traditional ways of practice and understanding by the subaltern classes, new critique of Science focussing on Information Technology, Bio-technology, Nano-science and Cognitive Science, network focussed ontology, primacy of communication over production leading to fundamental changes in how history and science need to be viewed etc.

It is suggested that this note be shared with persons who may be interested in this, seek their views on it and if they would be willing to contribute to shape this dialogue with philosophers and among philosophers. This discussion needs to be very open both on content as well as form of this ‘listening to philosophers’. It can be conceived on a global scale with virtual and actual forms intertwined.

Vidya Ashram 

Sunday, August 4, 2019

विद्या आश्रम स्थापना दिवस समारोह की एक झलक,1 अगस्त 2019

विद्या आश्रम परिसर पर 1 अगस्त को आश्रम का स्थापना दिवस मनाया गया. विद्या आश्रम की स्थापना 1 अगस्त 2004 को हुई थी. इस अवसर पर प्रमुखतः तीन कार्य हुए.
  1. 'लोकविद्या-समाज के नौजवानों का भविष्य'  विषय पर लोकविद्या-समाज के संगठनकर्ता और युवाओं ने अपने विचार रखे. अध्यक्ष मण्डल में शामिल थे - ग्राम लेढूपुर के कन्हैयालाल (कुआँ बनाने के कारीगर),  ग्राम मोहाव के बचाऊ (किसान), पीली कोठी के एह्सान अली (बुनकर), श्रीमती प्रेमलता सिंह (लोकविद्या जन आन्दोलन ) और अरुण जी  (वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्त्ता). वक्ताओं में  ठेला-पटरी संघर्ष समिति के प्रेमशंकर सोनकर, माँ गंगा निषाद समिति के हरिश्चंद्र बिंद, पांडेपुर से गोपाल ( कंप्यूटर हार्डवेयर कारीगर),  ग्राम सराय मोहना से आरती कुमारी (बुनकर की बेटी), सलारपुर से अजय कुमार मौर्य (इलेक्ट्रिक सामानों के कारीगर ) , कोनिया से गुलज़ार भाई (बुनकर), सारनाथ से जयप्रकाश (इन्वर्टर के कारीगर), ग्राम भैंसोडी से प्रमेश (शिक्षक) ने अपनी बात रखी. सामाजिक कार्यकर्ताओं में स्वराज अभियान के रामजनम, पर्यावरण प्रदूषण के खिलाफ काम कर रहे रवि शेखर और सानिया, कारीगर नज़रिया से फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, लोकविद्या आन्दोलन से लक्ष्मण प्रसाद ने अपनी बात रखी. भागीदारों में मकबूल अहमद , आनंद प्रकाश, आदि ने मुद्दे का समर्थन करते हुए अपने विचार रखे. सुनीलजी ने लोकविद्या के गूढ़ अर्थों और लोकविद्या के कार्यकर्ताओं की वैचारिक और तकनीकी क्षमताओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि लोकविद्या-समाज के नौजवानों का भविष्य उन्हीं के हाथ में है. बस, यह याद रखना ज़रूरी है कि लोकविद्या-समाज का भविष्य और उस समाज के नौजवानों का भविष्य एक ही है. यही बात इसमें भी स्पष्ट होती है, जब हम ये कहते हैं कि लोकविद्या के जरिये अपनी जीविका चलाने वाले के परिवार में वैसी ही आय आणि चाहिए जैसी एक सरकारी कर्मचारी की होती है. अंत में अध्यक्ष मण्डल में एहसान अली ने कहा कि लोकविद्या-समाज को आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सभी तरह से सरकारें समय-समय पर प्रताड़ित करती हैं. इससे उबरने के लिए लोकविद्या आन्दोलन का विचार और मांग पर व्यापक जनमत बनाना ज़रूरी है. प्रेमलताजी ने अपनी स्वरचित कविता का पाठ किया जिसे हम अगले पोस्ट में  प्रकाशित कर रहे हैं. अरुणजी ने एक कविता गा कर सुनाई.

             विमर्श की शुरुआत लोकविद्या के बोल गाकर हुई. 
और फिर ' लोकविद्या-समाज के नौजवानों का भविष्य ' पर विमर्श 

2. विद्या आश्रम में नई बनायी  गई रसोई का उदघाटन किया गया. उद्घाटन में यह कहा गया कि यह रसोई लोकविद्या-समाजों की रसोई समृद्ध रहे इसकी प्रतीक बने. चित्राजी ने कहा कि विद्या आश्रम लोकविद्या-समाज के लोगों के लिए चिंतन-मनन, संकल्प और रचना का स्थान है. यह किसान, कारीगर, आदिवासी, सेवा कार्य  करने वाले, ठेले-पटरी के दुकानदार, मजदूरआदि समाजों की बेहतरी, खुशहाली और न्याय के लिए विचार व वार्ता का स्थान है. आश्रम रसोई के आलावा परिसर पर एक कला कक्ष का निर्माण भी हो रहा है, जहाँ कला का अभ्यास, सृजन, प्रस्तुति और उस से सम्बंधित दर्शन वार्ता होगी. एक अतिथि कक्ष का भी निर्माण हो रहा है.

 रसोई घर के निर्माता मिस्त्री मुन्नालाल वर्मा और उनके सहयोगी ब्रिजेश कुमार और रोहित कुमार ने दीप जला कर रसोई का उदघाटन किया 

      रसोई के उद्घाटन पर एक तरफ भागीदार और 
         दूसरी ओर विद्या आश्रम के कार्यकर्त्ता            

विद्या आश्रम की व्यवस्थापिका श्रीमती प्रभावती देवी (अन्नपूर्णा) और 
उनके पति श्री मल्लू का सम्मान करते हुए आश्रम के व्यवस्थापक 
फिरोज खान और लोकविद्या जन आन्दोलन की प्रेमलता सिंह.

3. लोकविद्या को ज्ञान का दर्जा और सरकारी कर्मचारी के बराबर मूल्य हासिल होना चाहिए इसके लिए विचार-समझ और रचना पर वार्ता को चलाने की आवश्यकता को देखते हुए युवाओं का एक समूह बनाने का निर्णय लिया गया. इसके लिए एक समूह भी बनाया गया, जिसमें शामिल हैं-- लक्ष्मण प्रसाद, फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, राम जनम, एकता, प्रमेश और आरती.   

सामूहिक भोजन

 भोजन के बाद प्रभावती जी के नेतृत्व में                         निमिता, फिरदौस और यस्मिन ने बनाई रंगोली 
भोजन बनाने वाली बहनों से हास-परिहास   

विद्या आश्रम 

Tuesday, July 30, 2019

विद्या आश्रम स्थापना दिवस

स्थापना : 1 अगस्त 2004

विद्या आश्रम स्थापना दिवस
गुरूवार, 1 अगस्त 2019
दिन में 11.00 से 2.00

दिन में 11. 00 बजे
विमर्श :  लोकविद्या समाज के नौजवानों का भविष्य

2.00 बजे – सामूहिक भोजन

वरिष्ठ सामाजिक विचारक एवं कार्यकर्ताओं के सामने लोकविद्या-समाज के संगठनकर्ता एवं नौजवान अपनी बात रखेंगे, उन्हें सुनने और प्रोत्साहित करने अवश्य आइये.


बिंद्रा पटेल                       किसान, डोमरी
हरिश्चंद्र बिंद                     माँ गंगा निषाद समिति
धर्मेन्द्र कुमार निषाद               निषाद समाज, राजघाट
आरती कुमारी                    सराय मोहाना
प्रेम सोनकर                     पटरी-ठेले संघर्ष समिति
आबिद शेख                      बुनकर, मलदहिया
चंदा यादव                       नारी हस्तकला समिति
मकबूल अहमद                   बुनकर, जैतपुरा
अब्दुल मतीन अंसारी              दस्तकार बुनकर मोर्चा
अजय कुमार मौर्य                 शिक्षक, सलारपुर

वक्ताओं के बाद खुली चर्चा होगी और सभी अपनी बात रखेंगे.
सञ्चालन : लक्ष्मण प्रसाद और फ़ज़लुर्रहमान अंसारी

चित्रा सहस्रबुद्धे                              लक्ष्मण प्रसाद
समन्वयक, विद्या आश्रम                     लोकविद्या जन आन्दोलन

Monday, July 22, 2019

प्रेमचंद का दर्शन : सामान्य जीवन, समाजबोध और प्रगति के मानक


दर्शन अखाड़ा पर एक वार्ता
28 जुलाई 2019
शाम 5 बजे

प्रेमचंद (जन्म 31 जुलाई 1880) वाराणसी शहर से सटे हुए लमही गाँव के निवासी थे. चूँकि 31 जुलाई को शहर में और लमही में कार्यक्रम होते हैं, हमने सोचा कि रविवार 28 जुलाई को कुछ बातचीत दर्शन अखाड़ा पर हो जाये. प्रेमचंद के दर्शन पर कुछ बात हो.
साहित्य, कला और सृजन के पीछे एक दर्शन और विश्व दृष्टि न हो तो वह कालजयी कैसे हो सकता है? आइये, प्रेमचंद को एक दार्शनिक के रूप में देखने का प्रयास किया जाए. खोजा जाये आज के लिए कैसी भावी दृष्टि की विरासत उनसे मिलती है. हमें लगा कि सामान्य जीवन, समाजबोध व प्रगति के मानक के सन्दर्भों में बातचीत से कुछ प्रस्थान बिंदु मिल सकते हैं.  
विद्या आश्रम साहित्य में दर्शन की खोज का हिमायती है. हम उसकी जाँच की बात को ठीक नहीं समझते. दर्शन ढूंढ़ें तो अक्ल में कुछ इजाफा हो सकता है.  
प्रेमचंद को कमोबेश हम सबने पढ़ा है. उनके लेखन पर चिंतन भी किया है. आपसे अनुरोध है कि एक डेढ़ पेज या दो पेज इस पर लिख कर भेजें. वार्ता में शामिल हों और अपनी बात कहें. फेसबुक पर ही लिखकर भेज दें या फिर विद्या आश्रम के ई–मेल vidyaashram@gmail.com पर.

सुनील सहस्रबुद्धे (9839275124)        गोरखनाथ (9450542636)

दर्शन अखाड़ा स्थान : ए 11/13 नया महादेव, राजघाट, वाराणसी
राजघाट (भैंसासुर घाट) पर रविदास मंदिर से दशाश्वमेध की ओर बढ़ने पर सुलभ शौचालय के पीछे पंच अग्नि अखाड़ा के बीस कदम आगे

Saturday, June 15, 2019

दर्शन अखाड़ा में कबीर ज्ञान पंचायत

वाराणसी का पंचगंगा घाट कबीर के ज्ञान प्राप्ति का स्थान माना जाता है. कबीर ज्ञान पंचायत के लिए यह सबसे उपयुक्त स्थान होता. इस बार हम इसे नहीं कर पाए, अगली बार यहाँ कबीर दर्शन से साक्षात्कार का आयोजन करने का प्रयास ज़रूर करेंगे. वाराणसी में पंचगंगा घाट से उत्तर-पूर्व दिशा में लगभग एक किलोमीटर दूर, राजघाट (भैंसासुर घाट) पर दर्शन अखाड़ा है. इस वर्ष कबीर जयंती (17 जून ) के चार दिन पूर्व 13 जून को दर्शन अखाड़ा में कबीर ज्ञान पंचायत रखी गई. इस कबीर ज्ञान पंचायत में वाराणसी के कुछ सामाजिक विचारक और कार्यकर्त्ता जुटे. आज की दुनिया में कबीर दर्शन से क्या उजाला मिलता है इस विषय पर सभी ने अपने-अपने विचारों को साझा किया. कबीर दर्शन ज्ञान और विचार की दुनिया में एक बहुत बड़ा फलक देता है, ऐसे में चर्चा के प्रस्थानबिन्दु के रूप में उनका एक पद पंचायत के सामने रखा गया.     
मेरा तेरा मनुवा कैसे होई एक रे II
मैं कहता आंखन की देखी, तू कहता कागज़ की लेखी I
मैं कहता सुरझावनहारी, तू राख्यो उरझाई रे I
मेरा तेरा मनुवा कैसे होई एक रे II
मैं कहता जागत रहियो, तू रहता है सोई रे I
मैं कहता निर्मोही रहियो, तू जाता है मोई रे I
मेरा तेरा मनुवा कैसे होई एक रे II
बायें  से -- महेंद्र मौर्य, अरुण कुमार, रामजनम, फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, 
एहसान अली. मतीन अंसारी, गोरखनाथ और मो. अलीम  
कबीर ने अपने समय के स्थापित संगठित ज्ञान और सत्ता की सांठ-गांठ को चुनौती दी.  ज्ञान जिसे समाज का एक छोटा सा समूह ही हासिल कर पाता है और जिस ज्ञान का सत्ता से सीधा सम्बन्ध होता है उस समूह को अपने ज्ञान का अपार दंभ हो जाता है. वह खुद को समाज के अन्य लोगों से अलग करता है, अपने को विशेष समझता है, शेष समाज को मूर्ख समझता है. कबीर के समय यही स्थिति थी. उनके समय स्थापित ज्ञान बहुत कुछ धार्मिक घेरे में रहा, ऐसे में वे धर्म के ठेकेदारों को संबोधित करते दिखाई देते हैं. आज अगर कबीर होते तो किसे संबोधित करते? आज का प्रतिष्ठित ज्ञान विश्वविद्यालय का ज्ञान है. विश्वविद्यालय राजसत्ता के साथ सांठ-गांठ कर ज्ञान के ठेकेदार बने हुए हैं. ये राजसत्ता की नीतियों को समाज में मान्यता और आधार प्रदान करने के औजार हैं. इस ज्ञान का सत्य और न्याय से कोई लेना-देना नहीं है, लोगों की आवश्यकतायें और कष्टों से कोई लेना-देना नहीं है. अगर होता तो हमारी रोज़गार, उद्योग, शिक्षा, न्याय, चिकित्सा, आदि की नीतियां, गाँव और शहरों का संगठन और सम्बन्ध कुछ ही लोगों के लिए लाभ और सुविधा देने के लिए न बन गए होते. हम सभी जानते हैं कि गांधीजी ने भी अपने समय के प्रतिष्ठित ज्ञान और सत्ता के सम्बन्ध को अन्यायी और लोक विरोधी कह कर चुनौती दी.
आज के “कागज़ की लेखी” ज्ञान के वाहक और राजसत्ता से सुविधा प्राप्त समूह के ज्ञान और ज्ञान-संस्थानों को चुनौती “आंखन देखी” ज्ञान-परंपरा के वाहक समाजों से जब मिलेगी तो समाज के सभी तबकों और हिस्सों के लिए न्याय का रास्ता खुलेगा. पंचायत में विषय को रखते हुए सुनीलजी ने कहा कि इस चुनौती को पद की पहली पंक्ति “मेरा तेरा मनुवा कैसे होई एक रे” अपनी सम्पूर्णता में सामने लाती है. समाज को सभी तरह के ज्ञान की आवश्यकता है. ऐसे में किसी एक ही ज्ञान को प्रतिष्ठित किया जाये या ज्ञान की कसौटी बना दिया जाए तो यह अन्याय का रास्ता खोल देता है. ऐसे में प्रतिष्ठित ज्ञान और समाज में स्थित ज्ञान प्रवाहों के बीच बराबरी और मैत्री का सम्बन्ध आवश्यक है.

बाएं से -- प्रेमलताजी, चित्राजी, सरगम येर्रा और वनलता बुलुसु

कबीर ज्ञान पंचायत में उपरोक्त पद का सन्दर्भ लेते हुए सभी लोगों ने अपने विचार रखे. महेंद्र प्रसाद मौर्य ने कहा कि कबीर ज्ञान की इजारेदारी का विरोध करते हैं. सबके पास ज्ञानेन्द्रियाँ हैं और हर कोई ज्ञान प्राप्त करता है. सबका ज्ञान अलग अलग होता है. यह अलग-अलग ज्ञान समाज के बीच आना चाहिए. हैदराबाद से इस पंचायत में शामिल होने आई वनलता ने सवाल उठाया कि ज्ञान पर सहमति के आधार क्या हों, इस पर भी विचार होना चाहिए. प्रेमलताजी ने इस बात पर जोर दिया कि ज्ञान को व्यक्तिगत पहचान के साथ न देख कर समाज के ज्ञान  के रूप में देखना होगा. लक्ष्मण प्रसाद ने कबीर के सहज ज्ञान की ओर सबका ध्यान खींचा और कहा कि सहज ज्ञान को समाज में प्रतिष्ठा मिलेगी तो पाखंड और अन्याय से मुक्ति का रास्ता खुलेगा. रामजनम ने कहा कि किसान और गाँव- समाज के पास जो ज्ञान है उसे न्याय मिलना चाहिए. गोरखनाथ ने कबीर के ज्ञान को सत्य से तपा और प्रेम से सिक्त हुआ कहा. एहसान भाई का जोर हमेशा की तरह नैतिकता पर था. कैसे भी दबाव के बावजूद सही और गलत की पहचान से ही रास्ता बने और अपने को बड़ा और दूसरे को छोटा न देखा जाए. फ़ज़लुर्रहमान अंसारी ने इस बात पर जोर दिया कि कबीर की ज्ञान परंपरा में हमें खुद को देखना होगा, न कि कबीर संस्थानों की परम्परा में. ऐसे में कारीगर और किसान समाजों को अपने ज्ञान को विश्वविद्यालय के ज्ञान के बराबर होने का दावा प्रस्तुत करना होगा. रास्ता चाहे लम्बा हो लेकिन यही सत्य का रास्ता है, यही कबीर का रास्ता है. अरुणजी ने कहा कि इन सभी बातों पर सहमति है लेकिन प्रमुख बात “मेरा तेरा मनुवा कैसे होई एक रे” में देखी जाये. लोकविद्या समाज और उच्च शिक्षित लोगों के बीच, उनकी विद्याओं के बीच मैत्री और सद्भाव का रिश्ता कैसे बने यह प्रमुख चिंता का विषय है. इसके लिए क्या क्रिया करनी चाहिए? बुनकर दस्तकार मंच के मतीन भाई ने कहा कि “मेरा तेरा मनुवा कैसे होई एक रे” यही आज जनसंगठनों और जन आंदोलनों का प्रमुख कार्य है. चित्राजी ने कहा कि इस पद से स्वराज की कल्पना को आधार मिलता दिखाई देता है. ऐसे समाज की कल्पना जिसमें विशेषज्ञों के बल पर नहीं बल्कि सामान्य जन के ज्ञान के बल पर सबकी अपनी-अपनी पहल के साथ भागीदारी हो. अंत में गोरखनाथ जी ने दर्शन अखाड़ा की ओर से सबके प्रति अपने आभार व्यक्त किये.

विद्या आश्रम