Tuesday, December 10, 2019

निमंत्रण : विद्या आश्रम में गंगा आन्दोलन पर वार्ता

गंगा आन्दोलन पर वार्ता 
दिन : गुरुवार, 12 दिसम्बर 2019
समय : दोपहर 2 बजे 

मुख्य वक्ता 
संदीप पाण्डेय (सामाजिक कार्यकर्त्ता ) और हरिश्चंद्र बिंद (राष्ट्रीय सचिव, माँ गंगा निषादराज सेवा समिति) 

विद्या आश्रम पर 12 दिसंबर 2019 को दोपहर 2 बजे ‘निर्मल-अविरल गंगा' आन्दोलन पर वार्ता रखी गई है. संदीप पाण्डेय अपनी बात रखेंगे. हरिश्चंद्र बिंद भी अपनी बात रखने आ रहे हैं. आप अपनी बात रखें इसके लिए हम आपको आमंत्रित करते हैं.
हरिद्वार के मातरु सदन के सन्यासी गंगाजी में अवैध खनन के विरोध में और निर्मल-अविरल गंगा के पक्ष में लगातार प्राणाहुति दे रहे हैं. संदीप भाई मात्रि सदन के साथ इस गंगा आन्दोलन में सक्रिय हैं. उन्होंने इस विषय पर एक पुस्तक बनाई है, जो जल्दी ही छपेगी. फ़िलहाल अंग्रेजी में है, नाम है – Tradition of Saints Making Sacrifices for Ganga. हिंदी में भी जल्दी ही बनेगी. आप में से कई इस विषय पर सोचते हैं और आन्दोलन के पक्ष में सहयोग की भूमिका में रहे हैं. 

जैसा कि आप समझते हैं गंगा आन्दोलन एक समग्र आन्दोलन है. बड़ी तादाद में लोगों की जीविका का आन्दोलन है, जीवन मूल्यों का आन्दोलन है, पर्यावरण-पारिस्थितिकी संतुलन का आन्दोलन है, आर्थिक-सामाजिक संरचना में दखल का आन्दोलन है और विद्या की अपनी परम्पराओं के प्रति सम्मान का आन्दोलन है.

12 दिसम्बर की दोपहर संरक्षित कर लें और इस वार्ता के लिए विद्या आश्रम, सारनाथ अवश्य आयें. वार्ता समय से शुरू होगी. दोपहर बाद लोगों को कहीं-कहीं जाना है.


विद्या आश्रम 

Saturday, November 23, 2019

त्यौहार और जीवनमूल्य



साल भर के त्यौहारों पर नज़र डालें तो बहुत से त्यौहार तो ऐसे हैं जो प्रकृति से हमारे सम्बन्ध को दृढ़ करते हैं जैसे संक्रांत, लोढ़ी, पोंगल, वसंत पंचमी, नाग पंचमी, रंगभरी एकादशी, गंगा दशहरा, गुरू पूर्णिमा, डाला छठ, शरद पूर्णिमा आदि। हरतालिका, जिउतिया, नवरात्र आदि जैसे त्यौहार प्रजनन-पालन-पोषण से जुड़े बताये जाते हैं। प्रत्येक अमावस्या और पूर्णिमा, चन्द्र व सूर्य ग्रहण स्नान-दान के माने जाते हैं। कुछ त्यौहार देवताओं या महान संतों के नाम से होते हैं। इन सभी त्यौहारों का सम्बन्ध भारत की दर्शन परम्पराओं से रहा है।

दूसरी तरफ कुछ त्यौहार ऐसे हैं जो किसी के वध के जश्न हैं जैसे होलिका दहन, नरकासुर वध (नरक चतुर्दशी), महिषासुर वध (दुर्गा), रावण वध (दशहरा), आदि। भारत में ये त्यौहार आजादी के बाद ही सार्वजनिक तौर पर मनाये जाने लगे हैं और इन्हें ही भारत के प्रमुख त्यौहारों में गिनाया जाने लगा है। क्या किसी के वध (चाहे वह दुश्मन हो) का जश्न मनाने वाली संस्कृति महान हो सकती है? क्या हमें अपने त्यौहारों पर मनन करने की जरूरत नही है?
विद्या आश्रम पर 29 अक्टूबर 2019 को भारत के त्यौहारों के संदर्भ में सामाजिक कार्यकर्ता, किसान और कारीगरों के मिलेजुले इस समूह (लगभग 50 की संख्या) में 'त्यौहार और जीवन मूल्य' विषय पर चर्चा हुई. 

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स्वराज अभियान के रामजनम की अध्यक्षता में हुई इस गोष्ठी में भारतीय किसान यूनियन के लक्ष्मण प्रसाद ने कहा कि आज त्यौहार सामान्य जन के लिए आनंद नही बल्कि एक संकट के रूप में आते हैं, इन पर बाजार और राजनीति का स्पष्ट कब्ज़ा देखा जा सकता है। कमाई कुछ नही और त्यौहारों में मौज-मस्ती और चकाचौंध का प्रदर्शन प्रमुख स्थान लेते जा रहे हैं। इन त्यौहारों के मार्फत राजनीतिक दबाव हमें पाखंडी बनाने के जाल बुन रहे हैं। ऐसे में त्यौहार कैसे मनाये जाएं इस पर विचार करना आवश्यक है। अध्यापक शिवमूरत ने त्यौहारों को बाजार की गिरफ्त से छुड़ाने के लिए एक आंदोलन की आवश्यकता को रखा। लोकविद्या आंदोलन की प्रेमलता सिंह ने कहा कि त्यौहार साथ-साथ जीने के लिए होते हैं, साथ-साथ समृद्ध होने का संदेश देते हैं। ये समाज में उल्लास व रचनात्मकता के स्रोत हैं और समाज के कल्याण के लिए हैं। वध का जश्न मनाने वाले त्यौहार समाज में आक्रामकता और बदले की भावना को पैदा व मज़बूत करते हैं। इन्हें नया रूप देना चाहिए।
पारमिता ने अपने गांव का उदाहरण देते हुए कहा कि गांव में रामलीला होती थी लेकिन रावण का पुतला नही जलाया जाता था। पुतला जलाना यह शहरी रिवाज़ है। कारीगर नज़रिया के एहसान अली ने कहा कि त्यौहार इबादत के लिए है, ख़ुदा से सही राह दिखाने की गुजारिश है, ये अध्यात्म है। इसमें किसी को मारने का जश्न या बदला लेने की बात के लिए जगह कहाँ है? मोहम्मद अहमद ने कहा कि आज के दिन हम मोहर्रम के बाद पचासा मनाते हैं और इस दिन शहर से तलवार चलाते और अन्य शस्त्रों से लैस होकर हज़ारों की संख्या में लोग शहर के बीच से जूलूस निकालते हैं। यह त्यौहार भी वध के बदला लेने की बात को दृढ़ करता प्रतीत होता है। हम इसे ठीक नही मानते। हज़ार वर्ष पहले हुई वध की घटना का बदला आज क्यों ? गुलज़ार भाई ने इस बात का समर्थन करते हुए कहा कि त्यौहार राजनीति के हथियार और बाजार के गुलाम न बने इस पर सोच बनाने की ज़रूरत है। विनोद कुमार ने कहा कि त्यौहारों को खेलों से जोड़ने के प्रयास हों तो विध्वंसकारी प्रवृत्तियों पर काबू करने का एक रास्ता खुलेगा।
काशी विद्यापीठ के सांख्यिकी विभाग के अध्यापक रमन ने कहा कि हम बचपन से रामलीला देखते हुए बड़े हुए हैं, अब इसके बारे में जो नया विचार आज सुनने को मिला है उस पर सोचने के लिए अधिक समय देने की ज़रूरत है। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यापक रामाज्ञा ससिधर ने लोक और लोकविद्या के कुछ पहलुओं को उजागर करते हुए कहा कि त्यौहार में जो कर्मकांड आध्यात्मिकता को बढ़ाते हैं उनसे एतराज़ करने की ज़रूरत नही है। चित्रा सहस्रबुद्धे ने कहा कि वध के जश्न वाले त्यौहार होलिका दहन, दिवाली, दुर्गा पूजा आदि सार्वजनिक तौर पर देश भर में मनाना तो आज़ादी के बाद शुरू हुआ है। इसके पहले ये त्यौहार शायद भारत भर में प्रमुख त्यौहार के रूप में मनाए भी न जाते हो। हमें आज सोचना चाहिए कि क्या ये वध के जश्न में मनाए जाने वाले त्यौहार हमारे भारतीय होने की पहचान हैं या ये हाशिये के त्यौहार हैं?
सुनील सहस्रबुद्धे ने कहा कि त्यौहारों को सार्वजनिक क्षेत्र की संस्कृति पर एकाधिकार का औजार बनाना सर्वथा अनुचित है। अक्सर ऐसा एकाधिकार सांस्कृतिक उन्माद को जन्म देता है। जिस तरह लोकतंत्र में विपक्ष के बगैर लोकतंत्र ही नही रह जाता उसी तरह धर्म और संस्कृति आदि समाजोपयोगी भूमिका में रहें इसके लिए इतर दृष्टियों से समीक्षा और आलोचना का बड़ा महत्व है। भारतीय समाज में हमेशा से ये स्थितियां रही हैं, जो स्वराज की नियामक शक्तियों का काम करती रही हैं। आज़ादी के बाद से पूंजीवाद के त्वरित विकास के दौर में अर्थ से लेकर राजनीति और संस्कृति तक एकाधिकार की शक्तियों ने जोर पकड़ा।अलग-अलग मुखौटों में यह एकाधिकार बढ़ता चला गया। हमें उस सांस्कृतिक आंदोलन की ज़रूरत है, जो त्यौहारों को सांस्कृतिक एकाधिकार को चुनौती का एक औजार भी बना दे।
अंत में रामजनम ने अपने अध्यक्षीय भाषण में गोष्ठी को अत्यंत प्रासंगिक बताते हुए कहा कि हम खुद को और अपने समाज को सही ढंग से पहचान पाए और भविष्य को गढ़ने के न्यायपूर्ण मार्ग चुन सकें इसके लिए इन मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए।

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विद्या आश्रम 


Friday, November 15, 2019

Rooibos Tea agreement and the rights of practitioners of traditional knowledge

NATURE EDITORIAL
12 November 2019

Global lessons from South Africa’s rooibos compensation agreement

Indigenous communities must be compensated for their knowledge and treated as equals in research.
Portrait of Miss Huce Kgao, a woman From the San Tribe in Namibia taken in 2010
The San communities of southern Africa have drawn up a code of ethics for researchers.Credit: Eric Lafforgue/Gamma-Rapho via Getty
Nine years. That’s how long it took representatives of South Africa’s rooibos tea industry to agree to compensate the Indigenous San and Khoi communities for their peoples’ contribution to the development of the 500-million-rand (US$33.6-million) industry.
It is a landmark agreement — the first such deal that applies to an entire industry — but it should not have taken so long to complete, and it could have been negotiated without some of the recriminations now being heard. Whereas the Indigenous communities and the government — which brokered the deal — are celebrating, industry isn’t, and says that the agreement could threaten jobs.
Researchers whose work involves collaborating with Indigenous communities will be wondering what they can learn from this case. One important lesson is that there are more harmonious ways to work collaboratively with Indigenous communities.

Rooibos tea profits will be shared with Indigenous communities in landmark agreement

One reason why the rooibos agreement was nine years in the making is that tea-industry representatives, concerned about risks to their intellectual property, contested the communities’ claim that rooibos tea is based on centuries-old Indigenous knowledge of the plant. That led to a prolonged stalemate between the two sides.
San community representatives first wrote to South Africa’s government in 2010 arguing that, under the law, they are entitled to a share in the tea industry’s profits because it had used their traditional knowledge.
The communities felt they had a good case: the rooibos plant (Aspalathus linearis) is endemic to South Africa’s Cederberg region, which was inhabited by San and Khoi communities long before settlers from Europe forcibly took their lands. The government commissioned a review of the historical and ethnobotanical literature, which concluded in 2014 that there is a strong probability that rooibos tea had Indigenous origins, and said that there was nothing in the literature to contradict the community’s claims.
The industry had reservations about these findings, arguing that there is little published scientific evidence that explicitly states that the ancestors of today’s San and Khoi communities were the first to brew rooibos teas. It went on to commission its own study, which supported its side of the argument — and added another three years to the timeline.
Two studies reviewing essentially the same historical literature and coming to different conclusions is not unusual. Records of historical events — and even records of recent ones — are often open to interpretation. But however the research is interpreted, there’s a moral case to compensate long-mistreated groups. The government advised the tea industry that it needs to pay the communities, which will receive 1.5% of the ‘farm gate price’ — that paid by agribusinesses for unprocessed rooibos.
Research and commerce have different reasons for wanting access to traditional knowledge, but both have the ability to do so without sharing the credit or the potential benefits with those who generated it. This is what concerns the Indigenous communities the most and was the motivation, two years ago, for the San communities’ production of a code of ethics for researchers. The code urges scientists to be up front about their intentions, to follow through on promises to share publication credit and, where possible, to build community capacity for Indigenous groups to do their own studies.
The ethics code and the rooibos agreement are small steps towards a bigger demand: that Indigenous people, especially those whose ancestors lost lives, land and livelihoods during more than a century of exploitation, are treated fairly and as equals.
When researchers work with communities as partners, all sides can expect to enjoy more constructive relationships and to benefit from knowledge. Industry must do the same.
Nature 575, 258 (2019)
doi: 10.1038/d41586-019-03488-2

Tuesday, October 22, 2019

विद्या आश्रम पर दर्शन वार्ता 12-14 अक्टूबर 2019

घोषणा के अनुरूप 12 - 14 अक्टूबर को विद्या आश्रम, सारनाथ में दर्शन वार्ता हुई। 

विचार के प्रमुख बिंदु रहे ---- स्वायत्तता, न्याय, ज्ञान-पंचायत, लोकस्मृति, कला दर्शन, सामान्य जीवन, स्वराज, नारी-विद्या, संत परंपरा व शास्त्रीय दर्शन और लोक भाषा। दर्शन स्तर की समाज के लिए प्रासंगिक चर्चाएं हुईं। टेक्नॉलॉजी तथा मनुष्य निर्मित संस्थाओं और वर्तमान राजनीति के विकल्प के लिए भारतीय दर्शन परम्पराओं, ज्ञान और विवेक के संदर्भों में ठोस विचार सामने आए और उन पर चर्चा हुई। 
बंगलुरु में हाथ से उत्पादन उद्योग के पक्ष में चल रहे आन्दोलन ने हस्त उद्योग, रोज़गार और प्रकृति संरक्षण को केंद्र में रखते हुए 'पवित्र आर्थिकी' के पक्ष में आवाहन किया है. इसके लिए ग्राम सेवा संघ के सरगना एवं जाने-माने कलाकार प्रसन्ना एक अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठ चुके है. इस आन्दोलन में कला क्षेत्र की पारंगत एवं जानी-मानी हस्तियाँ शामिल हुई हैं. कई लोग उनके साथ उनके समर्थन में एक दिवसीय अनशन पर रहे. बंगलुरु से आये मित्रों ने इस आन्दोलन के बारे में बताया. यह बात सामने आई कि न वाम और न दक्षिण पंथ के अंतर्गत आने वाले इस आन्दोलन की प्रेरणा के स्रोत गाँधी हैं. यह आन्दोलन दर्शन के स्तर पर समाज में हस्तक्षेप कर रहा है. सरकार से कुछ मांग नहीं रहा है बल्कि देशवासियों से एक बात कह रहा है. विद्या आश्रम की दृष्टि में यह बौद्धिक सत्याग्रह का प्रकट और सार्वजनिक रूप है. पवित्र आर्थिकी के विचार पर चर्चा हुई. 

तीन दिन की इस दर्शन वार्ता में  केरल से पी.के.ससिधरन, चेन्नई से सी.एन. कृष्णन व विद्या दुराई, बंगलुरु से जे.के.सुरेश, जी.एस.आर. कृष्णन, राजकुमारी कृष्णन, हैदराबाद से अभिजित मित्रा, मुम्बई से वीणा देवस्थली, नागपुर से गिरीश सहस्रबुद्धे, इंदौर से संजीव दाजीऔर अंजलि, इलाहाबाद से स्वप्निल और राजेश  कपूर, असम से संचारी भट्टाचार्य, बंगाल से देबप्रसाद, बंदोपाध्याय, रूपा व आखर और दिल्ली से अविनाश ने शिरकत की. वाराणसी से सुनील सहस्ररबुद्धे, रमण  पन्त, अरुण चौबे, प्रवाल सिंह,  फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, लक्ष्मण प्रसाद, चित्रा,  प्रेमलता सिंह, आरती, गोरखनाथ, विनोद चौबे और अलीम, मऊ से अरविंद मूर्ति और उनके साथियों ने शिरकत की.  
पहले दिन इलाहाबाद से पीयूसीएल के राष्ट्रीय अध्यक्ष रविकिरण जैन और आजकल वाराणसी रह रहे न्याय के दार्शनिक पी.के.मुखोपाध्याय दर्शन वार्ता में शामिल हुए और समापन के दिन वाराणसी के वरिष्ठ समाजवादी और पत्रकार विजय नारायण जी शामिल हुए.
   
13 अक्टूबर को गंगाजी के किनारे राजघाट पर अपने दर्शन अखाड़ा पर सब जने बैठे। वातावरण निर्मल और सुकून भरा था तो ज़रूर, पर पूरब में थोड़े बादल होने से शरद पूर्णिमा का चंद्रोदय हम लोग नही देख सके। आधे पौन घंटे बाद थोड़ा ऊपर आया हुआ चाँद अपनी पूरी आभा के साथ दिखाई दिया। लोकविद्या जन आंदोलन के दर्शन और कार्यक्रम पर चर्चा हुई। इसके बाद सबको खीर खाने को मिली। गोरखनाथ जी का विशेष प्रबंध था।

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12 और 14 अक्तूबर को विद्या आश्रम में दर्शन वार्ता 

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13 अक्तूबर को गंगाजी के किनारे दर्शन अखाड़ा पर दर्शन वार्ता 

विद्या आश्रम 

Tuesday, September 17, 2019

Listening to Philosophers

Listening to Philosophers 
Dialogue in Varanasi 



Venue : Vidya Ashram, Sarnath and Darshan Akhada, Rajghat. 
Date : 12-13-14 October 2019 , Saturday, Sunday, Monday.
13th is Sharad Poornima

All those interested are invited


Introductory Remarks 

When all politics is bereft of ideological considerations, there is need of a philosophical intervention. When ordinary life gets very muddled and moral imperatives fail to provide the criteria of resolution, philosophical intervention becomes imperative and inevitable.  The world today appears to be in the grip of changes which have no promise for a better world.

What is the contemporary philosophical scene which may come to rescue? Where do we look for philosophers, who we should like to listen to?

Where we look for may be - new epistemological foundations in the wake of the emergence of the virtual world, reflections on the human condition in the wake of the new forms of oppression let loose by the New Empire, debates on Climate Justice, culturally rooted thought on economics and politics, holistic thought as against piecemeal, art as preferred way of thinking over science, lokavidya darshan when organized knowledge is seen as hand maiden of the state, neighbourhood as primary form of social organisation and the like.

Every department of human life and social organization has undergone huge changes since the appearance of the internet and the world wide web, close to 30 years ago. Economics, politics, trade, social organization, finance, industry, education, science research and finally also ordinary life, everything has undergone great changes. Vidya Ashram has tried to look at these changes by its research, investigations and dialogues pertaining to the world of knowledge, particularly the flux in it. In the process it encountered radically different approaches for understanding the world which had different epistemological perspectives and pointed towards new ontological constructions. New languages and idioms can be seen emerging to enable these approaches to be true to their contexts including the emancipatory needs of the people - farmers, women, artisans, service providers, workers, students, adivasis and those in the market doing business with tiny capital. One would often find that these approaches do not accept the riders of logic, values and methods of modern science. Some of these approaches are broadly mentioned below.
·        The Rights of Mother Earth and buen vivir that emerged in some countries of South America like Bolivia, Ecuador and part Colombia.
·        Lokavidya Jan Andolan in India - an explicitly epistemological movement creating the concept of lokavidya.
·       European Students Movement against corporatization of   education creating the idea of Cognitive Capitalism.
·        La Via –Campesina, an international farmers organization and movement focusing on Climate Change and Food Sovereignty – suggesting a Swaraj like reorganization of societal priorities.

There are explicit philosophical writings in the context of these movements and phenomena. There is also wide ranging philosophical reflection which is not rooted explicitly in these phenomena. They come from different ends like: primacy of art in life and understanding, reassertion and innovation of traditional ways of practice and understanding by the subaltern classes, new critique of Science focussing on Information Technology, Bio-technology, Nano-science and Cognitive Science, network focussed ontology, primacy of communication over production leading to fundamental changes in how history and science need to be viewed etc.

It is suggested that this note be shared with persons who may be interested in this, seek their views on it and if they would be willing to contribute to shape this dialogue with philosophers and among philosophers. This discussion needs to be very open both on content as well as form of this ‘listening to philosophers’. It can be conceived on a global scale with virtual and actual forms intertwined.

Vidya Ashram