वाराणसी में 16 अक्टूबर 2016 को प्रस्तावित किसान कारीगर महापंचायत के समर्थन और भागीदारी के लिए महाराष्ट्र और कर्नाटक में आवाज़ उठाई जा रही है। किसान कारीगर महापंचायत यह आवाज़ बुलंद करती है कि किसान और कारीगर समाज का ज्ञान (लोकविद्या) विश्वविद्यालय के ज्ञान से कम नहीं होता, इसलिए वे भी सरकारी कर्मचारी के बराबर की आय के हक़दार हैं। सरकारों की यह ज़िम्मेदारी हैं की वे ऐसी नीतियाँ बनायें जिससे हर किसान और कारीगर के घर में सरकारी कर्मचारी के बराबर आमदनी पहुंचे। यही रास्ता सबकी खुशहाली का रास्ता है।
नागपुर से महाराष्ट्र के किसान आंदोलन में सक्रिय भागीदारी रखने वाले गिरीश सहस्रबुद्धे किसानों व कारीगरों के संघर्षों के सन्दर्भ में पूरे सामाजिक, आर्थिक और राजनितिक परिप्रेक्ष्य को उजागर करते हुये उनके संगठनों को आगाह करते हैं कि अब खुशहाली का एक ही रास्ता है कि सरकारें ये ज़िम्मेदारी लें कि हर किसान और कारीगर के घर में सरकारी कर्मचारी के बराबर आय हो और उसी के जैसी पक्की और नियमित हो। इस आवाज़ को बुलंद करने के लिये महाराष्ट्र के किसानों और कारीगर संगठनों को 16 अक्टूबर को वाराणसी चलने की अपील करते हैं। नीचे दिये लिंक पर आप इन्हें मराठी में बोलते देख व सुन सकते हैं।
https://www.youtube.com/watch?v=2t9ggNF1PQc
बंगलुरु, कर्नाटक के ज. क. सुरेश 1980-90 में कर्नाटक किसान आंदोलन के नज़दीक रहे हैं। वे मानते हैं कि आज किसान और कारीगर समाज की जो स्थिति बन गई है उसमें वें भुखमरी के शिकार होकर आत्महत्या करने को बाध्य हैं। इस बदहाल स्थिति से उबरने का एक ही रास्ता है की उनकी आय भी सरकारी कर्मचारी के जैसी हो। कर्नाटक के किसान और कारीगर संगठनों को कन्नड़ में अपील करते हुये इन्हें आप नीचे दिये लिंक पर देख और सुन सकते हैं।
विद्या आश्रम
No comments:
Post a Comment